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रविवार, 30 अक्तूबर 2011

प्रथम वर्ष के समापन पर...

 
          आज 30 अक्टूबर को पिछले वर्ष 2010 में इस ब्लागजगत से इसी ब्लाग के माध्यम से विधिवत जुडने की शुरुआत हुई थी । बाद में विषय को अलग-अलग रखने के प्रयास में दो अन्य ब्लाग जिन्दगी के रंग और नजरिया मेरे द्वारा और बनाये गये । शुरु में ऐसा भी लगा कि यह ब्लाग बुरी तरह से पिछड रहा है और पाठकों का ऐसी स्वास्थ्योपयोगी जानकारी में कोई विशेष रुझान देखने में नहीं आता इसके प्रमाण रुप में मासिक आंकडे मेरे सामने दिख रहे थे-

          दिसम्बर-जनवरी के माह में जहाँ इसके बाद प्रारम्भ होने वाले ब्लाग नजरिया पर 41 फालोअर्स के साथ 2345 पाठक आये और जिन्दगी के रंग में 10 फालोअर्स के साथ 1207 पाठक आये वहीं इस ब्लाग पर मात्र 5 फालोअर्स के साथ कुल 483 पाठक ही अपनी उपस्थिति दर्ज करवा पाये । बाद के क्वार्टर में मार्च माह के अंत तक यही संख्या जहाँ नजरिया ब्लाग पर 95 फालोअर्स के साथ 7865 पाठकों तक और जिन्दगी के रंग में 37 फालोअर्स के साथ 3312 पाठकों तक जा पहुँची तब भी इस स्वास्थ्य-सुख ब्लाग में यह संख्या मात्र 24 फालोअर्स के साथ 2139 पाठकों तक ही पहुँच पाई और संख्याओं का यही अन्तर इन ब्लाग्स पर प्राप्त टिप्पणियों की संख्या में भी दिखाई दिया । लेकिन...

          इसके बाद जो तस्वीर बदली तो इस ब्लाग के पाठक दिन-ब-दिन दूसरे दोनों ब्लाग की तुलना में इस तेजी से आगे बढना प्रारम्भ हुए कि आज यह संख्या नजरिया ब्लाग पर बेशक 297 फालोअर्स के साथ 22783 पाठकों की व जिन्दगी के रंग ब्लाग पर 56 फालोअर्स के साश 7953 पाठकों की दिखाई दे रही है किन्तु इस ब्लाग पर फालोअर्स भले ही अभी तक 69 दिख रहे हों पर पाठक संख्या में यही ब्लाग सबसे आगे आकर 27422 पाठकों तक पहुँच चुका है । वह भी तब जबकि नजरिया ब्लाग पर कुल पोस्ट 77 और जिन्दगी के रंग ब्लाग पर कुल पोस्ट 61 प्रसारित हुई है और इस ब्लाग पर अभी तक कुल पोस्ट संख्या 32 के पार भी नहीं पहुँच सकी है ।

          निःसंदेह उन्नति के ग्राफ पर ये कोई फख्र करने योग्य आंकडे भले ही नहीं हों किन्तु मेरी वर्तमान कार्य-शैली मं पाठकों की यह आमदरफ्त भी मेरे लिये पर्याप्त संतोषप्रद हैं और इस रुप में आप सभी से जो जुडाव बना हुआ है वह आगे भी आपके ऐसे ही सहयोग से चलता रह सकेगा यही आशा है ।

          अपने सभी पाठकों, समर्थकों व इस ब्लाग की विशेष चयनित पोस्टों को चर्चा के माध्यम से अधिक पाठकों तक पहुँचा सकने वाले स्नेही साथियों के साथ ही सभी टिप्पणीकर्ताओं के प्रति अनेकों धन्यवाद सहित...

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

मुनाफे का खेल - संधि सुधा तेल.



          इन दिनों आप अपने टी. वी. के विभिन्न चैनलों पर प्रातः 7 से 8 के अतिरिक्त अन्य समय में भी चित्र मीडिया की लोकप्रिय हस्तियों- जैकी श्राफ, रोहिणी हट्टंगडी, गूफी पेन्टल, एस. एम. जहीर व पुराने जमाने की सुप्रसिद्ध फिल्मों के कलाकार विश्वजीत, अनिल धवन, बीना व अन्य अनेकों जानी-मानी हस्तियों के साथ ही कुछ देशी-विदेशी पीडित व चिकित्सक सहित अन्य बीस-तीस व्यक्तियों की उपस्थिति में कमर, पीठ व घुटने सहित शरीर के सभी जोडों के दर्द को दूर करने में कारगर बताये जा रहे एक दर्द निवारक संधि सुधा तेल का विज्ञापन अवश्य देख रहे होंगे । हिमालय की प्रसिद्ध जडी-बूटियों के नाम गिनवाते हुए 5,000/- रु. मूल्य के इस महत्वपूर्ण तेल की छोटी-छोटी तीन शीशीयों का पैक मात्र 2,950/- रु. + 150/- रु. वी. पी. शुल्क सहित 3,100/- रु. में इसे बेचने का अभियान इस विज्ञापन के द्वारा निरन्तर चल रहा है ।

          महज 30 वर्ष के आसपास की उम्र के कोरियर कम्पनी के एक डाकवाहक कर्मचारी की समस्या का निजात भी उसी कर्मचारी के मुखारविन्द से होते पूरे अभिनय के साथ आप इसमें देख सकते हैं । सर्वप्रथम तो यही बात समझ में नहीं आती है कि महज 4-5 हजार रु. मासिक का न्यूनतम वेतन प्राप्त कर पत्नी-बच्चों का पालन-पोषण करने वाला कोई कर्मचारी इतनी मंहगी कीमत के तेल का प्रयोग कैसे कर पाया होगा वह भी तब जबकि अपने उपर के बीस-पच्चीस हजार के कर्ज का भी वह उल्लेख करता नजर आ रहा हो । यदि इस तेल को प्रयोग कर चुका कोई भी वास्तविक पीडित स्वयं यदि यह प्रमाणित करे कि एक बार के 2-5 दिनों के कोर्स के बाद वह सदा के लिये समस्या मुक्त हो गया तब तो इस तेल के विज्ञापन में बताई जा रही कीमत मान्य समझी जा सकती है किन्तु यदि हर बार आवश्यकता के समय इस तेल को लगाते रहना अनिवार्य लगता रहे तो फिर सौ-दो सौ रुपये मूल्य के किसी भी अन्य दर्द निवारक तेल से अधिक विशेष इस तेल को कैसे माना जा सकता है ?
 
          जोडों का दर्द मानव जीवन में ऐसी एक आम समस्या है जिसका सामना उठने-बैठने व सोने के गलत तरीकों के कारण हममें से हर किसी को प्रायः कभी न कभी बल्कि कुछ लोगों को लगातार करना ही पडता है और 40-45 वर्ष की उम्र के बाद तो यह समस्या स्थायी रुप से मानव समुदाय में देखने को मिलती ही रहती है ऐसी स्थिति में इस दर्द से बचाव हेतु अत्यन्त गुणकारी व राहत दिलाने वाले तेल को आप स्वयं अपने घर में बनाकर आवश्यकतानुसार प्रयुक्त कर सकते हैं । इस गुणकारी व राहतप्रदाता तेल को बनाने की विधि इस प्रकार है-
 
          सामग्री- 1 लीटर सरसों का तेल, 250 ग्राम छिले हुए लहसुन की कलियां, 100 ग्राम अजवायन और एक 500 ml  की लाल रंग की कांच की खाली शीशी.
 
          विधि- सरसों के इस तेल को धीमी आंच पर गरम करने के लिये रखकर तेल गर्म होते समय ही इसमें लहसुन की ये छिली हुई कलियां और अजवायन डाल दें और इस तेल को धीमी आंच पर ही गर्म होते रहने दें । जब यह तेल इतना गर्म हो जावे कि इसमें मौजूद लहसुन की ये कलियां जलकर बिल्कुल काली पड जावें तब आंच बन्द कर दें व ठंडा हो जाने पर इस तेल को छानकर  लकडी के पटिये पर कांच की लाल शीशी रखकर व उसमें इसे भरकर  सुरक्षित रख दें व जले हुए लहसुन व अजवायन का बगदा फेंक दें । दूसरे दिन धूप निकलने पर सुबह 6 से शाम 6 बजे तक कांच की लाल शीशी में मौजूद इस तेल को लकडी के पटिये सहित धूप में रख आवें । दिन भर इसे धूप में रखा रहने दें व शाम होते ही पटिये सहित इस तेल को उठाकर वापस घर में रख लें । रात में तेल को खुले आसमान के नीचे न छोडें और तेल को घर से धूप में व धूप से घर में रखने के दौरान स्वयं भी नंगे पैर न रहें । दूसरे शब्दों में भूमि के अर्थिंग से इस तेल को पूरी तरह से बचाकर रखें । लगातार 7 दिनों तक इसी प्रकार इस तेल को दिन में धूप में रखते रहें व रात्रि में घर में रख लें । इसके पश्चातृ आप इस तेल को अपनी सुविधा अनुसार कांच या प्लास्टिक की छोटी व सफेद शीशी में भी भरकर काम में ले सकते हैं ।
 
          यह ध्यान दें कि इस प्रोसेस में आपका एक लीटर तेल कुछ आंच के साथ और कुछ उस बगदे के साथ मिलकर आधे से भी कम हो जावेगा । किन्तु आपके लिये यह बना हुआ तेल तेज से तेज जोडों के दर्द को भी दूर कर सकने में रामबाण साबित हो सकेगा । यदि आपमें से किसी ने इस विदेशी कंपनी द्वारा लंबे मुनाफे के गणित के साथ इन लोकप्रिय किन्तु अब नाममात्र की व्यस्तता वाली इन हस्तियों को साथ में लेकर जि संधि सुधा तेल की बमुश्किल 500 मि. ली. की मात्रा में लगभग 3,100/- रु. में बेचे जा रहे इस तेल का प्रयोग यदि कभी किया होगा तो आप इस तरीके से बनाये गये सरसों के इस तेल को भी गुणवत्ता में इस संधि सुधा तेल से कम नहीं पाएंगे ।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

हमारा स्वास्थ्य मित्र - ग्वारपाठा ( एलोवेरा ).


          वर्तमान समय में हर दूसरे, तीसरे या चौथे घरों में गमले में उगाये जाने वाले ग्वारपाठे के रस (जूस) का कारोबार बडी तेजी से देश-विदेश में फैलता जा रहा है इसका कारण ग्वारपाठे का हमारे शरीर के लगभग प्रत्येक हिस्से के लिये अत्यन्त उपयोगी होना ही है । स्वामी रामदेव जैसी चिर-परिचित शख्सियत भी अपने योग-शिविरों में न सिर्फ इसे गमले में उगा अपने साथ ही रखते हैं बल्कि इसकी गुणवत्ता की निरन्तर चर्चा किया करते हैं । आईये जानें कि एलोवेरा का यह जूस हमारे लिये कितना उपयोगी हो सकता है-

          1.  तेज धूप में निकलने से पहले एलोवेरा का यह रस अच्छी तरह से अपनी त्वचा पर लगा लें । यह माइस्चराइजर के रुप में भी काम करता है और सनबर्न से त्वचा को बचाता भी है । यदि तेज गर्मी के कारण आपकी त्वचा झुलस चुकी हो तो दिन में तीन बार त्वचा पर इसका रस लगाने से शीघ्र ही आराम पा सकते हैं ।

          2.  जलने या चोट लगने पर इसका जेल (गूदा) लगाने से बहुत आराम मिलता है । जलने के तुरन्त बाद उस जगह को ठण्डे पानी से धोकर यह जेल लगा लेने से फफोले भी नहीं निकलते और तीन-चार बार लगा लेने से जलन भी समाप्त हो जाती है ।
 
          3.  एक अच्छे स्वास्थ्यवर्द्धक पेय के रुप में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है । एक गिलास नारियल पानी में चार चम्मच यह रस मिलाकर पीना शरीर को उर्जा प्रदान करने के साथ ही गर्मी में घर से बाहर होने पर लू से बचाव भी करता है ।
 
          4.  बाहर घुमने वाले लोगों को अपनी त्वचा के साथ ही बालों की सुरक्षा की चिंता भी रहती है । बालों की खूबसूरती के लिये सप्ताह में दो बार शेंपू करने से पहले चमेली, जोजोवा या नारियल तेल में ग्वारपाठे का यह रस मिलाकर अच्छी तरह से अपने बालों में लगाएं । इससे बाल बेजान होने से बचने के साथ ही सुन्दर, स्वस्थ व लंबे बने रहेंगे ।

          5.  पाचनक्रिया और त्वचा पुनर्निमाण के लिये एलोवेरा का जूस लाभवर्द्धक होने के साथ ही इस रस को गर्मी के कारण निकलने वाले फोडे-फुंसियों से निजात पाने के लिये  त्वचा पर इसका रस लगाकर इस समस्या से बचाव के रुप में भी इसका उपयोग सफलतापूर्वक किया जाता है ।

          बाजार से इसका मंहगा जूस खरीदने की बनिस्बत आप इसके पत्तों को छील व काटकर मिक्सर में इतनी देर चलावें कि सारा गूदा जूस बन जावे । इस ताजे जूस को आप तीन-चार दिन काम में लेकर पुनः नया व ताजा जूस निरन्तर बनाकर काम में लेते रह सकते हैं ।

खाद्य सामग्री के रुप में इसका लाभ लेने के लिये-
 
          एलोवेरा के जूस में 50 ग्राम आटा ओसनवाकर उसकी रोटी या बाटी बनावें और अच्छा घी लगाकर इस पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्द्धक रोटी या बाटी को पर्याप्त घी के साथ खांएं ।

          एलोवेरा का अचार - नींबू, आम, आंवला आदि के समान ही ग्वारपाठे का अचार भी बनाया जाता है । ग्वारपाठे के पत्तों के टुकडे 1 कि., हल्दी और दालचीनी 5-5 ग्राम, साबुत अजवायन 20 ग्राम, सादा या सेधा नमक 10 ग्राम या स्वादअनुसार एवं मिर्च आपकी रुचि व स्वाद अनुसार मात्रा में लेकर इन सबको कांच के मर्तबान में भर दें । एक सप्ताह इसे दिन में धूप में रखकर कुछ दिन सामान्य तापमान में रखा रहने पर यह अचार तैयार हो जाएगा । इस अचार को प्रतिदिन थोडी-थोडी मात्रा में भोजन के साथ खाने से सभी प्रकार के उदर रोगों दूर होते हैं । बवासीर के रोगी को विशेष आराम मिलता है । यह अचार स्वादिष्ट व्यंजन होने के साथ ही गुणकारी औषधि भी है ।

रविवार, 14 अगस्त 2011

हार्दिक शुभकामनाएँ...






15 अगस्त 2011

देश के 65 वें 

स्वतंत्रता दिवस

के

शुभ अवसर पर

स्वास्थ्य-सुख

ब्लाग के 

सभी पाठकों,

समर्थकों व 

टिप्पणीकर्ता शुभचिन्तकों को 

हार्दिक बधाईयां एवं शुभकामनाएँ...


गुरुवार, 21 जुलाई 2011

उचित खान-पान



शाम को चावल, दही, मूली न खाया कीजिये,
गर सुबह मिल जाये तो हर्गिज न छोडा कीजिये.

दाल-चावल को सभी खाते हैं सीधे से उबाल,
हर किसी सब्जी को ऐसे ही बनाया कीजिये.

कोई भी सामान मैदे का बना, हाजिम नहीं,
पेट को मिर्ची से जितना हो बचाया कीजिये.
 
मौसमी हर फल है रखता, आपकी सेहत दुरुस्त,
जिस भी कीमत पर मिले, इन सबको खाया कीजिये. 

साथ खाने के जरा पानी भी पीना है मुफीद,
बाद खाने के जरा सा गुड भी खाया कीजिये.
 
दोपहर भोजन के बाद, थोडा सा आराम हो,
शाम को भोजन के फौरन बाद टहला कीजिये.
 
जितना सादा-औ-कुदरती हो सके भोजन करें,
सौंफ, जीरा, आंवला, नींबू न भूला कीजिये.
 
पेश्तर खाने के अदरक-औ-नमक खाया करें,
लाल गाजर, हरा धनिया, खूब खाया कीजिये.
 
तबियत न हो खाने की गर, तो कतई मत खाईये,
जब कभी भी हो सके, उपवास रखा कीजिये.
 
खाना खाकर जल न पीना, और न जब भूख हो,
अच्छे पाचन के लिये यह याद रखा कीजिये.

फायदे यूं बहुत हैं, सच बात तो है यह 'फिदा',
जो पच सके आराम से, बस वो ही खाया कीजिये.

'फिदा बनारसी'

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

कमर-दर्द (पीठ के दर्द) से बचाव के लिये-

           हमारे सामान्य शरीर स्वास्थ्य में कमर-दर्द की समस्या से हममें से अधिकांश लोगों का अक्सर सामना होता रहता है । वैसे तो इस समस्या के भी अलग-अलग व्यक्तियों में मोटापे व मधुमेह से सम्बन्धित स्थाई कारण हो सकते हैं जिनका रोग की गम्भीरता के मुताबिक समय रहते आवश्यक उपचार करवाना आवश्यक हो जाता है । किन्तु हम यहाँ सामान्य तौर पर उभरने वाले उस कमर-दर्द के बारे में विशेष रुप से चर्चा कर रहे हैं जो हमारे उठने, बैठने व सोने के गलत तरीकों के कारण किसी भी उम्र में अचानक हमें अपनी गिरफ्त में ले लेता है । ऐसे किसी भी आकस्मिक कमर-दर्द की स्थिति में बचाव हेतु-

          सौंठ को मोटा-मोटा (जौकूट) पीसकर रात्रि में सोने से पूर्व इस आधा चम्मच चूर्ण को दो-कप पानी में डालकर इतना उबालें कि यह पानी आधा कप बाकि रह जावे फिर इसे आंच से उतारकर ठण्डा करके छान लेने के बाद इसमें चाय के दो चम्मच भर मात्रा में अरण्डी का तेल (केस्टर आईल) मिलाकर सोते समय पी लें । इस प्रयोग से कमर, पेट व कूल्हे का दर्द दूर हो जाता है । 3-4 दिन के प्रयोग से इस समस्या से स्थाई राहत मिल सकती है ।

सहायक उपचार-
 
            1. बंगला पान में 1 ग्राम जायफल का चूर्ण डालकर खाने से कमर-दर्द से राहत मिलती है ।
 
            2. 100 ग्राम खसखस व 100 ग्राम मिश्री का चूर्ण बनाकर दो चम्मच चूर्ण सुबह शाम दूध के साथ लेने से कमर-दर्द दूर होता है ।
 
            3. तारपीन के तेल से कमर में मालिश करने से कमर दर्द दूर होता है ।
 
            4. होम्योपैथिक दवा - रसटाक्स, अर्निका, सिम्फाइटम, रुटा हाई पेरिकम सभी की 1000 शक्ति की समान मात्रा के मिश्रण की पांच-पांच बूंद आधे कप पानी में मिलाकर दिन में तीन बार पीने से कमर दर्द में पर्याप्त राहत मिलती है ।



शुक्रवार, 24 जून 2011

उपाय : निम्न रक्तचाप (लो ब्लड प्रेशर) से बचाव के...


          शरीर में रक्त की कमी हो जाने पर अधिकांश स्त्री-पुरुष निम्न रक्तचाप के शिकार हो जाते हैं । शारीरिक निर्बलता की स्थिति में अत्यधिक मानसिक श्रम व भोजन में पौष्टिक खाद्य पदार्थों की कमी से प्रायः यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।
          निम्न रक्तचाप की स्थिति में रोगी प्रायः घबराहट व थकावट सी महसूस करता है, जब-तब आंखों के आगे अंधेरा सा छा जाता है, स्मरण शक्ति क्षीण हो जाती है, सिर चकराने लगता है और रोगी को लगता है कि वह लडखडाकर गिर पडेगा ।

इससे बचाव के लिये-

          50 ग्राम देशी चने व 10 ग्राम किशमिश को रात्रि में 200 ग्राम पानी में चीनी के बर्तन या कांच के गिलास में गलाकर रख दें व सुबह उन चनों को किशमिश के साथ अच्छी तरह से चबा-चबाकर खाएँ व उस जल को भी पी लें । यदि देशी चने न मिल पावें तो सिर्फ किशमिश ही रात्रि को गलाकर सुबह चबा-चबाकर खा लें । इस विधि से कुछ ही सप्ताह में रक्तचाप सामान्य हो सकता है ।

सहायक उपचार-

          रात्रि के समय बादाम की 3-4 गिरी पानी में गला दें व प्रातः उनका छिलका अलग करके 15-20 ग्राम मक्खन-मिश्री के साथ मिलाकर उन बादाम-गिरी को खाने से निम्न रक्तचार नष्ट होता है ।

          प्रतिदिन आंवले या सेब के मुरब्बे का सेवन निम्न रक्तचाप में बहुत उपयोगी होता है ।
 
          आँवले के 2 ग्राम रस में 10 ग्राम मधु (शहद) मिलाकर कुछ दिन प्रातःकाल सेवन करने से निम्न रक्तचाप दूर करने में मदद मिलती है ।

          रात्रि में 2-3 छुहारे (खारक) दूध में उबालकर पीने या खजूर खाकर दूध पीते रहने से निम्न रक्तचाप में सुधार होता है ।
 
खानपान से सम्बन्धित उपचार-

          अदरक के बारीक कटे हुए टुकडों में नींबू का रस व सेंधा नमक मिलाकर किसी कांच के मर्तबान में रख लें । भोजन के पूर्व व उसके अलावा भी थोडी-थोडी मात्रा में दिन में कई बार इस अदरक को खाते रहने से यह रोग दूर रहता होता है ।
 
          200 ग्राम (तक्र) मट्ठे मे नमक, भुना हुआ जीरा व थोडी सी भुनी हुई हींग मिलाकर प्रतिदिन पीते रहने से इस समस्या के निदान में पर्याप्त मदद मिलती है ।
 
          खीरा ककडी, मूली, गाजर व टमाटर का सलाद खाते रहने से निम्न रक्तचाप के रोगी को बहुत लाभ होता है ।
          200 ग्राम टमाटर के रस में थोडी सी कालीमिर्च व नमक मिलाकर पीना लाभदायक होता है । उच्च रक्तचाप में जहाँ नमक के सेवन से रोगी को हानि होती है वहीं निम्न रक्तचाप के रोगियों को नमक के सेवन से लाभ होता है ।
          गाजर के 200 ग्राम रस में पालक का 50 ग्राम रस मिलाकर पीना भी निम्न रक्तचाप के रोगियों के लिये लाभदायक रहता है ।
          निम्न रक्तचाप के रोग में उपचार व बचाव के ये कुछ दादी-नानी के जमाने के नुस्खे हैं जिनमें से हम अपनी सुविधा के मुताबिक खान-पान व उपचार विधि का चुनाव कर रोगी का रोग स्थायी रुप से दूर करने का सफल प्रयास कर सकते हैं ।

सौजन्य : दादी-नानी के घरेलू नुस्खे से साभार...


        हमारे खाद्यान्न में तले हुए व्यंजन, मिठाईयां, निरन्तर चलन में बढते फास्ट-फूड, शराब-सिगरेट, तम्बाकू के सेवन के साथ ही वायुमंडल में व्याप्त घातक जहरीले रसायनों के कारण हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में ठोस चिकनाई व कोलेस्ट्रॉल की मात्रा सामान्यतः बढती जाती है, जो रक्त परिभ्रमण की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया के द्वारा ह्दय तक जाकर फिल्टर नहीं हो पाती और धीरे-धीरे वहाँ जमा होते रहकर उन्हें संकरा करते हुए दिल की सामान्य धडकनों को अनियमित करना प्रारम्भ कर देती है जिसके कारण हम सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी, चक्कर आना, तेज पसीना, बैचेनी व पेट से उपर के भाग में कहीं भी और प्रायः सीने या छाती में बांयी ओर दर्द का अहसास करते हैं और यही स्थिति निरन्तर बढते क्रम में होते रहने के बाद आगे जीवित रहने के लिये डॉक्टर बेहद खर्चीली एंजियोप्लास्टी और कभी-कभी जीवन के लिये खतरनाक बाय-पास सर्जरी का अंतिम विकल्प हमारे अथवा हमारे परिजनों के समक्ष रखते हैं जिसका दुष्परिणाम पूरे परिवार के लिये कभी-कभी जिंदगी भर की संचित बचत को उपचार में खर्च कर देने, बडा कर्ज लेने और किस्मत यदि खराब हो तो इसके बाद भी हमारे प्रिय परिजन को सदा-सर्वदा के लिये खो देने के रुप में हमारे सामने आता है ।
    इस स्थिति से बचाव के लिये समय रहते क्या कुछ किया जा सकता है ?  निःसंदेह हाँ... 
    अलसी के गुणों से हम अपरिचित नहीं हैं । मानव शरीर के लिये इसका तेल और भी अधिक गुणों का भंडार स्वयं में संजोकर रखता है किंतु उसमें भी घानी की अशुद्धियां, वसा की मौजूदगी और वातावरण के अच्छे-बुरे कारकों का प्रभाव मौजूद रहता ही है । इन अशुद्धियों को दूर करते हुए शरीर के लिये उच्चतम परिष्कृत पद्दतियों से निर्मित 'फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल' जिसमें ओमेगा 6, ओमेगा 9, अनिवार्य फेटी एसिड, फाईबर, प्रोटीन, जिंक, मेग्निशीयन, विटामिन व 60% तक शुद्ध ओमेगा 3 मौजूद रहता है । ये सभी मित्र घटक हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में मौजूद सभी प्रकार की अशुद्धियों की सफाई करने का कार्य अत्यंत सुचारु रुप से करने में सक्षम होते हैं ।
    यदि हम स्वयं इसका परीक्षण करके देखें तो थर्मोकोल (जो कभी में नष्ट नहीं होता व यदि इसे जलाया भी जावे तो और भी घातक रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल में व्याप्त होकर हमारे शरीर के लिये अधिक नुकसानदायक साबित होता है) इसकी किसी भी शीट का एक चने के बराबर छोटा टुकडा लेकर व इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल के एक केप्सूल को सुई की नोक से पंचर करके इसमें मौजूद उच्चतम गुणवत्ता के तेल को अपनी हथेली अथवा किसी प्लेट में निकालकर उसमें फाईबर के इस छोटे से टुकडे को डाल दें तो हम देखेंगे कि बमुश्किल 4-5 मिनिट में उस केप्सूल में मौजूद शुद्ध परिष्कृत जेल तेल में वह फाईबर का टुकडा गायब हो जाता है ।
    जब इसी फ्लेक्स ऑईल केप्सूल को हम नियमित रुप से अपने आहार में शामिल कर लेते हैं तो इसी प्रकार इसके शक्तिशाली घटक हमारे शरीर की रक्त-नलिकाओं में जमा सारा बे़ड कोलेस्ट्राल व अन्य अशुद्धियों को साफ करते हुए उन अवशिष्ट पदार्थों को मल-मूत्र के माध्यम से आसानी से शरीर से बाहर निकाल देते है और हम इन्हीं खान-पान व वातावरण में निरोगावस्था में अपना सामान्य जीवन जीते रह सकते हैं ।

   
          यदि उपरोक्त समस्याओं से ग्रस्त कोई व्यक्ति इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल को 2 या 3 केप्सूल आवश्यकतानुसार प्रतिदिन चार माह (120 दिन) तक नियमित रुप से ले तो जहाँ वह अपनी शारीरिक समस्याओं से मुक्त हो सकता है वहीं यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति 2 केप्सूल प्रतिदिन 2 से 3 माह (60 से 90 दिन) लगातार ले तो वह अगले एक वर्ष तक रक्त नलिकाओं की किसी भी समस्या से स्वयं को मुक्त रख सकता है ।
       90 केप्सूल का 515/- रु. मूल्य का यह केप्सूल पैक यदि आपके क्षेत्र में उपलब्ध हो तो आप इन्हें अपने आसपास से खरीदकर अपने दैनिक आहार में शामिल कर आपके अमूल्य ह्दय की न सिर्फ आज बल्कि आने वाले लम्बे समय तक सुरक्षा बनाये रख सकते हैं और यदि यह आपके क्षेत्र में उपलब्ध न हो पावे तो मात्र 65/- रु. पेकिंग व कोरियर खर्च अतिरिक्त रुप से वहन करते हुए 580/- रु. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 'इन्दौर साधना नगर ब्रांच' का उल्लेख करते हुए सेविंग A/c No. 53014770506 में सुशील कुमार बाकलीवाल के नाम से जमा करवाकर व मोबाईल नंबर +91 91799 10646 पर हमें Call अथवा WhatsApp मेसेज द्वारा अपना नाम व पूरा पता भेजते हुए घर बैठे प्राप्त कर अपने व अपने परिजनों के लिये इसका लाभ आवश्यक रुप से ले सकते हैं ।
    अनुरोध- यदि आपके क्षेत्र में ये केप्सूल उपलब्ध हों तब भी आप इन्हें खरीदने से पूर्व यदि इसके उपलब्धि स्थल की प्रमाणित जानकारी हमें भेजेंगे तो हम आपको यह भी बता पावेंगे कि उस स्थिति में आप इस पर 5%  से 10% तक अतिरिक्त बचत कैसे कर सकते हैं ।

शुक्रवार, 17 जून 2011

हाई ब्लड-प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव के कुछ सरल उपाय.(2)

          उच्च रक्तचाप के कारण और इससे बचाव के लिये वैद्य ठा. बनवीरसिंह 'चातक' (आयुर्वेद रत्न) द्वारा प्रस्तुत उपाय हमने इससे पहले के आलेख में आपकी जानकारी के लिये प्रस्तुत किये थे । उनके द्वारा प्रदर्शित उपाय के अलावा भी कुछ और उपाय जो थोडे सरल भी लगते हैं उनका भी उल्लेख अब आपकी जानकारी के लिये यहाँ प्रस्तुत है-
 
उच्च रक्तचाप के लक्षण-
          वर्तमान परिवेश में विभिन्न कारणों से तनावग्रस्त जीवनशैली के चलते प्रायः 40 के आसपास की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते कई लोग इस समस्या की गिरफ्त में आ जाते हैं । इस बीमारी में जहाँ रोगी के रक्त का दबाव 140/80 से अधिक हो जाता है वहीं रोगी का सिर चकराने लगता है । आँखों के आगे अंधेरा छाने लगता है और रोगी घबराहट महसूस करता है । कई बार सिरदर्द से बैचेनी बढती जाती है, नींद गायब सी हो जाती है और कभी-कभी कानों में तरह-तरह की अनावश्यक सी आवाजें सुनाई देती हैं । उच्च रक्तचाप की चिकित्सा में यदि लापरवाही की जावे तो वृक्क (गुर्दों) को विशेष हानि पहुँच सकती है । इससे बचाव के लिये निम्न उपाय जो प्रभावित रोगियों द्वारा किये जा सकते है, उनका विवरण निम्नानुसार प्रस्तुत है-
                  

दिल का दौरा महसूस होते ही रोगी यदि लहसुन की चार कलियां तुरन्त चबा ले तो हार्टफैल की स्थिति को भी इस तरीके से रोका जा सकता है । दौरा समाप्त होने के बाद नित्य कुछ दिन तक लहसुन की दो कलियां दूध में उबालकर लेते रहें । नंगे पैर चलने वालों को रक्तचाप की शिकायत प्रायः नहीं होती ।

          आंवला ताजा या सूखा आयुपर्यंत खाते रहने से अचानक हृदयगति रुकने की संभावना नहीं रहती और न ही उच्च रक्तचाप का रोग सम्बन्धित व्यक्ति को हो पाता है । रोगी व्यक्त को सुबह-शाम आंवले का मुरब्बा (एक-एक आंवले के रुप में) खाते रहना चाहिये । यदि किसी को मधुमेह (शुगर) की शिकायत हो तो उसे यह आंवला धोकर खाते रहना चाहिये ।

           उच्च रक्तचाप में त्रिफला चूर्ण के सेवन से भी पर्याप्त लाभ मिलता है । हरड, बहेडा व आंवला के समान अनुपात में मिश्रीत चूर्ण की 10 ग्राम के करीब मात्रा को रात्रि में एक गिलास जल में डालकर रख दें व सुबह उस चूर्ण को मसलकर व छानकर उसमें थोडी मिश्री मिलाकर पीते रहने से उच्च रक्तचाप नियंत्रण में रहता है । त्रिफला का ये मिश्रण कब्ज भी दूर करता है जिससे उच्च रक्तचाप के रोगी को विशेष लाभ मिलता है ।

          अत्यधिक बढे हुए रक्तचाप के रोगियों को यदि आक के फूलों की माला पहनाई जावे तो रक्तचाप नियंत्रण के लिये विशेष उपयोगी मानी जाती है इसके अतिरिक्त ऐसे रोगियों को पंचमुखी रुद्राक्ष की माला भी स्थाई रुप से पहनाई जा सकती है ।

सहायक उपचार...
          20 ग्राम प्याज के रस में करीब 10 ग्राम शहद मिलाकर प्रतिदिन पीने से उच्च रक्तचाप के रोगियों को बहुत लाभ मिलता है ।

           सर्पगंधा वनौषधि की जड के चूर्ण को प्रतिदिन 2 ग्राम मात्रा में दूध या जल के साथ सेवन करने से उच्च रक्तचाप कम होता है । अनिद्रा की समस्या दूर होकर रोगी को गहरी नींद भी आती है । यदि इसमें 1 रत्ती (=120 मिलीग्राम) शुद्ध शिलाजीत भी मिलाकर इसे दूध के साथ लिया जा सके तो रोगी को इससे विशेष लाभ होता है ।
 
          मैथीदाने का चूर्ण सुबह-शाम 3-3 ग्राम की मात्रा (चाय का 1 चम्मच = 5 ग्राम) में जल के साथ लेते रहने से उच्च रक्तचाप शांत होता है ।
 
          आंवला, सर्पगंधा व गिलोय का चूर्ण सममात्रा में बनाकर प्रतिदिन 3-3 ग्राम मात्रा में जल के साथ लेते रहने से उच्च रक्तचाप नियंत्रित रहता है ।
 
          अशोक के वृक्ष की छाल 20 ग्राम मात्रा में लेकर व उसे अधकूट कर उसका काढा बनाकर (दो गिलास पानी में इसे डालकर आंच पर इतना उबालें कि पानी की यह मात्रा आधा गिलास रह जावे) पश्चात् इसे छानकर व थोडी सी मिश्री मिलाकर  कुछ दिन पीने से भी उच्च रक्तचाप दूर हो सकता है ।

कुछ मौसमी उपाय भी...
          प्रतिदिन मूली को काटकर व उसमें नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से लाभ मिलता है । मूली में नमक न मिलावें ।

          गाजर का 200 ग्राम रस प्रतिदिन पीते रहने से रोगी को लाभ मिलता है । इससे उसकी घबराहट व बैचेनी भी दूर होती है । यदि गाजर के इस रस में 10 ग्राम शुद्ध शहद भी मिला लिया जावे तो इसके गुणों में विशेष वृद्धि हो जाती है ।

          अंगूर का सेवन भी रक्तचाप नियंत्रण में मददगार साबित होता है । 

          आलू का सेवन जहाँ कुछ चिकित्सक इस रोग में रोक देते हैं वहीं कुछ की धारणा के मुताबिक जल में नमक डालकर उबले हुए आलू का सेवन रोगी कर सकते हैं । अलबत्ता इसमें अलग से नमक न मिलावें ।
  
          उपरोक्त प्रस्तुत उपायों में रोगी की तासीर के अनुकूल व मौसम के मुताबिक उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए आप अपने परिजनों सहित स्वयं को न सिर्फ इस रोग से मुक्त रख सकते हैं बल्कि पहले से रोग रहने की स्थिति में अनुकूलता के मुताबिक रोगी का यथासम्भव सुरक्षित रुप से उपचार कर स्थिति को अनियंत्रित होने से रोक सकते हैं । इसके अतिरिक्त...

          उच्च रक्तचाप के सभी रोगियों को प्रतिदिन सूर्योदय के समय भ्रमण के लिये किसी पार्क में जाकर एक घंटे शुद्ध वायु के वातावरण में प्रतिदिन बैठने व इसी अवधि में ओस पडी हरी घास पर कुछ समय नंगे पैर
नियमित चलने से पर्याप्त लाभ मिलता है ।
 
संबंधित समस्या समाधान हेतु यह भी देखें- 
 


रविवार, 22 मई 2011

हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव.


          आप यह जानकर आश्चर्य कर सकते हैं कि आयुर्वेद के पुराने ग्रंथों में ब्लड-प्रेशर से सम्बन्धित उच्च रक्तचाप या निम्न रक्तचाप जैसी बीमारियों का उल्लेख प्रायः देखने को नहीं मिलता, याने प्राचीन काल में ये रोग या तो अस्तित्व में ही नहीं होता था या फिर इतने न्यून पैमाने पर होता होगा कि इसके बारे में अलग से जानकारियां खोजने की आवश्यकता ही नहीं पडती थी । जबकि वर्तमान समय में अधिकांश लोगों का जीवन चिन्ता और तनाव के ऐसे अनवरत चक्र की गिरफ्त में चल रहा है जिसका परिणाम हैं निरन्तर बढ रहे ब्लड-प्रेशर के रोगी, जिन्हें चिकित्सक की सलाह के मुताबिक बचाव की गोलियां प्रतिदिन खाना पड रही हैं और सामान्य धारणा के मुताबिक एक बार ये गोली खाना चालू करने के बाद इन्हें जीते जी बन्द कर पाना लगभग मुमकिन नहीं माना जाता, और इनके भी साईड इफेक्ट शरीर को निरन्तर झेलना ही पडते हैं । आखिर ये ब्लड-प्रेशर की समस्या क्या है और इससे कैसे दूर रहा जा सकता है । इसे समझने की कोशिश करें-

उच्च रक्तचाप क्या है
          हमारे शरीर की धमनियों में जो रक्त दौडता रहता है उसे गति मिलती है हमारे ह्रदय से जो दिन रात कार्य करते हुए इस रक्त को पम्प कर शुद्ध करता व रक्त पर दबाव डालकर धमनियों तक भेजता है । यहाँ तक की शारीरिक कार्यप्रणाली सामान्य अवस्था है लेकिन जब हमारे गलत आहार-विहार से इस प्रणाली में बाधा पहुँचती है तो या तो रक्तचाप कम हो जाता है जिसे हम लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) के नाम से जानते हैं या फिर बढ जाता है जिसे हम हाई ब्लडप्रेशर (उच्च रक्तचाप) के नाम से जानते हैं । सामान्य अवस्था में शिशु का रक्तचाप 80/50, युवकों का 120/70 और प्रौढों का 140/90 होता है । यह ब्लडप्रेशर पत्येक व्यक्ति के शरीर में श्रमकार्य करने पर, भागदौड करने पर या सोते समय अपने सीमित दायरे में घटता बढता रहता है लेकिन असामान्य घटबढ में यही उतार चढाव एक घातक रोग के रुप में हमारे शरीर में स्थान बना लेता है ।

          इस रक्तचाप के असामान्य रुप से कम-ज्यादा होकर रोग की अवस्था में पहुँचने के कुछ कारण तो शारीरिक होते हैं और कुछ मानसिक-
           शारीरिक कारण- रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढना, धमनियों का सख्त और संकुचित होना, मोटापा बढना, पैतृक प्रभाव होना, आयु बढने पर प्रौढ या वृद्धावस्था के प्रभाव से शरीर में विकार और निर्बलता आना, गुर्दे, जिगर और अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों में खराबी होना आदि कारण मुख्य रुप से कहे जा सकते हैं । इसके अतिरिक्त अपने आहार में ऐसे पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करना जो रक्त में कोलेस्ट्राल, शरीर में चर्बी (मोटापा), और मनोवृत्ति में उत्तेजना व तामसिक और राजसिक प्रवृत्ति उत्पन्न करते हों ब्लड-प्रेशर बढने के कारण बनते हैं । ऐसे आहार में माँस, अण्डे, शराब, नशीले पदार्थ, तम्बाकू, धूम्रपान, तेज मिर्च मसालेदार व तले हुए पदार्थों के अलावा अधिक प्रोटीन व फेट (वसा) वाले पदार्थों का सेवन शामिल है और वर्तमान जीवनशैली में ऐसे ही खान-पान का प्रयोग अधिकांशतः चल रहा है । 

          मानसिक कारण- मानव मन स्वभावतः संवेदनशील होता है और जो लोग भावुक प्रवृत्ति के होते हैं उनकी संवेदनशीलता और अधिक बढे हुए परिमाण में रहने के कारण किसी भी प्रकार की चिन्ता, दुःख, क्रोध, ईर्ष्या अथवा भय का आघात लगने पर दिल की धडकन अनायास ही तीव्र गति से बढ जाती है और स्नायविक संस्थान तनाव से भर जाता है जो मुख्य रुप से उच्च रक्तचाप में परिवर्तित होता रहता है । इसीलिये इन दुष्प्रवृत्तियों से बचने की सलाह अक्सर हमारे दैनंदिनी के जीवन में सामने आती रहती है । किन्तु वर्तमान जीवनस्तर में भौतिकतावादी ऐश्वर्यपूर्ण रहन-सहन की आवश्यकता से उपजी दिन भर की भागदौड से शरीर की थकान के साथ ही नाना प्रकार के सोच विचार, तिकडमबाजी, और दूसरे के अधिकारों को येन केन कब्जे में लेने जैसी जोड-तोड में लगे रहने से उपजे तनाव में हमारा दिमाग भी कमजोर होता चला जाता है जिसका परिणाम अन्ततः इस रोग के रुप में हमारे शरीर के सामने आता है ।

          महिलाओं के मामले में कुछ कारण और भी जुड जाते हैं जैसे परिवार नियोजन अथवा मासिक ऋतुस्त्राव को  नियंत्रित, नियमित और सन्तुलित करने के लिये खाई जाने वाली ऐलोपेथिक गोलियां का लम्बे समय तक सेवन करना जिनमें से कुछ ब्लड प्रेशर को बढावा देती हैं । खान-पान की आदतों से स्थूल शरीर का हो जाना और कई महिलाओं का पारिवारिक जीवन जिसमें वे मानसिक चिन्ता, पीडा और घुटन भरी जिन्दगी जीने पर स्वयं को विवश महसूस करती हों ये सभी कारण अंततः इस रोग में वृद्धि करते हैं ।

          उच्च रक्तचाप की स्थिति अचानक नहीं बनती बल्कि धीरे-धीरे और लम्बे समय में बनती है जिसका हमें वर्षों तक पता भी नहीं चल पाता । कुछ शारीरिक और मानसिक लक्षण शरीर की ओर से हमें मिलते भी हैं तो हम प्रायः उसका कारण कुछ और ही समझा करते हैं जैसे कब्जियत, सिरदर्द, सिर में भारीपन व तनाव, चक्कर आना, जल्दी थक जाना, ह्रदय की धडकन बढना, कभी-कभी सांस लेने में कष्ट होना, स्वभाव में चिडचिडापन, अनिद्रा और तबियत में बैचेनी आदि लक्षण हमें उच्च रक्तचाप का संकेत ही देते हैं किन्तु प्रायः हम इनके दूसरे ही कारण समझा करते हैं । 

          बचाव- सबसे पहले तो शारीरिक कारणों में गरिष्ठ व तामसी भोजन की बजाय सादा सुपाच्य आहार लें, पाचन शक्ति ठीक रखें, ऐसे खाद्य पदार्थों का अति सेवन न करें जो शरीर में मोटापा और रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढाते हों । श्रमकार्य करें या व्यायाम व योगासनों का नियमित अभ्यास करें । मानसिक कारण जो इस रोग की ओर ले जाते हैं उनसे जितना संभव हो बचे रहने का प्रयास करें । चिन्ता करने की बजाय किसी भी समस्या से बाहर निकलने के लिये चिन्तन करें । क्रोध, ईर्ष्या, शोक व अन्य अनावश्यक मानसिक वेगों से स्वयं को दूर रखने का प्रयास करें ।

          उच्च रक्तचाप की स्थिति में शरीर में उदरस्थ वायु दूषित हो जाती है जिसे हम प्रायः गैस ट्रबल का नाम देते हैं । यही दूषित वायु प्रचंड रुप में कुपित होकर पित्त को विकृत कर देती है और पित्त विकृति ही अम्लपित्त याने हाइपरएसिडिटी के रुप में परिणीत होकर अपान वायु के साथ मिलकर पूरे शरीर में फैलती हुई पाचन तंत्र को बिगाड देती है । इससे शरीर का समग्र रक्त गाढा होकर शरीर की बाह्यान्तरिक सभी शिराओं (नसों) में कठोरता आ जाती है फलतः नियमित रक्त संचार में बाधा आती है जिसे हम उच्च रक्तचाप के रुप में जानते हैं । यही रक्तचाप जब बहुत अधिक बढ जावे तो शरीर पर पक्षाघात, लकवा या फालिज रोग का आक्रमण होता है । उच्च रक्तचाप में नींद नहीं आती, कभी-कभी दिल में (सीने में बांयी ओर) दर्द होता है । इस रोग का प्रारम्भिक लक्षण गैस ट्रबल ही है जिससे बवासीर, गठिया, श्वास-दमा जैसे जटिल रोगों के साथ ही शरीरांगों पर सूजन आना भी सम्भव है । 

          उच्च रक्तचाप (हाईपरटेंशन) का मरीज थोडी सी लापरवाही से ही घातक ह्रदय रोग, पक्षाघात या मस्तिष्क की रगें एकाएक फटने से मृत्यु का ग्रास बन सकता है अतः उच्च रक्तचाप होते ही मरीजों को अत्यन्त सावधान होकर सपथ्य चिकित्सा कारगर तरीके से करवानी चाहिये । 
  
          चिकित्सा- सर्वप्रथम गैस ट्रबल को नष्ट करने के लिये अदरक का लगभग 6 माह पुराना मुरब्बा दोनों समय के भोजन के बाद 5 ग्राम की मात्रा में खाकर 10 ग्राम बडी सौंफ को दो कप पानी में उबालकर एक कप पानी बच रहने पर ठंडा करके सौंफ को मसलकर उस पानी को छानकर पी लें । कब्ज यदि हो तो उसके उपचार हेतु दाडीमाष्टक चूर्ण रात्रि को सोने से पहले एक चम्मच फांककर थोडा सा पानी पी लें । ये क्रम 15 दिन से एक माह तक नियमपूर्वक  बनाएँ रखें जिससे आप गैस ट्रबल से पूरी तरह से छुटकारा पा सकते हैं । 
  
          इसके साथ उच्च रक्तचाप की चिकित्सा हेतु रौप्य भस्म, त्रिवंग भस्म, मणिष्य पिष्टी, सर्पगंधा का कपडछन चूर्ण (सभी 15-15 ग्राम), स्वर्णमाक्षिक भस्म, चन्द्रकलारस, सत्वगिलोय, अकीक पिष्टी, मुक्ता शुक्ति पिष्टी, प्रवाल चन्द्रपुष्टी, जटामांसी या बालछड का चूर्ण (सभी 30-30 ग्राम) मात्रा में लेकर इन सबको पक्के खरल में तीन घण्टे घोटकर किसी साफ शीशी में रख दें । दवा तैयार है । प्रातः शौचादि से निपटकर निराहार मुंह, और शाम 5 बजे के आसपास यह दवा आधा-आधा ग्राम की मात्रा में लेकर एक-एक चम्मच उत्तम दाडिमावलेह में मिलाकर चाट लें । इस दवा के नियमबद्ध तरीके से विश्वासपूर्वक सेवन करने व उपयुक्त परहेज का पालन करके सैकडों मरीज स्थायी लाभ प्राप्त कर सुखी जीवन जी रहे हैं । कोई भी जरुरतमंद रोगी आयुर्वेदिक दवा की दुकानों से इन दवाईयों को प्राप्त कर स्वयं को रोगमुक्त कर सकते हैं ।

           पक्षाघात (लकवा) के रोगी उच्च रक्तचाप से पीडित होते ही हैं, अतः ऐसे रोगी पहले हाई ब्लड प्रेशर नाशक उक्त दवा का नियमित सेवन करें तो धीरे-धीरे पक्षाघात भी नष्ट हो जाएगा । उच्च रक्तचाप के रोगियों को प्रायः गैस ट्रबल, कब्ज व अम्लपित्त (एसीडिटी) रहता ही है जिसके उपचार का तरीका अदरक के पुराने मुरब्बे और बडी सौंफ के अर्क के प्रयोग के रुप में उपर दिया जा चुका है इसके प्रयोग से पुराने से पुराना गैस्टिक (वायु विकार व अफारा) अवश्य ही नष्ट हो जाता है । रक्तचाप का जन्म कब्ज से और पक्षाघात रक्तचाप से ही होता है । उपरोक्त वर्णित अदरक का मुरब्बा, सौंफ अर्क और दाडिमाष्टक चूर्ण तीनों के नियमित सेवन से शरीर के भीतर के घटकों का शुद्धिकरण हो जाता है जिससे अन्य दवाएँ भी शीघ्रतापूर्वक गुणकारी असर करती हैं । कब्ज, अम्लपित्त और गैस्टिक के रहते हाई ब्लड प्रेशर और पक्षाघात (लकवा) का नष्ट हो पाना असम्भव है । अतः हमने इन सब व्याधियों की चिकित्सा एक साथ ही करने का निर्देश किया है । ब्लडप्रेशर में कोई भी तीव्र रेचन (जुलाब) हर्गिज न लें । उपरोक्त दाडिमाष्टक चूर्ण ही इसके लिये पर्याप्त है ।


व्यापक जनहित में प्रसारित-
सौजन्य  - वैद्य  ठा. बनवीर सिंह 'चातक' (आयुर्वेद रत्न)
    
     हमारे खाद्यान्न में तले हुए व्यंजन, मिठाईयां, निरन्तर चलन में बढते फास्ट-फूड, शराब-सिगरेट, तम्बाकू के सेवन के साथ ही वायुमंडल में व्याप्त घातक जहरीले रसायनों के कारण हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में ठोस चिकनाई व कोलेस्ट्रॉल की मात्रा सामान्यतः बढती जाती है, जो रक्त परिभ्रमण की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया के द्वारा ह्दय तक जाकर फिल्टर नहीं हो पाती और धीरे-धीरे वहाँ जमा होते रहकर उन्हें संकरा करते हुए दिल की सामान्य धडकनों को अनियमित करना प्रारम्भ कर देती है जिसके कारण हम सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी, चक्कर आना, तेज पसीना, बैचेनी व पेट से उपर के भाग में कहीं भी और प्रायः सीने या छाती में बांयी ओर दर्द का अहसास करते हैं और यही स्थिति निरन्तर बढते क्रम में होते रहने के बाद आगे जीवित रहने के लिये डॉक्टर बेहद खर्चीली एंजियोप्लास्टी और कभी-कभी जीवन के लिये खतरनाक बाय-पास सर्जरी का अंतिम विकल्प हमारे अथवा हमारे परिजनों के समक्ष रखते हैं जिसका दुष्परिणाम पूरे परिवार के लिये कभी-कभी जिंदगी भर की संचित बचत को उपचार में खर्च कर देने, बडा कर्ज लेने और किस्मत यदि खराब हो तो इसके बाद भी हमारे प्रिय परिजन को सदा-सर्वदा के लिये खो देने के रुप में हमारे सामने आता है ।
    इस स्थिति से बचाव के लिये समय रहते क्या कुछ किया जा सकता है ?  निःसंदेह हाँ... 
    अलसी के गुणों से हम अपरिचित नहीं हैं । मानव शरीर के लिये इसका तेल और भी अधिक गुणों का भंडार स्वयं में संजोकर रखता है किंतु उसमें भी घानी की अशुद्धियां, वसा की मौजूदगी और वातावरण के अच्छे-बुरे कारकों का प्रभाव मौजूद रहता ही है । इन अशुद्धियों को दूर करते हुए शरीर के लिये उच्चतम परिष्कृत पद्दतियों से निर्मित 'फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल' जिसमें ओमेगा 6, ओमेगा 9, अनिवार्य फेटी एसिड, फाईबर, प्रोटीन, जिंक, मेग्निशीयन, विटामिन व 60% तक शुद्ध ओमेगा 3 मौजूद रहता है । ये सभी मित्र घटक हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में मौजूद सभी प्रकार की अशुद्धियों की सफाई करने का कार्य अत्यंत सुचारु रुप से करने में सक्षम होते हैं ।
    यदि हम स्वयं इसका परीक्षण करके देखें तो थर्मोकोल (जो कभी में नष्ट नहीं होता व यदि इसे जलाया भी जावे तो और भी घातक रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल में व्याप्त होकर हमारे शरीर के लिये अधिक नुकसानदायक साबित होता है) इसकी किसी भी शीट का एक चने के बराबर छोटा टुकडा लेकर व इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल के एक केप्सूल को सुई की नोक से पंचर करके इसमें मौजूद उच्चतम गुणवत्ता के तेल को अपनी हथेली अथवा किसी प्लेट में निकालकर उसमें फाईबर के इस छोटे से टुकडे को डाल दें तो हम देखेंगे कि बमुश्किल 4-5 मिनिट में उस केप्सूल में मौजूद शुद्ध परिष्कृत जेल तेल में वह फाईबर का टुकडा गायब हो जाता है । 


      जब इसी फ्लेक्स ऑईल केप्सूल को हम नियमित रुप से अपने आहार में शामिल कर लेते हैं तो इसी प्रकार इसके शक्तिशाली घटक हमारे शरीर की रक्त-नलिकाओं में जमा सारा बे़ड कोलेस्ट्राल व अन्य अशुद्धियों को साफ करते हुए उन अवशिष्ट पदार्थों को मल-मूत्र के माध्यम से आसानी से शरीर से बाहर निकाल देते है और हम इन्हीं खान-पान व वातावरण में निरोगावस्था में अपना सामान्य जीवन जीते रह सकते हैं ।
        यदि उपरोक्त समस्याओं से ग्रस्त कोई व्यक्ति इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल को 2 या 3 केप्सूल आवश्यकतानुसार प्रतिदिन चार माह (120 दिन) तक नियमित रुप से ले तो जहाँ वह अपनी शारीरिक समस्याओं से मुक्त हो सकता है वहीं यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति 2 केप्सूल प्रतिदिन 2 से 3 माह (60 से 90 दिन) लगातार ले तो वह अगले एक वर्ष तक रक्त नलिकाओं की किसी भी समस्या से स्वयं को मुक्त रख सकता है ।
            90 केप्सूल का 515/- रु. मूल्य का यह केप्सूल पैक यदि आपके क्षेत्र में उपलब्ध हो तो आप इन्हें अपने आसपास से खरीदकर अपने दैनिक आहार में शामिल कर आपके अमूल्य ह्दय की न सिर्फ आज बल्कि आने वाले लम्बे समय तक सुरक्षा बनाये रख सकते हैं और यदि यह आपके क्षेत्र में उपलब्ध न हो पावे तो मात्र 65/- रु. पेकिंग व कोरियर खर्च अतिरिक्त रुप से वहन करते हुए 580/- रु. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 'इन्दौर साधना नगर ब्रांच' का उल्लेख करते हुए सेविंग A/c No. 53014770506 में सुशील कुमार बाकलीवाल के नाम से जमा करवाकर व मोबाईल नंबर +91 91799 10646 पर हमें Call अथवा WhatsApp मेसेज द्वारा अपना नाम व पूरा पता भेजते हुए घर बैठे प्राप्त कर अपने व अपने परिजनों के लिये इसका लाभ आवश्यक रुप से ले सकते हैं ।
    अनुरोध- यदि आपके क्षेत्र में ये केप्सूल उपलब्ध हों तब भी आप इन्हें खरीदने से पूर्व यदि इसके उपलब्धि स्थल की प्रमाणित जानकारी हमें भेजेंगे तो हम आपको यह भी बता पावेंगे कि उस स्थिति में आप इस पर 5%  से 10% तक अतिरिक्त बचत कैसे कर सकते हैं ।

शनिवार, 14 मई 2011

एक गम्भीर मानसिक समस्या - डिप्रेशन (अवसाद)

          इसी ब्लाग की पिछली पोस्ट एक चमत्कारिक पुष्प औषधि - रेस्क्यू रेमेडी की टिप्पणियों में सुश्री Roshi ji का एक प्रश्न डिप्रेशन के संदर्भ में-
 
     mujko bhi thora dipression rehta hai med ki poori jankari de

          हममें से अधिकांश व्यक्तियों का वास्ता अपने घर-परिवार से लगाकर अपने नाते रिश्तेदारों व अपने परिचितों के दायरे में किसी न किसी डिप्रेशन के रोगी को देखने या उसके बारे में सुनने-जानने का अवश्य रहा होगा । इसे हम ऐसी मानसिक बीमारी भी कह सकते हैं जिसके लिये कहा जा सके कि- देखन में छोटी लगे, घाव करे गंभीर. 
 
        मेरी भतीजी जो अपनी स्वभावगत जिन्दादिली से उपजी हँसी-खुशी से अपने सम्पर्क में आने वाले हर शख्स को चिन्तामुक्त व प्रसन्न कर देती थी उसे भी इस डिप्रेशन (अवसाद) के रोग की चपेट में आकर दुनिया से रुखसत होते मैंने देखा है । वैसे तो किसी भी समस्या को शरीर में जन्म ले सकने के अनेकों कारण हो सकते हैं किन्तु प्रायः इस रोग की शुरुआत हम रोगी की उस मानसिक स्थिति से जोडकर देख सकते हैं जहाँ दुनियावी व्यवहार में व्यक्ति को लगातार ये लगता रहे कि मेरे साथ न्याय नहीं हो रहा है और यह भावना जैसे-जैसे गहरी होती जाती है वैसे-वैसे रोग का मानसिक व शारीरिक वेग भी बढता जाता है । कुछ महिलाओं में प्रसव के बाद भी अवसाद की यह समस्या देखने में आती है ।

          इसके रोगियों को सबसे पहले तो मानसिक रुप से हँसमुख व चिन्तामुक्त रहने की अनिवार्य कोशिश करना चाहिये जिसमें योग व प्राणायाम इनके सिये सर्वाधिक मददगार साबित होते है । जब भी फुरसत में या एकान्त में रहें तब अपने मन-मस्तिष्क को निरर्थक व अनावश्यक विचारों से बचाने के लिये अपने मनपसन्द संगीत को सुनना प्रारम्भ कर देने की आदत अनिवार्य रुप से बनालें यह आपके लिये पूरी तरह से मददगार साबित होगी और इनके अलावा- 
 
          अपने किसी भी प्रियजन से अपने मन की उहापोह के बारे में खुलकर चर्चा
अवश्य करें । अपने आप में अन्दर ही अन्दर घुटते न रहें ।
 
      
*   15-20 ग्राम गुलाब की पत्तियों को 250 मि. ली. उबलते पानी में डालकर गुलाब आसव के रुप में शक्कर व इलायची मिलाकर चाय-काफी की जगह इस पेय का उपयोग करें । सामान्य चाय बनाते वक्त भी इलायची को पीसकर चाय में मिलाकर अवश्य पीयें । अवसाद की स्थिति में इलायची का प्रयोग दवाई का काम करता है ।

   *   अवसाद और नाडी तंत्रिका की कमजोरी को दूर करने में काजू भी अत्यन्त उपयोगी होते हैं । यह विटामिन बी काम्प्लेक्स विशेषकर थायमिन से भरपूर होते हैं । काजू से राइबोफ्लेविन भी मिलता है जिससे उर्जा बनी रहती है और हम सक्रिय व प्रसन्न बने रह सकते हैं ।

     *     इसके अतिरिक्त अवसाद से उबरने के लिये सेवफल का सेवन अत्यन्त उपयोगी साबित होता है । इसमें विटामिन-बी, पोटेशियम और फास्फोरस जैसे कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो 'ग्लुटामिक एसिड' के बनने में सहायक होते हैं । ग्लुटामिक एसिड तंत्रिका कोशिकाओं में होने वाली क्षति को नियंत्रित करता है । सेवफल का प्रयोग एक गिलास कुनकुने दूध में 2 चम्मच शहद मिलाकर उसके साथ करने पर अधिक शीघ्रता से सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं ।
 
          यदि आपके परिवार में कोई भी सदस्य कभी इस रोग की गिरफ्त में आता दिखे तो अविलम्ब उस पर विशेष ध्यान दें । हरसंभव प्रयास के द्वारा उसका मन बहलाए और रोग को उस सीमा तक बने जहाँ तक न बढने दें जहाँ आधुनिक एलोपेथिक उपचार आवश्यक हो जावे, क्योंकि इस रोग में डाक्टरी उपचार में प्रयुक्त होने वाली एलोपैथिक दवाइयां बहुत अधिक साईड इफेक्ट भी पैदा करती हैं जो इससे प्रभावित रोगी के हित में नहीं होती ।

सोमवार, 9 मई 2011

एक चमत्कारिक पुष्प औषधि - रेस्क्यू रेमेडी.


          चिकित्सा  के  क्षेत्र  में  जो  विभिन्न  पद्धतियां प्रचलित  हैं  उनमें  एक  नाम  'बेच प्लावर रेमेडीज' का  भी मौजूद है । इस चिकित्सा पद्धति के आविष्कारक रहे हैं  डा. एडवर्ड बेच जो लन्दन में प्रमुख एलोपैथिक डाक्टर थे । इस चिकित्सा पद्धति से असन्तुष्ट होने से उन्होंने होम्योपैथिक डिग्री प्राप्त की और हो्म्योपैथिक पद्धति से चिकित्सा कार्य करना शुरु किया । लेकिन शीघ्र ही वे होम्योपैथिक पद्धति से भी असन्तोष का अनुभव करने लगे और किसी और भी सरल लेकिन सफल चिकित्सा पद्धति की खोज में लग गये । प्रकृति का अध्ययन करते हुए उनका ध्यान फूलों की तरफ गया । उन्होंने विचार किया कि स्वभावतः मनुष्य का मन फूलों की तरह कोमल होता है और मूलतः मनुष्य का अन्तर्मन सौम्य, सरल और भावुक होता है । इसका यह प्राकृतिक रुप मन के जिन छः शत्रुओं से बनता या बिगडता है उनके नाम हैं काम, क्रोध, मद्, लोभ, मोह और मत्सर इन्हीं विकारों के प्रभाव से मनुष्य अपना प्राकृतिक स्वरुप याने स्वाभाविक अवस्था खो देता है । स्वाभाविक अवस्था का होना स्वास्थ्य है और इसे खो देना अस्वास्थ्य है, रोग है । मनुष्य की स्वाभाविक अवस्था फूलों के समान है और यदि यह अवस्था बिगड जावे तो इसे सुधारने के लिये फूलों का प्रयोग किया जा सकता है ।

          सन 1930 से 1936 तक के 6 वर्ष डा. एडवर्ड बेच ने इसी खोज में गुजार दिये और हजारों फूलों पर रिसर्च करने के बाद 38 प्रकार के फूलों को मनुष्य के विकारों को दूर करने में सक्षम पाया और इन 38 प्रकार के फूलों से उन्होंने 38 दवाइयां बनाई जो इन्हीं डा. के नाम से बेच फ्लावर रेमेडीज के नाम से जानी जाने लगी । इन 38 दवाओं में से 5 दवाईयां मिलाकर जो 39वीं दवा बनाई गई उसका नाम "रेस्क्यू रेमेडी" रखा गया क्योंकि यह दवा किसी भी  खतरनाक और गम्भीर स्थिति से छुटकारा (रेस्क्यू) दिलाने वाली है । इन पांचों दवाइयों की संक्षिप्त जानकारी निम्नानुसार है-

          (1) राकरोज (Rockrose) - यह दवा किसी भी दुर्घटना के कारण मन में जो डर या दहशत बैठ जाती है उसके असर को दूर करती है । जब किसी भी दुर्घटना के कारण मन में इतना डर बैठ जाए कि हर समय वही घटना आंखों के सामने घूमती रहे तो यह दवा बहुत अच्छा काम करती है और मनुष्य शीघ्र ही सामान्य मानसिक अवस्था में आ जाता है ।

          (2) स्टार आफ बेथलहम (Star of Bathlehem) - यह दवा मानसिक आघात के असर को दूर करती है । कभी-कभी किसी दुर्घटना में शरीर के भीतर अन्दरुनी चोट लगती है जिसका तत्काल पता नहीं चलता पर बाद में शरीर में कष्ट पैदा हो जाता है । कई बार ऐसी किसी घटना का मन पर ऐसा गहरा असर होता है कि कई वर्ष गुजर जाने पर भी उसका असर नहीं जा पाता । उस स्थिति में यह दवा पूर्ण सकारात्मक प्रभाव मनुष्य के मन मस्तिष्क पर करती है ।

          (3) क्लेमेटिस (Clemeties) - यह दवा तब उपयोगी सिद्ध होती है जब किसी दुर्घटना के कारण कोई बेहोश हो जाए या अस्वाभाविक रुप से सो जाए, बेसुध हो जाए या कोई कल्पनालोक में खोया रहकर ख्याली पुलाव पकाता रहता हो तो यह दवा उसे सामान्य मानसिक अवस्था में ले आती है ।

          (4) इम्पेशेंस (Impatience) - किसी दुर्घटना के बाद की उत्तेजित अवस्था और चिडचिडेपन की स्थिति इस दवा के सेवन से दूर हो जाती है । जो स्वभाव से उतावले, जल्दबाद और किसी भी काम को फटाफट कर डालने की मनोदशा वाले होते हैं उनके लिये यह दवा पूर्ण उपयुक्त है । ऐसे लोग जल्दबाजी और उतावलेपन के कारण परिणाम की चिन्ता किये बिना ही काम कर डालते हैं और हमेशा बेसब्र, परेशान और तनावग्रस्त बने रहते हैं फलतः दुर्घटना के शिकार हो जाया करते हैं । वैसे भी मानसिक तनाव से पीडित होने पर होने वाली किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त बने ही रहते हैं । यह दवा इनके लिये उपयोगी साबित होती है ।

        (5) चेरीप्लम (Cherryplum) - किसी दुर्घटना का दिमाग पर ऐसा भयानक असर हो कि मानसिक संतुलन ही बिगड जावे या व्यक्ति असह्य पीडा से पागलों जैसी हरकत करने लगे, ओछी हरकतें करने लगे तो ऐसे निराश मनोरोगी को यह दवा धीरे-धीरे ठीक कर देती है । कई लोग निराशा के अतिरेक में आत्महत्या कर लेते हैं या फिर सामने वाले की हत्या पर उतारु हो जाते हैं । ऐसे रोगियों के लिये यह दवा संजीवनी समान असर कर उन्हें धीरे-धीरे ठीक कर देती है ।

          उपर इन पांचों दवाओं के जो-जो लक्षण बताये गये हैं वे हमारे या हमारे परिवारजन के जीवन में कभी न कभी घटित होते ही रहते हैं । इन लक्षणों के अनुसार इन पांचों दवाओं को आनुपातिक रुप में मिलाकर एक मिश्रण तैयार किया गया और इस 39वीं दवा का नाम "रेस्क्यू रेमेडी" रखा गया । यह दवा प्राथमिक उपचार का काम किस खूबी से दिखलाती है उसके कुछ वास्तविक उदाहरण निम्नानुसार हैं-

          एक दिन सडक पर एक व्यक्ति दूर्घटनाग्रस्त होकर बेहोश हो गया कुछ लोग उसे उठाकर मेरे क्लिनिक में ले आए मैंने एक कप में थोडा पानी लेकर 5-6 बूंद दवा रेस्क्यू रेमेडी की उसमें टपकाकर चम्मच से उसके मुंह में डलवाई थोडी सी दवा उसके होठों पर, कपाल पर और कान के पीछे भी लगा दी, कुछ ही क्षणों में उसे होश आ गया और हँसी-खुशी सबको धन्यवाद देकर वह व्यक्ति स्वयं चलकर वहाँ से चला गया ।

          एक तेरह वर्ष की लडकी को पहली बार मासिक धर्म हुआ तो खून बहता देखकर वह घबराहट के कारण बेहोश हो गई । उसकी माँ मेरे पास दवाई लेने आई । मैंने वृतांत समझकर उसे रेस्क्यू रेमेडी दे दी । बाद में माँ ने फोन करके बताया कि दवा देते ही वह लडकी सामान्य हो गई ।

          इस दवा से सम्बन्धित ऐसे अनेक अनुभव मुझे हो चुके हैं । सुप्रसिद्ध फिल्म स्टार स्व. अशोक कुमार (दादामुनि) जो होम्योपैथी के प्रकाण्ड विद्वान और शौकिया चिकित्सक रहे हैं उन्होंने निरोगधाम के लिये दिये एक साक्षात्कार में इस दवा की ऐसे ही अनेक उदाहरणों द्वारा बहुत प्रशंसा की थी जो निरोगधाम के वसन्त ऋतु अंक 1991 में प्रकाशित हुई थी । तभी से मैं इस चमत्कारी दवा का प्रयोग रोगियों पर करता आ रहा हूँ । यह दवा प्रत्येक घर में रखी जानी चाहिये जिससे कि जरुरत के वक्त फौरन इस्तेमाल की जा सके ।

सुप्रसिद्ध होम्योपैथ डा. विनयकांत चावला द्वारा निरोगधाम पत्रिका से साभार...

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

आपने पूछा है...? (1)

       इसी ब्लाग की 29 अप्रेल 2011 की पोस्ट : हठीला दुष्ट रोग सायटिका (गृद्धसी) की टिप्पणी पर- 

श्री राज भाटियाजी का प्रश्न-

       बहुत सुंदर जानकारी, मेरी बीबी की कलाई मे पिछले १५,२० दिनो से भयंकर दर्द चल रहा हे, जो हड्डी मे नही, हाथ के अंगुठे के पीछे जहां कलाई शुरु होती हे वहां हे, डा० को दिखा दिया, इलाज चल रहा हे, लेकिन आराम नही आया, डा० का कहना हे कि एक महीना लगेगा, आप कुछ बताये?

उत्तर-

सम्माननीय श्री राज भाटियाजी सा.,

        आपके प्रश्न के सन्दर्भ में फिलहाल जो उपाय मुझे समझ में आ रहा है उसके मुताबिक योग की छोटी सी क्रिया का यदि भाभीजी दिन में लगभग 3 बार अभ्यास करें तो उन्हें अधिक राहत मिल सकती है । वीडियो उपलब्ध नहीं है और मुझे पोस्ट पर उसे लगाना अभी आता भी नहीं है इसलिये लिखकर ही बताने का प्रयास कर रहा हूँ-

        1. दुख रही कलाई की मुट्ठी बन्द करके बार-बार अंगूठे को खोलें व बन्द करें, फिर इसी अंगूठे को गोल घुमावें दांए से बांई ओर व बांए से दांई ओर समान मात्रा में क्लाकवाइज व एंटीक्लाकवाइज  (लगभग 10 से 40 बार तक प्रत्येक बार) सुबह, दोपहर फिर रात्रि में.

        2. कोहनी के नीचे तह किया हुआ टौलिया रखकर टेबल पर आरामदायक स्थिति में कोहनी टिकाकर या कोहनी के नीचे दूसरी हथेली का सहारा देकर कलाई के जोड से हथेली उपर व नीचे बार-बार करें, फिर हथेली की मुट्ठी बांधकर उपर नीचे करें, फिर मुट्ठी बंधी हुई अवस्था में गोल वृत्ताकार में घुमाएँ, दांए से बांई ओर व बांए से दांई ओर समान मात्रा में क्लाकवाइज व एंटीक्लाकवाइज (लगभग 10 से 40 बार तक प्रत्येक बार) सुबह, दोपहर फिर रात्रि में । इन दोनों अभ्यासों की शुरुआत कम मात्रा से करते हुए धीरे-धीरे बढावें ।

        इस प्रक्रिया से जो मूमेंट भाभीजी की कलाई व अंगूठे के जोड के पीछे उन्हें मिलेगा उससे सम्बन्धित नस में हो रही किसी भी प्रकार की रक्त पूर्ति की बाधा दूर हो सकने में मदद मिलेगी व स्थाई रुप से कलाई बिना दर्द के अपने स्वाभाविक स्थिति में आ पावेगी । तब तक-

        3. यदि आपके उधर महानारायण तेल मिल सके तो उसे लाकर दर्द वाले स्थान पर हल्के हाथ से उसे आहिस्ता आहिस्ता मसाज रुप में लगावे, जोर लगाकर मसलना नहीं है । यदि महानारायण तेल उपलब्ध न हो सके तो 250 ग्राम सरसों के तेल में 50ग्राम छिली हुई लहसुन की कलियां डालकर आंच पर तब तक उसे गर्म करें जब तक की लहसुन की ये कलियां जलकर काली न पड जावें । पश्चात् तेल को आंच से उतारकर ठंडा होने पर उसे छानकर इस तेल का महानारायण तेल जैसा प्रयोग करें । (यह तेल बाद में भी जोडों के या अंदरुनी शारीरिक दर्द में काम आता रहेगा)

        4. तेज दर्द की स्थिति में न्यूनतम मात्रा में काम्बिफ्लेम या इस जैसी दर्द निवारक गोली लेने में भी परहेज न करें ।

        उम्मीद है कि दो दिन बाद से ही सुधार दिखते हुए लगभग एक सप्ताह के अभ्यास में भाभीजी को कलाई के इस दर्द से स्थाई आराम मिल सकेगा ।   

शुभकामनाओं सहित...

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

हठीला दुष्ट रोग : सायटिका (गृद्धसी)

        शरीर में जब कूल्हे से लगाकर एडी तक दर्द की इतनी तेज लहर उठती है जिसे व्यक्ति सहन नहीं कर पाता (और जहाँ हो जिस स्थिति में हो बैठना तब मजबूरी बन जाता हो) लगता है जैसे पैर फट जाएगा । जांघ और पिंडली के पिछले हिस्से में कूल्हे से नीचे तक एक नस होती है इसमें दर्द होने की स्थिति ही सायटिका कहलाती है । प्राय: प्रभावित व्यक्ति बांए पैर में कमर से लेकर एड़ी तक एक नस में बहुत ही तेज दर्द की उठती सी लहर जैसे बिजली चमकी हो ऐसा महसूस करता है । सामान्य धारणा के मुताबिक आधुनिक एलोपेथी चिकित्सा में इसका कोई सरल उपचार नहीं दिखता जबकि इस रोग से पीडित व्यक्ति ही इसकी भयावहता को महसूस कर पाता है । आयुर्वेद में इस रोग के उपचार हेतु उपलब्ध जानकारी निम्नानुसार है-

  निर्गुण्डी                     हरसिंगार का वृक्ष          हरसिंगार के फूल

        1. हरसिंगार का वृक्ष जिसे शैफाली, पारिजात या परजाता भी कहते हैं और जिसमें छोटे सफेद फूल जिनके बीच में केशरिया छींटे दिखाई देते हैं (और बहुतायद से ये फूल वर्षा ऋतु में दिखाई देते हैं) इसके ताजे 50 पत्ते और निर्गुण्डी के ताजे 50 पत्ते लाकर एक लीटर पानी में उबालें । जब पानी 750 मि. ली. रह जावे तब उतारकर व छानकर इसमें एक ग्राम केसर मिलाकर इसे बाटल में भरलें । यह पानी सुबह-शाम पौन कप मात्रा में दो सप्ताह तक पिएं और इसके साथ योगराज गुग्गल व वातविध्वंसक वटी 1-1 गोली दोनों समय लें । आवश्यकतानुसार इस उपचार को 40 से 45 दिनों तक करलें ।

अन्य उपचार-   
 
       2. एरण्ड के बीजों की पोटली बनालें व इसे तवे पर गर्म करके जहाँ दर्द हो वहाँ सेंकने से दर्द दूर होता है ।

        3. एक गिलास दूध तपेली में डालकर एक कप पानी डाल दें और इसमें लहसुन की 6-7 कलियां काटकर डाल दें । फिर इसे इतना उबालें कि यह आधा रह जाए फिर उतारकर ठण्डा करके पी लें । यह सायटिका की उत्तम दवा मानी जाती है ।
 
        4. सायटिका के दर्द को दूर करने के लिये आधा कप गोमूत्र में डेढ कप केस्टर आईल (अरण्डी का तेल) मिलाकर सोते समय एक माह पीने से यह दुष्ट रोग चला जाता है ।
 
        5. निर्गुण्डी के 100 ग्राम बीज साफ करके कूट-पीसकर बराबर मात्रा की 10 पुडिया बना लें । सूर्योदय से पहले आटे या रवे का हलवा बनाएँ और उसमें शुद्ध घी व गुड का प्रयोग करें, वेजीटेबल घी व शक्कर का नहीं । जितना हलवा खा सकें उतनी मात्रा में हलवा लेकर एक पुडिया का चूर्ण उसमें मिलाकर हलवा खा लें और फिर सो जाएँ । इसे खाकर पानी न पिएँ सिर्फ कुल्ला करके मुँह साफ करलें । दस पुडिया दस दिन में इस विधि से सेवन करने पर सायटिका, जोडों का दर्द, कमर व घुटनों का दर्द होना बन्द हो जाता है । इस अवधि में पेट साफ रखें व कब्ज न होने दें ।
 
        6. गवारपाठे के लड्डू- सायटिका या किसी भी वात रोग को दूर करने के लिये ग्वारपाठे के लड्डू का सेवन करना बहुत लाभकारी होता है ।
 
लड्डू बनाने की विधि-  
         गेहूँ का मोटा दरदरा आटा 1 किलो, असगन्ध, शतावर, दारु हल्दी, आंबा हल्दी, विदारीकन्द, सफेद मूसली सब 50-50 ग्राम लेकर कूट पीसकर मिलालें । ग्वारपाठे का गूदा  250 ग्राम के करीब निकाललें व गूदे में सभी 6 दवाई और आटा मिलाकर अच्छी तरह मसलें । अब इसमें 250ग्राम घी डालकर अच्छी तरह से मिलालें । जरा सा गर्म पानी डालकर मुट्ठे बनालें व घी में तलकर बारीक कूटकर मोटी छन्नी से छानकर घी कढाई में डाल दें और हिला चलाकर छोडी देर तक सेकें ताकि पानी का कुछ अंश यदि रह गया हो तो जल जाए । अब डेढ किलो शक्कर की चाशनी बनालें । मुट्ठों की कुटी हुई सारी सामग्री को मोटे चल्ने से छानकर इसमें आवश्यक मात्रा में घी डालकर चाशनी में डाल दें । जब जमने लगे तब 50-50 ग्राम वजन के लड्डू बनालें । इच्छा के अनुसार बादाम, पिश्ता, घी में तला गोंद सब 50-50 ग्राम, केशर 2 ग्राम और छोटी इलायची 10 ग्राम डालकर लड्डू बनालें । सुबह व शाम 1-1 लड्डू खाकर उपर से मीठा कुनकुना गर्म दूध पी लें । इसके बाद 3 घंटे तक कुछ खाना पीना न करें । 45 दिन तक नियमित रुप से यह लड्डू खाने से सायटिका (गृद्धसी) सहित अन्य सभी वात व्याधियां (विशेषतः जोडों के दर्द से सम्बन्धित) दूर हो जाती हैं ।

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