हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव.


          आप यह जानकर आश्चर्य कर सकते हैं कि आयुर्वेद के पुराने ग्रंथों में ब्लड-प्रेशर से सम्बन्धित उच्च रक्तचाप या निम्न रक्तचाप जैसी बीमारियों का उल्लेख प्रायः देखने को नहीं मिलता, याने प्राचीन काल में ये रोग या तो अस्तित्व में ही नहीं होता था या फिर इतने न्यून पैमाने पर होता होगा कि इसके बारे में अलग से जानकारियां खोजने की आवश्यकता ही नहीं पडती थी । जबकि वर्तमान समय में अधिकांश लोगों का जीवन चिन्ता और तनाव के ऐसे अनवरत चक्र की गिरफ्त में चल रहा है जिसका परिणाम हैं निरन्तर बढ रहे ब्लड-प्रेशर के रोगी, जिन्हें चिकित्सक की सलाह के मुताबिक बचाव की गोलियां प्रतिदिन खाना पड रही हैं और सामान्य धारणा के मुताबिक एक बार ये गोली खाना चालू करने के बाद इन्हें जीते जी बन्द कर पाना लगभग मुमकिन नहीं माना जाता, और इनके भी साईड इफेक्ट शरीर को निरन्तर झेलना ही पडते हैं । आखिर ये ब्लड-प्रेशर की समस्या क्या है और इससे कैसे दूर रहा जा सकता है । इसे समझने की कोशिश करें-

उच्च रक्तचाप क्या है
          हमारे शरीर की धमनियों में जो रक्त दौडता रहता है उसे गति मिलती है हमारे ह्रदय से जो दिन रात कार्य करते हुए इस रक्त को पम्प कर शुद्ध करता व रक्त पर दबाव डालकर धमनियों तक भेजता है । यहाँ तक की शारीरिक कार्यप्रणाली सामान्य अवस्था है लेकिन जब हमारे गलत आहार-विहार से इस प्रणाली में बाधा पहुँचती है तो या तो रक्तचाप कम हो जाता है जिसे हम लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) के नाम से जानते हैं या फिर बढ जाता है जिसे हम हाई ब्लडप्रेशर (उच्च रक्तचाप) के नाम से जानते हैं । सामान्य अवस्था में शिशु का रक्तचाप 80/50, युवकों का 120/70 और प्रौढों का 140/90 होता है । यह ब्लडप्रेशर पत्येक व्यक्ति के शरीर में श्रमकार्य करने पर, भागदौड करने पर या सोते समय अपने सीमित दायरे में घटता बढता रहता है लेकिन असामान्य घटबढ में यही उतार चढाव एक घातक रोग के रुप में हमारे शरीर में स्थान बना लेता है ।

नीचे लिंक को क्लिक कर ये उपयोगी जानकारी भी देखें-

           
इस रक्तचाप के असामान्य रुप से कम-ज्यादा होकर रोग की अवस्था में पहुँचने के कुछ कारण तो शारीरिक होते हैं और कुछ मानसिक-


         शारीरिक कारण- रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढना, धमनियों का सख्त और संकुचित होना, मोटापा बढना, पैतृक प्रभाव होना, आयु बढने पर प्रौढ या वृद्धावस्था के प्रभाव से शरीर में विकार और निर्बलता आना, गुर्दे, जिगर और अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों में खराबी होना आदि कारण मुख्य रुप से कहे जा सकते हैं । इसके अतिरिक्त अपने आहार में ऐसे पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करना जो रक्त में कोलेस्ट्राल, शरीर में चर्बी (मोटापा), और मनोवृत्ति में उत्तेजना व तामसिक और राजसिक प्रवृत्ति उत्पन्न करते हों ब्लड-प्रेशर बढने के कारण बनते हैं । ऐसे आहार में माँस, अण्डे, शराब, नशीले पदार्थ, तम्बाकू, धूम्रपान, तेज मिर्च मसालेदार व तले हुए पदार्थों के अलावा अधिक प्रोटीन व फेट (वसा) वाले पदार्थों का सेवन शामिल है और वर्तमान जीवनशैली में ऐसे ही खान-पान का प्रयोग अधिकांशतः चल रहा है । 

         
मानसिक कारण- मानव मन स्वभावतः संवेदनशील होता है और जो लोग भावुक प्रवृत्ति के होते हैं उनकी संवेदनशीलता और अधिक बढे हुए परिमाण में रहने के कारण किसी भी प्रकार की चिन्ता, दुःख, क्रोध, ईर्ष्या अथवा भय का आघात लगने पर दिल की धडकन अनायास ही तीव्र गति से बढ जाती है और स्नायविक संस्थान तनाव से भर जाता है जो मुख्य रुप से उच्च रक्तचाप में परिवर्तित होता रहता है । इसीलिये इन दुष्प्रवृत्तियों से बचने की सलाह अक्सर हमारे दैनंदिनी के जीवन में सामने आती रहती है । किन्तु वर्तमान जीवनस्तर में भौतिकतावादी ऐश्वर्यपूर्ण रहन-सहन की आवश्यकता से उपजी दिन भर की भागदौड से शरीर की थकान के साथ ही नाना प्रकार के सोच विचार, तिकडमबाजी, और दूसरे के अधिकारों को येन केन कब्जे में लेने जैसी जोड-तोड में लगे रहने से उपजे तनाव में हमारा दिमाग भी कमजोर होता चला जाता है जिसका परिणाम अन्ततः इस रोग के रुप में हमारे शरीर के सामने आता है ।

          महिलाओं के मामले में कुछ कारण और भी जुड जाते हैं जैसे परिवार नियोजन अथवा मासिक ऋतुस्त्राव को  नियंत्रित, नियमित और सन्तुलित करने के लिये खाई जाने वाली ऐलोपेथिक गोलियां का लम्बे समय तक सेवन करना जिनमें से कुछ ब्लड प्रेशर को बढावा देती हैं । खान-पान की आदतों से स्थूल शरीर का हो जाना और कई महिलाओं का पारिवारिक जीवन जिसमें वे मानसिक चिन्ता, पीडा और घुटन भरी जिन्दगी जीने पर स्वयं को विवश महसूस करती हों ये सभी कारण अंततः इस रोग में वृद्धि करते हैं ।

          उच्च रक्तचाप की स्थिति अचानक नहीं बनती बल्कि धीरे-धीरे और लम्बे समय में बनती है जिसका हमें वर्षों तक पता भी नहीं चल पाता । कुछ शारीरिक और मानसिक लक्षण शरीर की ओर से हमें मिलते भी हैं तो हम प्रायः उसका कारण कुछ और ही समझा करते हैं जैसे कब्जियत, सिरदर्द, सिर में भारीपन व तनाव, चक्कर आना, जल्दी थक जाना, ह्रदय की धडकन बढना, कभी-कभी सांस लेने में कष्ट होना, स्वभाव में चिडचिडापन, अनिद्रा और तबियत में बैचेनी आदि लक्षण हमें उच्च रक्तचाप का संकेत ही देते हैं किन्तु प्रायः हम इनके दूसरे ही कारण समझा करते हैं । 

          
बचाव- सबसे पहले तो शारीरिक कारणों में गरिष्ठ व तामसी भोजन की बजाय सादा सुपाच्य आहार लें, पाचन शक्ति ठीक रखें, ऐसे खाद्य पदार्थों का अति सेवन न करें जो शरीर में मोटापा और रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढाते हों । श्रमकार्य करें या व्यायाम व योगासनों का नियमित अभ्यास करें । मानसिक कारण जो इस रोग की ओर ले जाते हैं उनसे जितना संभव हो बचे रहने का प्रयास करें । चिन्ता करने की बजाय किसी भी समस्या से बाहर निकलने के लिये चिन्तन करें । क्रोध, ईर्ष्या, शोक व अन्य अनावश्यक मानसिक वेगों से स्वयं को दूर रखने का प्रयास करें ।

         
उच्च रक्तचाप की स्थिति में शरीर में उदरस्थ वायु दूषित हो जाती है जिसे हम प्रायः गैस ट्रबल का नाम देते हैं । यही दूषित वायु प्रचंड रुप में कुपित होकर पित्त को विकृत कर देती है और पित्त विकृति ही अम्लपित्त याने हाइपरएसिडिटी के रुप में परिणीत होकर अपान वायु के साथ मिलकर पूरे शरीर में फैलती हुई पाचन तंत्र को बिगाड देती है । इससे शरीर का समग्र रक्त गाढा होकर शरीर की बाह्यान्तरिक सभी शिराओं (नसों) में कठोरता आ जाती है फलतः नियमित रक्त संचार में बाधा आती है जिसे हम उच्च रक्तचाप के रुप में जानते हैं । यही रक्तचाप जब बहुत अधिक बढ जावे तो शरीर पर पक्षाघात, लकवा या फालिज रोग का आक्रमण होता है । उच्च रक्तचाप में नींद नहीं आती, कभी-कभी दिल में (सीने में बांयी ओर) दर्द होता है । इस रोग का प्रारम्भिक लक्षण गैस ट्रबल ही है जिससे बवासीर, गठिया, श्वास-दमा जैसे जटिल रोगों के साथ ही शरीरांगों पर सूजन आना भी सम्भव है । 

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उच्च रक्तचाप (हाईपरटेंशन) का मरीज थोडी सी लापरवाही से ही घातक ह्रदय रोग, पक्षाघात या मस्तिष्क की रगें एकाएक फटने से मृत्यु का ग्रास बन सकता है अतः उच्च रक्तचाप होते ही मरीजों को अत्यन्त सावधान होकर सपथ्य चिकित्सा कारगर तरीके से करवानी चाहिये । 
  
          चिकित्सा- सर्वप्रथम गैस ट्रबल को नष्ट करने के लिये अदरक का लगभग 6 माह पुराना मुरब्बा दोनों समय के भोजन के बाद 5 ग्राम की मात्रा में खाकर 10 ग्राम बडी सौंफ को दो कप पानी में उबालकर एक कप पानी बच रहने पर ठंडा करके सौंफ को मसलकर उस पानी को छानकर पी लें । कब्ज यदि हो तो उसके उपचार हेतु दाडीमाष्टक चूर्ण रात्रि को सोने से पहले एक चम्मच फांककर थोडा सा पानी पी लें । ये क्रम 15 दिन से एक माह तक नियमपूर्वक  बनाएँ रखें जिससे आप गैस ट्रबल से पूरी तरह से छुटकारा पा सकते हैं । 
  
          इसके साथ उच्च रक्तचाप की चिकित्सा हेतु रौप्य भस्म, त्रिवंग भस्म, मणिष्य पिष्टी, सर्पगंधा का कपडछन चूर्ण (सभी 15-15 ग्राम)स्वर्णमाक्षिक भस्म, चन्द्रकलारस, सत्वगिलोय, अकीक पिष्टी, मुक्ता शुक्ति पिष्टी, प्रवाल चन्द्रपुष्टी, जटामांसी या बालछड का चूर्ण (सभी 30-30 ग्राम) मात्रा में लेकर इन सबको पक्के खरल में तीन घण्टे घोटकर किसी साफ शीशी में रख दें । दवा तैयार है । प्रातः शौचादि से निपटकर निराहार मुंह, और शाम 5 बजे के आसपास यह दवा आधा-आधा ग्राम की मात्रा में लेकर एक-एक चम्मच उत्तम दाडिमावलेह में मिलाकर चाट लें । इस दवा के नियमबद्ध तरीके से विश्वासपूर्वक सेवन करने व उपयुक्त परहेज का पालन करके सैकडों मरीज स्थायी लाभ प्राप्त कर सुखी जीवन जी रहे हैं । कोई भी जरुरतमंद रोगी आयुर्वेदिक दवा की दुकानों से इन दवाईयों को प्राप्त कर स्वयं को रोगमुक्त कर सकते हैं ।

           पक्षाघात (लकवा) के रोगी उच्च रक्तचाप से पीडित होते ही हैं, अतः ऐसे रोगी पहले हाई ब्लड प्रेशर नाशक उक्त दवा का नियमित सेवन करें तो धीरे-धीरे पक्षाघात भी नष्ट हो जाएगा । उच्च रक्तचाप के रोगियों को प्रायः गैस ट्रबल, कब्ज व अम्लपित्त (एसीडिटी) रहता ही है जिसके उपचार का तरीका अदरक के पुराने मुरब्बे और बडी सौंफ के अर्क के प्रयोग के रुप में उपर दिया जा चुका है इसके प्रयोग से पुराने से पुराना गैस्टिक (वायु विकार व अफारा) अवश्य ही नष्ट हो जाता है । रक्तचाप का जन्म कब्ज से और पक्षाघात रक्तचाप से ही होता है । उपरोक्त वर्णित अदरक का मुरब्बा, सौंफ अर्क और दाडिमाष्टक चूर्ण तीनों के नियमित सेवन से शरीर के भीतर के घटकों का शुद्धिकरण हो जाता है जिससे अन्य दवाएँ भी शीघ्रतापूर्वक गुणकारी असर करती हैं । कब्ज, अम्लपित्त और गैस्टिक के रहते हाई ब्लड प्रेशर और पक्षाघात (लकवा) का नष्ट हो पाना असम्भव है । अतः हमने इन सब व्याधियों की चिकित्सा एक साथ ही करने का निर्देश किया है । ब्लडप्रेशर में कोई भी तीव्र रेचन (जुलाब) हर्गिज न लें । उपरोक्त दाडिमाष्टक चूर्ण ही इसके लिये पर्याप्त है ।    


सौजन्य  - वैद्य  ठा. बनवीर सिंह 'चातक' (आयुर्वेद रत्न)



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Milan Tomic

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14 टिप्पणियाँ:

  1. संपूर्ण जानकारी के लिए साधुवाद

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  2. उत्तम जानकारी हेतु ध्न्यवाद

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  3. उत्तम जानकारी हेतु ध्न्यवाद|

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  4. वृहद जानकारी देती उम्दा पोस्ट।

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  5. ब्लडप्रेशर के बारे में विस्तृत जानकारी वास्तव में उपयोगी है.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.
    मेरे ब्लॉग पर आईये.मेरी पोस्टें आपका इंतजार कर रहीं हैं.

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  6. कभी इस पर भी कुछ लिखें कि रक्तचाप की दवा कैसे छोड़कर रक्तचाप से मुक्त रहा जाए।

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  7. बाकलीवाल जी बहुत दिनो से कोई नयी पोस्ट नही आई इंतजार है

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  8. Uncontrolled high blood pressure may damage organs in the body and increase your risk of coronary heart disease, stroke, kidney disease, and vision loss. Here are natural ways to use natural remedies for high blood pressure.

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आपकी अमल्य प्रतिक्रियाओं के लिये धन्यवाद...

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