सोमवार, 8 अप्रैल 2013

अमृतसम उपयोगी - दही, मट्ठा, छाछ.


            दही-बडे, चाट, कचोरी, समोसे में इमली-अमचूर की खट्टी चटनी के मेल के साथ स्वाद प्रदायक नाश्ते के रुप में हम दही का अक्सर उपयोग करते हैं, दही का सर्वाधिक उपयोग भोजन के साथ और लस्सी के रुप में पीने में होता आया है । पंजाब सहित उत्तरी भारत में प्रायः दही-पराठे के नाश्ते से ही दिन की शुरुआत होती है और सौभाग्यसूचकता के मान से भी हम देखें तो परीक्षा देने, कोर्ट के विवादास्पद मुकदमेबाजी में तारीख पर उपस्थित होते समय या ऐसे ही किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिये घर से प्रसाद रुप में दही खाकर निकलते समय हमारी ये मान्यता साथ चलती है कि इससे हमारा कार्य सफल होगा ।

            दही, दूध से बनता है किन्तु दूध का जहाँ 32% हिस्सा हमारे शरीर के लिये उपयोगी होता है वहीं दही का 80% हिस्सा शरीर के उपयोग में आसानी से आ जाता है । दही बनता तो दूध से है किन्तु मानव शरीर के लिये सबसे जरुरी चूना तत्व केल्शियम दूध की तुलना में अठारह गुना अधिक दही में पाया जाता है और निर्विवाद मान्यता यह है कि दही उन्हें भी आसानी से पच जाता है जिन्हें दूध नहीं पचता । दही और मट्ठा अलग पदार्थ नहीं है मथा हुआ दही ही मट्ठा कहलाता है । रुप-रंग, स्वाद या सुगंध सब प्रकार से दही जीवन का अनिवार्य अंग होता है ।  


            उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड-प्रेशर) के रोगियों के लिये दही मट्ठा अमृत समान गुणकारी माना गया है । दही की लस्सी तपते शरीर को जिस ठंडक की तृप्ति दिलवाती है उसे इसके सभी जानने वाले बखूबी समझते हैं । छाछ पीने वालों को दिल के सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है । दही, मट्ठा और छाछ रक्त को साफ करके उसके शारीरिक संचार में सहायता करते हैं । लस्सी या मट्ठा पीने वालों का दिल मजबूत रहता है और बढती आयु का भी उन पर अन्य लोगों की तुलना में नगण्य सा ही असर पडता है ।

दही के बारे में प्रचलित कुछ अन्य धारणाएँ- 

केन्सर से बचना हो तो दही खाईये ।

बाल रेशम से मुलायम और मजबूत रखना हो तो सप्ताह में दो बार उनमें दही की मालिश कीजिये ।

मूत्राशय में पथरी की तकलीफ यदि हो तो छाछ के नियमित सेवन से वह गलकर बाहर निकल जाती है ।

चेहरे का सौन्दर्य और प्राकृतिक लालिमा दही-मट्ठे के नियमित सेवन से बढती है ।

बल-वीर्य में वृद्धि के साथ ही गाल, स्तन, जांघ और कूल्हों को संतुलित भराव दही-मट्ठे के नियमित सेवन से प्राप्त होता है ।

भांग का नशा ही नहीं किसी भी प्रकार की विषाक्तता का दही-मट्ठा शरीर पर विपरीत प्रभाव समाप्त कर देता है । 

पुरुषों को दही-मट्ठा बल-वीर्य देता है तो नारियों को मृदुलता, सुन्दरता, सुडौलता और सर्वांग सौष्ठव से भर देता है । 

नियमित सेवन करने वाले नर-नारियों को दही-मट्ठा दीर्घायु बनाता है ।

इसकी प्रशंसा पुराने लोग इस रुप में भी कर गये हैं-

जहाँ रहेगा दही व मट्ठा,
वेद्य वहाँ उल्लू का पट्ठा.

            सारतत्व ये है कि दही-मट्ठे का सेवन करने वाले रोगों से दूर रहते हैं इसलिये उन्हें डाक्टर या वैद्य के यहाँ जाने की आवश्यकता ही नहीं पडती । दही में दूध की तुलना में अठारह गुना अधिक केल्शियम होता है जिसे हम अधिक मात्रा में भी ले लें तो शरीर पर कोई बुरा असर नहीं पडता जबकि उपर से ली जाने वाली केल्शियम की गोली की मात्रा शरीर में यदि ज्यादा हो जावे तो अन्य नये रोग उत्पन्न करवा सकती है । दही-मट्ठे में ए, बी, सी, डी और ई ग्रुप के पांचों प्रकार के विटामिन पर्याप्त मात्रा में होते हैं । दही का पूरा लाभ लेने के लिये इसे मथ लेना (अर्थात् मट्ठा बना लेना) चाहिये, जितना अधिक दही को मथा जावेगा वह उतना ही हल्का, सुपाच्य, रोगनाशक और स्वास्थ्यवर्द्धक हो जावेगा ।

अमृत विष न बन जावे...
 
             दही यदि ताजा होगा तो तन्दरुस्ती देगा, एकाध दिन का बासी होगा तो उसमें अम्लता बढ जावेगी, अधिक बासी होगा तो खून में खराबी पैदा करेगा । इसलिये चाहे दही खाएँ या मट्ठा बनाकर पिएँ किन्तु दही हमेशा ताजा ही प्रयोग में लाएं जो सुहानी गंध छोड रहा हो और स्वाद में मधुर हो अतः कुछ बाते ध्यान में रखें-

पीतल, एल्यूमिनीयम या तांबे के बर्तन में दही न जमाएं ।

कांसे के बर्तन में दही डालकर न खाएँ ।

दही जमाने के लिये सदा मिट्टी का बर्तन और खाने के लिये हमेशा कलईदार, स्टील या कांच के बर्तन का प्रयोग करें.

दही जमाने वाले वर्तन में बुसांध न पैदा होने दें, उसे गर्म पानी से धोकर धूप में या आग में सुखाकर ही दूसरी बार काम में लाएं और दही जमाने के दौरान उस पर जालीदार कपडा ढांक कर रखें ।

दही हमेशा मलाई सहित खाएं और मट्ठा हमेशा मलाई वाले दूध का बनाकर पिएं ।

सर्दी के मौसम में मट्ठा ज्यों का त्यों पिएं उसमें पानी न मिलाएं ।

बरसात के मौसम में दही-मट्ठा त्याग दें सिर्फ दवा के रुप में आवश्यक लगे तो ही इसका सेवन करें ।

गर्मियों के मौसम में दही-मट्ठे से अधिक इसकी लस्सी या छाछ पिएं ।

रात्रि के समय व खाना खा चुकने के बाद दही न खाएं, लस्सी या छाछ पी सकते हैं । लस्सी या छाछ में कभी शहद न मिलाएं ये दोनों परस्पर विरोधी स्वभाव के होने के कारण विषाक्तता उत्पन्न करते हैं ।

            दही स्निग्ध, अग्निदीपक, श्वास, पित्त, रक्तविकार, सूजन, चर्बी तथा कफ बढाने वाला होता है । यह मूत्र-कृच्छ, जुकाम, शीत, विषम ज्वर, अतिसार, अरुचि और दुर्बलता जैसे रोगों में हितकारी और बलवीर्यवर्द्धक होता है । दही में अलग-अलग स्थितियों में मन्द, स्वादु, स्वाद्वम्ल, अम्ल और अत्यम्ल प्रकार की स्थितियां बन जाती हैं जो हमारे शरीर में उसी रुप में परिणाम देती है-

            1. मन्द दही - दूध के समान हल्का गाढा और कम पानी वाला होता है और यह मल-मूत्र, त्रिदोष और दाह को बढाता है अतः ऐसे दही का सेवन नहीं करना चाहिये ।

            2. स्वादु दही - यह दही बिल्कुल गाढा, स्वादिष्ट और खटाई रहित होता है इसीलिये इसे स्वादु कहा जाता है । यह शक्तिवर्द्धक, पाक में मधुर तथा वात और रक्त-पित्त को नष्ट करने वाला होता है और इसी दही का सेवन सर्वोत्तम हितकारी होता है ।

           3. स्वाद्वम्ल दही - यह खट्टा-मीठा, गाढा, थोडा कसैला और कम पानी वाला होता है और बाजार में प्रायः यही दही उपलब्ध होता है ।

          4. अम्ल दही - यह मिठास रहित खट्टा, पित्त और कफ बढाने वाला होता है । इसका सेवन नहीं करना चाहिये ।

           5. अत्यम्ल दही - जिसको मुंह में रखते ही तेज खट्टे स्वाद के कारण रोएं खडे हो जाएं, दांत खट्टे हो जाएं और गले में जलन प्रारम्भ हो जाए ऐसा दही अत्यम्ल दही कहलाता है । यह अग्निवर्द्धक, रक्तविकार और वात्-पित्त-कफ को तीव्र गति से बढाने वाला होता है अतः ऐसे दही का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिये ।
             
               स्वादु दही जिसे मिट्टी के बर्तन में जमाया गया हो वह सर्वश्रेष्ठ होता है । दही को रात में नहीं खाना चाहिये, यदि रात में दही खाना ही हो तो घी-शक्कर, शहद, आंवला या मूंग की दाल के साथ ही खाने का प्रयास करना चाहिये । घी या शक्कर मिलाकर दही खाने से रक्तपित्त और कफविकार नहीं होते । यदि रक्तपित्त या कफविकार की समस्या आपके साथ चल रही हो तो दही खाने से बचना चाहिये । दही में थोडा पानी मिलाकर मथ लेने से इसमें छाछ के गुण पैदा हो जाते हैं अतः अम्ल दही को थोडी मात्रा में छाछ के रुप में सेवन करना हितकारी हो सकता है ।
  

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