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मंगलवार, 30 नवंबर 2010

सामान्य शारीरिक समस्याओं के- तात्कालिक राहत उपचार

            1.  सिरदर्द-    प्रायः सामने आने वाली इस समस्या के निदान हेतु डिस्प्रीन टेबलेट की 1+1/2  (1।।) गोली कटोरी में तीन टुकडे करके पानी में घोलकर पी लें । 15 मिनिट में आराम मिल जाएगा ।

                     2.  आकस्मिक चोट लग जाने पर-    1 या 2 चम्मच शक्कर खिलादें । छोटी समस्या में पूर्ण राहत देगी । बडी समस्या में उसके बाद डाक्टर के पास तो ले जाना है ही । 

                     3.  जल जाने पर-    यदि चमडी ही जलकर अलग न हो गई हो तो जली हुई जगह पर तेज ठण्डे पानी की धार बनाकर डालें । तत्पश्चात शरीर का वो अंग पोंछकर मुट्ठी में नमक लेकर जली हुई जगह पर कसकर दबाकर अधिकतम 2 मिनिट के लिये दबाए रखें और दर्द निवारक गोली जैसे काम्बिफ्लेम ले लें । जलने का दाग तक चमडी पर नहीं दिखेगा । (यद्यपि कहावत यह है कि जले पर नमक छिडकना याने समस्या को और बढा देना. लेकिन नमक वाकई जले का उपचार कर देता है ।)

                  4.  हार्ट अटेक-    यदि रोगी को हार्ट अटेक जैसे लक्षण (यथा सीने में दर्द होना व पसीना आना जैसे) दिखे तो शीघ्र एक केला खिलादें । गम्भीर अवस्था में भी रोगी की जान बचा देगा ।

                  5.  किसी भी किस्म की घबराहट होने पर-    सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता स्वर्गीय दादामुनि श्री अशोक कुमार के फार्मूले के अनुसार होम्योपेथिक दवा रेस्क्यू-रेमेडीज की दो बूँद प्रभावित व्यक्ति की जुबान पर डाल दें । रोगी चमत्कारिक तरीके से सामान्य अवस्था में आ जावेगा । (होम्योपेथिक दवाईयों की दुकानों पर मिलती है और हमेशा घर में रखने व यात्रा में साथ में रखने योग्य है)

                   6.  कमर (पीठ) में दर्द होने पर-    रात को सोते समय आधी गठान सौंठ अधकूट की हुई एक गिलास पानी में डालकर उबालें । जब वह पानी 1/3 (एक तिहाई) रह जावे तो उस काढे को छानकर उसमें चाय के एक चम्मच की मात्रा में अरंडी का तेल मिलाकर समय पी लें ।
                            
                  7.  घुटने व शारीरिक जोड सहित शरीर में दर्द होने पर-    सरसों व लहसुन के तेल की प्रभावित अंग पर मालिश कर लें । तेल बनाने की विधि निम्नानुसार है-
       100 ग्राम सरसों के तेल में लगभग 20 ग्राम लहसुन की छिली हुई कलियां डालकर आंच पर इतना गर्म करें कि लहसुन जलकर काली पड जाए । ठण्डा होने पर तेल को छानकर लहसुन का बगदा फेंक दें व तेल को प्रभावित अंग पर मालिश के उपयोग में लें ।  

सोमवार, 29 नवंबर 2010

स्वास्थ्य व सौंदर्य का दुश्मन मोटापा

       मनपसन्द खान-पान और आराम-तलब जीवनशैली की देन मोटापा- जो स्वयं में कोई रोग नहीं दिखते हुए भी वास्तव में रोगों का घर साबित होता है । यदि किसी व्यक्ति का वजन उसकी लम्बाई के अनुपात से 20 किलो भी ज्यादा हो तो इसका मतलब उसने अपने शरीर पर 20किलो वजन की ऐसी गठरी लाद रखी है जिसे उसे हर समय उठाकर चलना ही है ।

             अधिक वजन वाले व्यक्तियों के शरीर के प्रत्येक अंग को सामान्य वजन के व्यक्तियों की तुलना में अधिक कार्य करना पडता है । उनके दिल को सिर्फ शारीरिक अवयवों तक ही खून नहीं पहुँचाना पडता बल्कि बढी हुई चर्बी के कोषों तक भी खून भेजना होता है । फेफडों को अतिरिक्त वायु बढी हुई चर्बी की तह के लिये भेजनी पडती है . गुर्दों को अधिक पेशाब छानना पडता है । इनके भोजन की मात्रा भी सामान्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक होने के कारण पाचक अंगों को भी ज्यादा काम करना पडता है । आंतों को उस भोजन को पचाने में अधिक श्रम करना पडता है और सोते समय आराम के क्षणों में भी मोटे व्यक्तियों की अधिक उर्जा खर्च होती है । निष्कर्ष ये कि मोटे व्यक्ति अपने आप के लिये ऐसे खर्चीले इंजन साबित होते है जो अपनी शक्ति का अधिकांश हिस्सा अपना वजन ढोने में ही खर्च कर रहे होते है ।


             रोगों की दृष्टि से समझा जावे तो ह्रदय रोग तो मोटे व्यक्तियों में होना आम स्थिति होती है, इसके अलावा मधुमेह (शुगर), उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर), जोडों का दर्द और केन्सर तक के खतरे इनके साथ सामान्य वजन के व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक रहते हैं । इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी इस समस्या के कारण कम हो जाने से बीमारी की अवस्था में इन्हें अधिक लम्बे समय तक रोगों से लडते रहना पडता है जहाँ प्रायः रोग ही इन पर अधिक भारी साबित होते हैं और कई बार औसत से कम उम्र में बीमारियां इनके प्राणों पर भारी साबित होती हैं ।

            यदि मोटापे के कारणों पर चर्चा की जावे तो आलू, चांवल, सभी तरह के तले पदार्थ, मिठाईयों का अधिक सेवन, रात को देर तक जागकर सुबह देर तक सोये रहना । इन पूर्ववर्ती कारणों के अलावा आजकल जो अतिरिक्त कारण इस समस्या को बढावा देने में जुड गये हैं वे हैं फास्टफूड- पिज्जा, बर्गर के साथ ही कोल्ड ड्रिंक का निरन्तर बढता प्रयोग । इनके नियमित सेवन के साथ जब बच्चे टी. वी., कम्प्यूटर के सामने देर तक बैठकर अपने मनपसन्द टी. वी. शो या कम्प्यूटर पर मनोरंजक गेम खेल रहे होते हैं तो बालपन से ही यह समस्या तेज गति से इन्हे अपनी गिरफ्त में ले लेती है । 

           यदि आपका पेट औसत से अधिक बढ रहा है तो ये इस बात का सूचक भी है कि आप मोटापे की गिरफ्त में तेजी से आते जा रहे हैं । अतः यदि आप इस स्थिति से बचना चाहते हैं तो उपरोक्त वर्णित कारणों का त्याग करने के साथ ही निम्न उपाय पर नियमित अमल करने का प्रयास करें-

             1.   सुबह उठते ही एक गिलास पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर आयुर्वेदिक गोली मेदहर गुग्गल की 2 गोली ले लें । फिर 2 गोली दोपहर व 2 गोली शाम को भी 1 या 2 चम्मच शहद मिश्रित जल के साथ कम से कम 6 माह का लक्ष्य बनाकर लेना प्रारम्भ कर दें ।

             2.    तत्पश्चात 20 मिनिट के लिये तेज चाल से घूमने या दौडने और कम से कम 20 मिनिट के लिये कसरत, योगाभ्यास या स्वीमिंग का अनिवार्य क्रम अपनी जीवनचर्या में बनालें ।

             3.    वापसी के बाद एक सेवफल के लच्छे किसवाकर और यदि गाजर उपलब्ध हो तो उसमें एक गाजर के किसे हुए लच्छे मिलवाकर नाश्ते के रुप में उसका सेवन करके कुछ समय रुककर ही न्यूनतम मिठास की चाय या गाय के दूध का सेवन करें ।

   4.    भोजन में गेहूँ की चपाती खाना बन्द करके देशी चने व जौ का बराबर  अनुपात में मिक्स आटा पिसवाकर उसकी रोटी खाना प्रारम्भ करदें । अपनी भूख से एक या सम्भव हो तो दो रोटी कम खाएँ । उसकी पूर्ति कच्चे सलाद की अधिकतम मात्रा अपने आहार में बढाकर करें । भोजन के साथ एक गिलास छाछ लेकर उसमें एक चम्मच लवण भास्कर चूर्ण मिलाकर भोजन के साथ घूंट-घूंट करके उसका सेवन करें । भोजन के पश्चात एक या दो घूंट से अधिक पानी न पिएँ । भोजन के एक घंटे बाद ही पानी पिएँ ।

    5.    चांवल के मांड में स्वाद के मुताबिक सेंधा नमक मिलाकर उसे कुनकुना गर्म पीने की कुछ समय आदत बनालें । 

   6.    पालक का 50 ग्राम ज्यूस निकलवाकर व उसमें 10 ग्राम नींबू का रस मिलाकर प्रतिदिन पीने की आदत बनालें । 

    7.    शाम को भी नियमित शौचक्रिया जाने का प्रयास करें । आपके नियमित प्रयास करने से शरीर की निश्चित ही वैसी आदत भी बन जावेगी । शाम का भोजन अत्यधिक हल्का रखें । यदि सम्भव हो सके तो शाम को कच्चे सलाद व मौसमी फल से ही गुजारा करने का प्रयास करें ।

    8.    शाम को एक तपेली में पानी लेकर उसमें एक मुट्ठी अजवायन डालकर उस पानी को उबलवालें । फिर उसपर दूध ढकने की जाली ढककर व दो नेपकीन लेकर उस जाली पर बारी-बारी से नेपकीन गर्म करके सहते-सहते गर्म नेपकीन से सीने के नीचे से लगाकर पेट की नाभि तक लगभग 20 मिनीट नियमित सेक करने की आदत बनालें । इससे पेट का मोटापा घटाने में विशेष सफलता मिल सकेगी । अजवायन युक्त यह पानी तीन दिन तक गर्म करके आप उपयोग में ले सकते हैं ।

   9.   सोने के दो घण्टे पहले बिना मलाई का या सप्रेटा या गाय का दूध अथवा न्यूनतम मिठास की चाय पीकर सोते समय कब्जीना चूर्ण या त्रिफला चूर्ण पानी के साथ लेकर सोने की आदत बनालें ।

  इन उपायों को करने के साथ ही फास्टफूड, कोल्ड ड्रिंक, आलू, चावल, तले पदार्थ व मिठाईयों का सेवन यथासम्भव पूरी तरह से बन्द करदें । इसके साथ ही यह भी ध्यान रखें कि मोटापा दो-चार दिनों में नहीं बढा है बल्कि लम्बे समय तक खानपान व रहन-सहन की अनुचित आदतों के कारण ही बढा है अतः इन उपायों को भी लम्बे समय का लक्ष्य बनाकर ही प्रयत्न आरम्भ करें । अलबत्ता उपचार प्रारम्भ करने के पूर्व अपना वजन व पेट तथा शरीर के वे अंग जिनपर अधिक चर्बीयुक्त मोटापा दिखाई देता है उनका माप लेकर एक डायरी में नोट करलें और फिर लगभग प्रति माह अपनी प्रोग्रेस स्वयं चेक करते चलें ।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

अमृतफल आंवला

        आंवले की गुणवत्ता से हम सभी भली प्रकार से परिचित हैं । विटामिन सी की प्रचुरता से परिपूर्ण आंवले कच्चे रहें, उबले रहें या सूखे रहें इसका विटामिन कभी नष्ट नहीं होता बल्कि सूखे आंवले में ताजे से ज्यादा विटामिन पाया जाता है । किन्तु स्वाद में खट्टा होने के साथ ही अत्यन्त तूरा लगने से प्रायः यह फल खाने में नहीं आ पाता और सामान्यतया घरों में अक्सर सिर्फ आंवले की लौंजी ही कभी कभी बना-खाकर इसका सीजन गुजार दिया जाता है । बाकि तो इसके विभिन्न स्वाद की सुपारी, मुरब्बा व च्यवनप्राश जैसे उत्पाद इसके शौकीन लोग बाजार से अत्यन्त मंहगे भाव में खरीदकर ही उपयोग में लेते हैं जबकि इसके गुणों का भरपूर लाभ लेने के लिये हमें इसका सपरिवार भरपूर सेवन करना चाहिये । यह समय बाजार में बहुतायद से आंवले आने का चल रहा है इसलिये आसानी से प्रयोग में लेने हेतु मैं आपको इसके तात्कालिक और दीर्घकालिक दो उपयोग बताना चाह रहा हूँ--
     1. तात्कालिक उपयोग- जब तक बाजार में ताजे आंवले मिलते रहें दाल या सब्जी में दो आंवले डाल दें जिससे कि दाल-सब्जी के साथ सीजकर ये बिल्कुल नरम हो जाएँ, (यदि हम चाहें तो अलग से इन्हें उबालकर अपने काम में लेते रह सकते हैं) भोजन के साथ इन्हें मसलकर व गुठली निकालकर स्वाद के अनुसार शक्कर-बुरा  मिलाकर अपने भोजन के साथ नियमित रुप से इनका सेवन करें या इस मिश्रण में 4 बीजरहित मुनक्का व आधा चम्मच सौंठ का पावडर मिलाकर भोजन के एक घण्टे बाद एक चम्मच शहद मिलाकर सेवन करें तो यह प्रयोग ह्दय, फेफडे व शरीर के पाचन संस्थान को हष्ट-पुष्ट करने के साथ ही श्र्वास कष्ट, दमा, खांसी, सिर चकराना व हायपरएसिडिटी जैसे सभी शारीरिक दोषों का उपचार भी करता है ।
    2. दीर्घकालिक उपयोग-               
             आंवले का मुरब्बा
                एक किलो आंवले पानी में भिगोदें व चौबीस घंटे उन्हें गलने दें । चौबीस घंटे बाद पानी से निकालकर फिर से दूसरे पानी में गलाकर रखदें । इस प्रकार दो दिन बाद उन्हें पानी से निकालकर साफ कपडे से पोंछकर कांटे से प्रत्येक आंवले को चौतरफा गोदकर अब पानी में लगभग 250ग्राम चूना घोलकर फिर उस चूने के पानी में इन आंवलों को अगले चौबीस घंटे गलने दें व 4-6 घंटे में इसे हिलाते रहें जिससे कि प्रत्येक आंवले को चूने का पर्याप्त अंश मिल जावे । पानी की मात्रा आंवलों के डूबे रहने जितनी ही रखें । इस प्रकार तीन दिन गुजरने के बाद अब इन आंवलों को पानी से निकालकर व साफ पानी से धोकर पेपर पर फरकालें व अब 500 ग्राम पानी में 50 ग्राम पिसी मिश्री घोलकर ये आंवले उस पानी में डालकर गेस पर रखकर आधे गलने तक उबाल लें व इस प्रकार उबलने के बाद ये आंवले पानी से निकालकर सूखे कपडे पर फैलाकर डाल दें । अब लगभग 1+1/2 किलो (1500 ग्राम) शक्कर की चाशनी बनाएँ व एक उबाल आने पर ये आंवले उसमें डालकर दस मिनिट पकाकर वापस उतारकर उसी बर्तन में ऐसे ही ढंककर रखे रहने दें (आप चाहें तो यहाँ शक्कर दो किलो तक भी ले सकते हैं)। दूसरे दिन फिर इन्हें आग पर रखकर उबालें व चाशनी में एक तार बनने तक उबालकर आंच से उतार लें । इलायची के दाने और केसर पत्ती आवश्यकतानुसार घोंटकर इसमें डाल दें । ठण्डा होने पर बर्नी में भरकर इस तैयार मुरब्बे का प्रतिदिन सेवन करें । इस प्रकार जितना ज्यादा मात्रा में आप इसे बनाना चाहें सामग्री का अनुपात उसी मात्रा में बढालें ।
               इस मुरब्बे की और भी गुणवत्ता यदि आप बढाना चाहें तो एक किलो आंवले पर 10ग्राम प्रवालपिष्टी भी इसमें मिला सकते हैं । उपरोक्त आंवले का मुरब्बा आप भोजन के दो घण्टे पहले या बाद में प्रतिदिन सेवन करें । यह न सिर्फ पर्याप्त स्वादिष्ट होता है बल्कि शरीर की दाह (अतिरिक्त गर्मी), सिर दर्द, आंखों की जलन व कमजोरी, कब्ज, बवासीर, त्वचारोग, रक्त-विकार, धातु विकार, चक्कर आना, दिल-दिमाग व शारीरिक कमजोरी जैसी अनेक व्याधियां दूर करता है व इसके सेवन से शरीर पुष्ट व सशक्त होता है । इसमें भी प्रवालपिष्टीयुक्त मुरब्बा विशेष गुणकारी होता है जो पित्त विकार, अन्तर्दाह व शारीरिक क्षीणता नष्ट करता है । (लगभग 15 वर्ष पूर्व स्वास्थ्य पत्रिका निरोगधाम से प्राप्त इस फार्मूले से मेरे अपने घर में आंवले का यह मुरब्बा हर दूसरे-तीसरे वर्ष बनकर प्रयुक्त होता है) चूँकि इसके सेवन से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है अतः अव्वल तो रोग पास आते नहीं और जो हों वे धीरे-धीरे उपचारित हो जाते हैं । इस प्रकार उपरोक्त वर्णित शारीरिक समस्याओं का निदान भी होता चलता है ।
               एक जानकारी और आंवले प्रयुक्त हो चुकने पर जो चाशनी बची रह जाती है उसका प्रयोग हम गर्मी के मौसम में इस चाशनी को पानी में शर्बत की तरह डालकर पीते हुए शरीर को अतिरिक्त तरावट दिलाने के काम में ले सकते हैं ।

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

सुखी जीवन के सरल सूत्र

       हम सभी अपने जीवन में सुखी रहना चाहते हैं किन्तु सुखी रह नहीं पाते हैं, निश्चय ही यह पूरी तरह से हमारे बस में नहीं है किन्तु फिर भी कुछ बातों का यदि हम ध्यान रख सकें तो सुखी रहने के मकसद में बहुत सीमा तक सफल हो सकते हैं-
       किसी को दुःख न दें- सबसे पहले हम ऐसे किसी भी कार्य-व्यवहार से बचने की कोशिश करें जिससे किसी को भी दुःख पहुँचता हो. क्योंकि जानकर या बदले की भावना रखते हुए जब हम किसी को दुःख पहुँचाने का प्रयास करते हैं तो इस प्रयास में हम स्वयं भी कुछ तो दुःखी होते ही हैं और फिर सामने वाला भी ऐसा ही जबाबी कार्य करता है जिससे हमें दुःख पहुँचे याने दोनों ओर से दुःख पलटकर हमारे पास ही आता है ।  अतः सुखी होने के प्रयास को बनाये रखने के लिये कभी भी किसी को अपनी ओर से दुःख न दें ।
       अनावश्यक चिंताओं से बचें- ऐसे कोई भी कारण जैसे सार्वजनिक भ्रष्टाचार, निरन्तर बढती मंहगाई, ट्रेन का समय पर न आना व इससे मिलते जुलते वे सभी कारण जिनसे हम प्रभावित तो होते हैं किन्तु जिन पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं होता उनके प्रति सोच-सोचकर स्वयं को दुःखी न होने दें ।
       क्षमा-भाव रखें- परिवार-समाज व अपने सर्कल में सभी सम्बन्धित लोगों का व्यवहार हमारे चाहे मुताबिक कभी नहीं हो सकता, यह स्थिति जाने अनजाने हममें क्रोध व कई बार ईर्ष्या के भाव पैदा करती है जो अंततः हमारे ही दुःख का कारण बनती है अतः क्षमा, सहानुभूति, सेवा व शांतिप्रियता जैसे गुणों को अपनाकर हम न सिर्फ सबके प्रिय बने रह सकते हैं बल्कि अपने अधिकांश कार्य अधिकतम सम्बन्धितों के सहयोग से कम समय व प्रयास में पूर्ण कर सकते हैं ।
       हँसते रहें-हँसाते रहें- यह सर्वविदित सत्य है कि हँसते रहने से उपजी प्रसन्नता के कारण हमारे शरीर की मांसपेशियां अधिक सबल व स्वस्थ होती हैं और इससे स्वमेव ही हम रोगमुक्त भी होते हैं. इसीलिये हम अपने चारों ओर निरन्तर बढ रहे हास्य क्लबों का विकास होते भी देख ही रहे हैं । अतः कामेडी फिल्में, जोक्स, चुटकुले, विनोदप्रिय मित्रों की संगति व ऐसे सभी माध्यम जो हमें हँसने-हँसाने का मौका देते हों के अधिकतम सम्पर्क में रहने का प्रयास करें, किन्तु हँसते रहने के प्रयास में कभी किसी की हँसी उडाने का प्रयास न करें अन्यथा पांडवों के महल में पानी से भरे कुँड को जब कारीगरों ने फर्श का आभास दिलाने जैसी कलाकारी की और भ्रम में दुर्योधन उसमें गिर पडा तो हँसी उडाते हुए द्रोपदी ने मजाक में कह दिया कि "अन्धे की औलाद अन्धी" तब बदले में दुर्योधन ने न सिर्फ भरी सभा में उसी द्रोपदी का चीरहरण करवाकर उसे बेइज्जत किया बल्कि सब राज-पाट छोडकर सभी पांडवों के साथ द्रोपदी को भी 13वर्षों तक जंगलों की खाक भी छाननी पडी थी । इसलिये किसी की हँसी उडाने का प्रयास न करते हुए निरन्तर हँसते रहने के अवसर तलाशते रहें ।
       फिजूलखर्ची से बचें- यह भी एक कारण है जो आगे-पीछे हमें दुःखों के जाल में ढकेल सकता है । हमारी आमदनी चाहे जो हो किन्तु झूठी तडक-भडक व दिखावे में पडकर हम किसी भी गैरजरुरी खर्च से यदि स्वयं को बचाते चलने का प्रयास करेंगे तो आर्थिक कारणों से दुःखी होने की संभावना नहीं रहेगी । इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम कंजूस हो जावें, बल्कि जहाँ आवश्यक हो वहाँ बडे से बडे खर्च में भी पीछे नहीं हटें किन्तु जहाँ आवश्यकता न हो वहाँ व्यर्थ के दिखावे या फिजूलखर्ची से बचें ।
       स्वयं को समझदार साबित करने की कोशिश से बचें- हम अपनी समझ के मुताबिक पर्याप्त समझदार हो सकते हैं शायद हों भी किन्तु कई बार जब हम अपनी समझदारी के किस्से किसी के सामने बखान करने बैठ जाते हैं तो सामने वाले के मन-मस्तिष्क में हमारी छबि खराब ही होती है जो आगे चलकर हमारे दुःख का कारण बनती है । अतः अपने सयाने बुजुर्गों की यह सलाह भी गांठ बांधलें कि जो सुख चाहे जीव को तो भोंदू बनके जी ।
       तो ये वे माध्यम हैं जो आपके-हमारे व किसी के भी जीवन को सुखपूर्वक गुजरवाने में हमेशा मददगार साबित होते हैं । बाकि तो जीवन में सुखों की जो शास्त्रोक्त परिभाषा है चलते-चलते हम उसे भी समझ ले-
पहला सुख निरोगी काया,  दूजा सुख घर में हो माया,
तीसरा सुख पतिव्रता नारी, चौथा सुख पुत्र आज्ञाकारी,
पांचवां सुख घर में सुवासा, छठा सुख राज्य में पांसा,
और सातवां सुख सन्तोषी जीवन ।
       अब इनमें आप कितने सुखों से परिपूर्ण हैं यह तो आप ही बेहतर समझ सकते हैं । मेरी भावना तो यही है कि--
सुखी रहें सब जीव जगत केकोई कभी न घबराए,
बैर-भाव, अभिमान छो़डकर, नित्य नये मंगल गाएँ । 
                                    

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

बेहतर स्वास्थ्य की संजीवनी- त्रिफला चूर्ण


      
     अधिकांश लोग त्रिफला को इस रुप में तो जानते ही हैं कि पोली हरड, बहेडा व आंवला के सूखे फलों के पिसे मिश्रण के मिक्स चूर्ण को त्रिफला चूर्ण कहते हैं और यह पेट साफ करने अथवा कब्ज के रोग को दूर करने हेतु उपयोगी होता है  किन्तु इस चूर्ण की यह जानकारी बेहद अधूरी है । यदि हरड 100 ग्राम, बहेडा 200 ग्राम और आंवला 400 ग्राम को अलग-अलग पिसकर चूर्ण बनावें व इसे मिक्स करके मैदा छानने की चल्नी से तीन बार छान कर इस प्रकार से तैयार चूर्ण को इसके एक और मौसम से जुडे अनुपान द्रव्य के साथ मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल नियमित सेवन किया जावे तो सेवनकर्ता के शरीर से किसी भी प्रकार की बीमारी कोसों दूर ही रहती है । पहले इसमें मौसम के अनुसार मिलाये जाने वाले अनुपान द्रव्य के बारे में समझा जावे-

14 जनवरी से 13 मार्च तक (शिशिर ऋतु) में 
लेंडी पीपल का चूर्ण मात्रा का आठवां हिस्सा.

14 मार्च से 13 मई तक (वसन्त ऋतु) में 

शहद चटनी जैसा मिश्रण उत्तम

14 मई से 13 जुलाई तक (ग्रीष्म ऋतु) में 

गुड चौथा हिस्सा

14 जुलाई से 13 सितंबर ( वर्षा ऋतु ) में 

सेंधा नमक छठा हिस्सा

14 सितंबर से 13 नवंबर (शरद ऋतु) में 

देशी खांड/शक्कर बुरा छठा हिस्सा

14 नवंबर से 13 जनवरी (हेमन्त ऋतु) में 

सौंठ का चूर्ण छठा हिस्सा
                   उपरोक्त अनुपात में त्रिफला चूर्ण में मिलाकर सुबह सामान्य फ्रेश होने के बाद खाली पेट 20 से 40 वर्ष की उम्र में चाय का एक चम्मच, (लगभग 5 ग्राम) व इससे अधिक उम्र में 1+ 1/2 चम्मच मात्रा में यह चूर्ण आधा कटोरी पानी में उपरोक्त अनुपान द्रव्य के साथ मिलाकर पी लेना चाहिये व इसके एक घंटे बाद तक चाय-दूध नहीं लेना चाहिये । यह त्रिफला चूर्ण चार महिने के बाद प्रभावहीन हो जाता है और इसमें गुठिलयां सी बनने लगती हैं अतः पूर्ण लाभ प्राप्ति के लिये बाजार से तैयार त्रिफला चूर्ण खरीदने की बजाय इसे सीमित मात्रा में घर पर ही मिक्सर में पीसकर तैयार करें, व सीलन से बचाते हुए तीन महीने में समाप्त कर पुनः नया चूर्ण बनालें । इसके सेवन करने पर आपको एक या दो बार पतले दस्त लगते हुए महसूस हो सकते हैं । अधिक सुविधा के लिये आप इस मिश्रण को रात्रि में कटोरी में घोलकर रखदें व सुबह 5 से 7 बजे तक के समयकाल में सेवन करलें । यदि कोई भी व्यक्ति इस तरीके से इस चूर्ण का लगातार 12 वर्ष तक सेवन कर सके तो माना जाता है कि- 
 
       एक वर्ष तक लगातार सेवन करने से सुस्ती गायब हो जाती है । दो वर्ष तक सेवन करने से शरीर के सब रोग दूर हो जाते हैं । तीन वर्ष तक सेवन करने से नेत्र-ज्योति बढती है । चार वर्ष तक सेवन करने से चेहरे पर अपूर्व सौंदर्य छा जाता है । पांच वर्ष तक सेवन करने से बुद्धि का जबर्दस्त विकास होता है । छः वर्ष तक सेवन करने से शरीर बल में पर्याप्त वृद्धि होती है । सात वर्ष तक सेवन करने से सफेद बाल फिर से काले हो जाते हैं । आठ वर्ष तक सेवन करने से वृद्ध व्यक्ति पुनः युवा हो जाता है । नौ वर्ष तक सेवन करने से दिन में भी तारे स्पष्ट दिखने लगते हैं । दस वर्ष तक सेवन करने से कण्ठ में सरस्वती का वास हो जाता है । ग्यारह वर्ष तक सेवन करने से वचनसिद्धि प्राप्त हो जाती है अर्थात व्यक्ति जो भी कहे उसकी बात खाली नहीं जाती बल्कि सत्य सिद्ध होती है । लेखक ने इस बात को कविता के रुप में इस प्रकार कहा है-


प्रथम वर्ष तन सुस्ती जावे, 
द्वितीय रोग सर्व मिट जावे.
तृतीय नैन बहु ज्योति समावे, 
चौथे सुन्दरताई आवे.
पंचम वर्ष बुद्धि अधिकाई, 
षष्ठम महाबली होई जाई.
केश श्वेत श्याम होय सप्तम, 
वृद्ध तन तरुण होई पुनि अष्टम.
दिन में तारे दिखे सही, 
नवम़ वर्ष फल अस्तुत कही.
दशम शारदा कण्ठ विराजे, 
अंधकार हिरदे का भागे,
जो एकादश, द्वादश खाये, 
ताको वचन सिद्ध हो जाये ।

        निश्चय ही सुनने में यह अतिशयोक्तिपूर्ण लगता है । शायद ऐसा पूरी तरह से नहीं भी हो पाता हो, किन्तु हमारे शरीर को जो लाभ इसके सेवन से मिलते हैं वे शरीर को नियमित तौर पर स्वस्थ रखने के लिये इतने पर्याप्त तो होते हैं कि सामान्य तौर पर हमारा शरीर लम्बे समय तक हर प्रकार के रोगों से मुक्त रहता है ।

        इसका एक उदाहरण तो मेरे अपने परिवार में मेरे बडे भाई साहेब श्री महेन्द्र बाकलीवाल का ही है जिन्होंने लगभग 15 वर्ष पूर्व तक इसे इसी रुप में सेवन करते हुए अपने 12 वर्ष के सेवनकाल की अवधि को पूर्ण किया था । तत्पश्चात वर्तमान में वे 80-81 वर्ष की उम्र में भी पूर्णतः निरोग अवस्था में अकेले बम्बई जैसे महानगर में रहकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं जहाँ एक गिलास पानी भी यदि उन्हें पीना है तो देने वाला कोई नहीं है, उनकी धर्मपत्नि का स्वर्गवास हो चुका है और विवाहित पुत्र-पुत्रियां अलग-अलग शहरों में अपने परिवार के साथ रहते हैं ।
 
          मैं स्वयं इसे नियमपूर्वक कभी नहीं ले पाया किन्तु अनियिमत क्रम में सुबह एक बार की चाय पीने के बाद इसका सेवन यदा-कदा करता रहा हूँ और पिछले 40 वर्षों से बेहद अनियमित जीवन जीते रहने के बाद भी 59 वर्ष की उम्र में अब तक तो किसी भी प्रकार की बीमारी के आक्रमण से मुक्त चल रहा हूँ ।
 
       अतः यदि आप भी इसे किसी भी उम्र में व किसी भी शेडयूल (नियमित या टूटते हुए क्रम) में लेना प्रारम्भ करेंगे तो इसके पर्याप्त लाभ आपको अवश्य मिलेंगे जो आपके शरीर को बीमारियों से दूर रखने में हर तरह से मददगार साबित हो सकेंगे । 
(जानकारी- स्वदेशी चिकित्सा सार से साभार)

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