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शनिवार, 27 अप्रैल 2013

झुलसाती गर्मी में राहत व बचाव...


      गर्मी के मौसम में हमें अपने शरीर-स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरुक रहने की आवश्यकता होती है क्योंकि धूप की तेज किरणों के बीच अधिक पसीना निकलने के कारण धूप की तपिश, घमौरियां, लू, बुखार इस प्रकार की छोटी-छोटी समस्याएँ स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं जिससे हमार सामान्य काम-काज भी बाधित होते हैं ।

          इस समस्या से बचाव के लिये सबसे पहले तो हम दही व लस्सी को अपने भोजन में शामिल कर अपनी सामान्य सेहत को सुरक्षित रख सकते हैं क्योंकि दही शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाने में सहायक होता है अतः इसके नियमित प्रयोग से न सिर्फ शरीर के खून की व्यवस्थित सफाई होते रहने में मदद मिलती है बल्कि इससे आलस्य दूर होकर तनाव व थकान को दूर करने में भी शरीर को मदद मिलती है ।

          वयस्कों में केंसर व पार्किंसन जैसी बीमारियों को जड से मिटाने में भी दही पूरी तरह से सहायक साबित होता है । इसके बेहतर इस्तेमाल के लिये हम दही में थोडा पानी मिलाकर व मथकर इसका प्रयोग करते रह सकते हैं ।

इसके अलावा कुछ विशेष स्थिति में-
   
पित्त की मात्रा घटाने वाली लस्सी.
          सामग्री-  आधा कप पनीर, 1 कप दही, 2 कप पानी, आधा चम्मच धनिया पावडर और तीन खजूर.

          विधि - खजूर के छिलके उतारकर उसे पिसलें फिर इस मिश्रण में पनीर, दही, पानी व धनिया पावडर मिला कर अच्छे से मथलें । यदि गाढा लगे तो कुछ और पानी मिलाकर इसे आवश्यकतानुसार पतला कर इसका सेवन करने से प्यास सामान्य रहती है और लू व निर्जलीकरण की समस्या से बचाव बना रहता है ।

बैचेनी, पेशाब में कमी और कब्ज की समस्या का समाधान करने के लिये-
 
          एक कप दही, एक मध्यम आकार की खीरा ककडी, दो टमाटर, धनिया पत्ती (कोथमीर), आधा नींबू एक चुटकी पीपर और स्वाद अनुसार नमक मिलाकर इस सभी सामग्री को मिक्सर में पीसकर गिलास में डालकर काम में लें । इसके इस्तेमाल से मूत्र में रुकावट व निर्जलीकरण की समस्या दूर होती है और कब्ज की समस्या में इससे राहत भी पाई जा सकती है । 

लेमन जूस-
          दो बडे नींबू और आवश्यक शक्कर । दो गिलास पानी में यह नींबू निचोडकर 2 से 4 चाय चम्मच के बराबर (स्वाद अनुसार) शक्कर मिलाकर यह ज्यूस बनाले बने जहाँ तक पानी मिट्टी के बर्तन से ही लें । इसके प्रयोग से न सिर्फ प्यास सामान्य रहेगी बल्कि भूख में कमी, नाक से खून आना (नक्सीर), चिडचिडाहट से राहत दिलवाने के साथ ही अम्लता और अल्सर की समस्या दूर करने में मदद मिलेगी । 

संतरे का जूस-
 
          दो संतरों का जूस निकालकर उसमें एक लीटर पानी और दो चम्मच शहद मिलालें । जूस पीने के लिये तैयार है.

          इसके प्रयोग से गले के दर्द में राहत, वजन कम करने में मदद और खून आने, जी मचलाने उल्टी जैसी समस्याओं को दूर करने में मददगार है । 

हरे आम (केरी) का पना (झोलिया)-
          दो उबली कच्ची केरी, दो चम्मच नमक, आधा चम्मच या स्वेच्छा से लाल मिर्च, चार चम्मच चीनी और तीन चम्मच पुदीने का पत्ता लेकर केरी की गुठली निकालकर गूदा अलग कर उसमें थोडे पानी के साथ उपरोक्त सभी चीजों को इसमें मिला दें । यह पौस्टिक पना (झोलिया) तैयार है.

          इसको पीने से गर्मी में लू लगने का डर नहीं रहता और भर गर्मी में भी शरीर राहत का अहसास करता रहता है । 
  
          इसके अलावा भी गर्मी के इस चिलचिलाते मौसम में राहत बनाये रखने के लिये हमें पर्याप्त मात्रा में पानी पीने के साथ ही नींबू पानी, नारियल पानी जैसे पौष्टिक पेय पदार्थों का सेवन करते रहने के साथ ही मौसमी फल आम, केला, चैरी, तरबूज व खरबूज जैसे गर्मियों से राहत दिलवाने वाले खाद्य़ पदार्थों को अपने नियमित इस्तेमाल में अवश्य बनाये रखना चाहिये ।

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

वृद्धावस्था में नेत्ररोग मोतियाबिंद - आवश्यक जानकारी व उपचार.

          जब किसी कारणवश आँख के लैंस की पारदर्शिता कम या समाप्त हो जाती है जिससे व्यक्ति को धुंधला दिखाई देने लगता है तो उस स्थिति को मोतियाबिंद कहते हैं । इस रोग का प्रभाव सामान्यतः वृद्धावस्था में अधिक होता है किन्तु कभी किन्हीं विशेष परिस्थितियों में युवा, बच्चे व नवजात शिशु पर भी इसका प्रभाव हो सकता है । इस रोग का समय रहते उपचार करवा लेने पर सामान्य दृष्टि पुनः प्राप्त की जा सकती है ।

          मोतियाबिंद का कारण - सामान्यतः वृद्धावस्था, विटामिन तथा प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों की शरीर में कमी, सूर्य किरण तथा विषाक्त पदार्थों के सेवन से होना पाया जाता है । मधुमेह, आनुवंशिकता तथा संक्रमण, सूजन, व चोट का भी मोतियाबिंद की स्थिति बनने में योगदान रहता है ।

          लक्षण और चिन्ह - नेत्र दृष्टि का धुंधलापन मोतियाबिंद का प्रारम्भिक लक्षण हो सकता है । बिना किसी दर्द के धीरे-धीरे नजर कमजोर होती जाती है । शुरु में लेम्प, लाईट या चन्द्रमा एक से अधिक दिखाई पड सकते हैं । समय बीतने पर दृष्टि इतनी कमजोर पड जाती है कि व्यक्ति अपने सामान्य कार्यों के लिये घर से बाहर निकलने में भी डरने लगता है । दृष्टि कमजोर होने पर वह ठोकरें खाने लगता है और एक समय ऐसा भी आ सकता है जिसमें उसे सिर्फ रोशनी का ही आभास हो पाता है, इस स्थिति को 'परिपक्व मोतियाबिंद' (पका हुआ मोतियाबिंद) कहते हैं । यदि समय रहते इसका उपचार नहीं करवाया जावे तो यह नेत्रों में दबाव को बढा देता है जिससे आँख में कांचियाबिंद या आंतरिक सूजन भी आ सकती है जिससे आँख की रोशनी पूरी तरह से समाप्त हो सकती है । अतः मोतियाबिंद की पुष्टि होते ही प्रारम्भिक स्थिति में इसका आपरेशन करवा लेना श्रेयस्कर रहता है ।
  
           नीम हकीमों से सावधान - गांव, आदिवासी क्षेत्रों में घूमने वाले तथा बिना आपरेशन मोतियाबिंद के इलाज का दावा करने वाले नीमहकीमों से सावधान रहें । प्रायः गांव के लोग जो आपरेशन व अस्पताल में रहने के र्च से घबराते हैं वे इन नीम-हकीमों के शिकार बन जाते हैं और अपनी दृष्टि सदा के लिये खो बैठते हैं ।

         एक ही इलाज - सिर्फ आपरेशन - मोतियाबिंद का उपचार किसी भी दवा से सम्भव नहीं है चाहे दवा आँख में डालने की हो या खाने की । शुरुआत में चश्मे के नम्बर बदलने से लाभ मिल सकता है, किन्तु मोतियाबिंद का जाना-माना इलाज सिर्फ आपरेशन ही है । आपरेशन के पहले ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, ई.सी.जी. व संबंधित बीमारी की जांच अपने चिकित्सक की सलाह अनुसार करवालें ।

          यह भी ध्यान रखें कि मोतियाबिंद पूरा पका रहने पर चिकित्सक को आँख के अन्दर की अन्य खराबियां नहीं दिखती अतः आपरेशन के पूर्व यह बता पाना सम्भव नहीं रहता कि रोशनी कितनी आयेगी । यदि आँख का पर्दा व नस ठीक हो, आँख में कांचियाबिंद व अन्य बीमारियां न हों तो प्रायः रोगी को अच्छी रोशनी वापस मिल जाती है । 

           बिना लैंस प्रत्यारोपण के साधारण आपरेशन - साधारण आपरेशन में अपारदर्शी लैंस को हटा दिया जाता है जिससे बाद में मोटे चश्मे की सहायता से ही मरीज देख सकता है । इस मोटे चश्मे (लगभग +10.00 नंबर) की वजह से मरीज को कई समस्याओं का सामना करना पडता है जैसे-

          मोटे चश्मे से ही दिखता है चश्मा उतारने पर कुछ नहीं दिखता है ।

          मोटे चश्मे से वस्तु अपने आकार से 30 प्रतिशत बडी दिखती है । 

          सीढियां चढने-उतरने ड्राइविंग, सिलाई, बीनने में तकलीफ होती है ।

           दूर की वस्तु पास व आडी-तिरछी दिखाई देती है ।

          फ्रेम व मोटे चश्मे के कारण देखने का क्षेत्र कम हो जाता है दिससे अगल-बगल में देखने के लिये गरदन घुमाकर देखना पडता है ।

        यदि मरीज को केवल एक आँख में मोतियाबिंद है तो साधारण आपरेशन में केवल एक आँख में मोटा चश्मा (+10.00 नंबर का) लगाना पडेगा जिससे उसे दो-दो दिखने, व चक्कर, उल्टी आने की शिकायत बनी रहती है ।

           मोटे व भारी चश्मे से नाक-कान में दर्द व जख्म हो जाता है व चेहरा भद्दा दिखने लगता है ।

          कृत्रिम लैंस प्रत्यारोपण - मोटे चश्मे का उपयोग नहीं करना पडे इसके लिये कृत्रिम लैंस प्रत्यारोपण आपरेशन सर्वश्रेष्ठ है जिसमें मोतियाबिंद युक्त लैंस को निकालकर आँख में कृत्रिम लैंस लगा देते हैं ।
कृत्रिम लैंस - यह "पोली मेथएक्रीलेट" या साफ्ट पोलिमर एक्रीलिक का बना होता है एवं यह इंसान के वास्तविक लैंस की तरह काम करता है । किस मरीज को किस पावर व डिजाईन का लैंस लगाना है इसका निर्णय डाक्टर ही लेता है । कृत्रिम लैंस का नंबर "ए स्केन बायोमीटर" से निकालते हैं ।

लाभ - कृत्रिम लैंस के लाभ निम्नानुसार हैं-
 
         बिना चश्मे के भी दिखता है व प्राप्त दृष्टि बेहतर होती है । दूर और पास के लिये हल्का नंबर लगता है । प्रत्यारोपण में देखने का क्षेत्र सामान्य होता है ।

         लैंस प्रत्यारोपण मधुमेह व उच्च रक्तचाप वाले मरीजों में भी किया जा सकता है ।

        पैदाइशी मोतियाबिंद में भी 6 महिने से उपर के बच्चों को लैंस लगाया जा सकता है ।

          फेको इमल्सिफिकेशन विधि - आजकल मोतियाबिंद के लैंस को हटाने के लिये एक नवीनतम विधि फेको इमल्सिफिकेशन काफी लोकप्रिय है । यह अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित व प्रभावशाली है ।
         फेको इमल्सिफिकेशन मशीन एक कम्प्यूटराईज्ड इलेक्ट्रानिक्स मशीन है । इसमें एक बारीक सुई होती है जिसे आँख में एक छोटे रास्ते से (2 से 3 मि. मी. का चीरा लगाकर) प्रवेश कराते हैं यह सुई मोतियाबिंद को कई छोटे-छोटे भागों में विभाजीत कर खींच लेती है इसके बाद इसमें इन्ट्राआकुलर लैंस प्रत्यारोपित कर दिया जाता है । इसके कई फायदे हैं-

           बहुत ही छोटा घाव जो बिना टांके के भर जाता है । 

           आपरेशन के 2-4 घंटे बाद ही मरीज अपने घर जा सकता है ।

आपरेशन के बाद एक माह तक ध्यान रखें-
 
           गर्दन के नीचे से नहायें, मिट्टी का प्रयोग न करें ।

         अपने बालों को धोने के लिये सिर को बिस्तर के किनारे पर रखकर लेट जाएं व किसी दूसरे को इस तरीके से सिर धोने को कहें जिससे कि साबुन या पानी हर्गिज आँखों में न जाए ।

          नाक छिडकने एवं शौच में जोर न लगाएं ।

          तेजी से छींकें या खांसें नहीं, सुपारी न खाएं ।

         भारी वजन नहीं उठाएं,कोई भी चीज सिर नीचा करके न उठाएं व जिस आँख का आपरेशन हुआ है उस करवट न लेटें ।

        आँखों में दवा डालने व मल्हम लगाने से पहले अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह से साफ करलें ।

         आँख को धूल, धूप, धुंए, चोट व पानी से बचावें ।

         दिन में काला चश्मा पहनें व भीड से बचें ।

         आँख को संक्रामक रोग से बचाने के लिये आँख को गंदे कपडे या उंगली से न छुएं और न ही रगडें ।

         कुछ दिन आँख से पानी का बहना, जलन, चुभन व खुजली होना स्वाभाविक है । आँख लाल होने पर या दर्द होने पर तुरन्त अपने डाक्टर से सम्पर्क करें ।

      अपने डाक्टर की सलाहानुसार अन्य बीमारियां जैसे - मधुमेह, उच्च रक्तचाप, दिल की बीमारी, जोडों की बीमारी, दमा, खांसी या अन्य का इलाज नियमित रुप से कराते रहें ।

         आपरेशन के बाद के कुछ दिन तक रोशनी में धुंधलापन हो सकता है, 1-2 महिने में अपने डाक्टर से चश्मे हेतु आँखों की जांच करावें । प्रायः दूर व पास के लिये हल्के नंबर की आवश्यकता पड सकती है ।

लैंस प्रत्यारोपण से सम्बन्धित अन्य बातें

            1. लैंस प्रत्यारोपण में प्रत्येक आँख का 5,000/- से 50,000/- रु. तक खर्च आ सकता है जो कृत्रिम लैंस की गुणवत्ता, आपरेशन तकनीक, डाक्टर, शहर व अस्पताल की सुख-सुविधाओं पर निर्भर करता है । 

          2. यदि दोनों आँखों में मोतियाबिंद है तो दोनों आपरेशन में एक महिने का अन्तर रखा जाना चाहिये ।

         3. मोतियाबिंद आपरेशन के कुछ समय बाद कृत्रिम लैंस के पीछे की झिल्ली सफेद पड सकती है जिससे धुंधलापन आ जाता है । इसे (Yag) लेजर से काट दिया जाता है ।

           4. लैंस सस्ता हो या मंहगा या प्रत्यारोपण आपरेशन किसी भी तकनीक से किया जावे आँख की रोशनी सबमें लगभग दो माह पश्चात बराबर आती है, अतः आप अपने बजट को देखते हुए ही इस बारे में निर्णय लें । सभी क्वालिटी के लैंस लाईफलांग चलते हैं ।

           5. मोतियाबिंद के आपरेशन के बाद आँख में रोशनी का आना- कार्निया, रेटिना की खराबी, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, ग्लुकोमा, मेकुलोपेथी, पुरानी चोट का असर व अन्य बीमारियों के काम्प्लीकेशन पर निर्भर करता है ।

        6. जिन मरीजों को मेकुलोपेथी, आप्टिक एट्राफी या एम्बलायोपिया हो उन्हें बहुत कम रोशनी आती है ।

फ्री आई केम्प / प्राइवेट अस्पताल
 
        शासकीय अस्पतालों, सामाजिक संस्थाओं व ट्रस्ट हास्पिटल में समय-समय पर मुफ्त लैंस प्रत्यारोपण हेतु आई केम्प आयोजित किये जाते हैं । गरीब मरीज इनका लाभ ले सकते हैं ।

डा. हिमांशु अग्रवाल द्वारा लाला रामस्वरुप रामनारायण पंचांग से साभार...


मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

एंजियोप्लास्टी आपरेशन से बचें...!


         
            हमारे शरीर संचालन में शरीर का अशुद्ध होते रहने वाला रक्त जो ह्रदय तक पहुँचता है वो ह्रदय में मौजूद वाल्व प्रक्रिया से शुद्ध होकर वापस शरीर में परिभ्रमण करता है और इस प्रकार रक्त परिभ्रमण की ये प्रक्रिया जब तक हमारा जीवन है चलती रहती है । किन्तु जब ह्रदय में मौजूद वाल्व में अशुद्ध रक्त पहुँचता तो है किन्तु वहाँ से फिल्टर होकर वापस शरीरसंचरण हेतु निकल नहीं पाता तब उस अशुद्ध रक्त के ह्रदय में निरन्तर बढते दबाव से उत्पन्न वह दर्दनाक परिस्थिति जो रोगी का जीवन भी समाप्त कर दे उसे हम हार्ट-अटैक के रुप में जानते-समझते हैं, और जिस भी स्त्री-पुरुष के शरीर में हार्ट-अटैक की यह स्थिति बन जाती है डाक्टर उसका प्राथमिक उपचार एंजियोप्लास्टी आपरेशन मरीज का जीवन बचाने के लिये करते हैं जिसका सामान्य खर्च लगभग 3 से 5 लाख रु. तक मरीज के परिजनों को वहन करना पडता है ।
 
          भगवान न करे कि आपको कभी जिंदगी मे हार्ट-अटैक आए लेकिन अगर आ गया तो ? आपको डाक्टर के पास जाना ही पडेगा और आपको मालूम होगा कि इस एंजियोप्लास्टी आपरेशन में डाक्टर दिल की नली मे एक स्प्रिंग (spring) डालते हैं ! जिसे stent (स्टेंट) कहते हैं और ये stent (स्टेंट) अमेरिका से आता है जहाँ इसकी लागत (cost of production)  सिर्फ 3 डालर की होती है जिसके यहाँ काम में लेने पर रोगी या उसके परिजनों को लाखो रुपए का  भुगतान करना पडता है ।

          जबकि इसका आयुर्वेदिक इलाज बहुत बहुत ही सरल है । पहले आप यह समझ लीजिये कि ये (angioplasty) एंजियोप्लास्टी आपरेशन कभी किसी का सफल नहीं होता क्यूंकि डाक्टर जो spring दिल की नली मे डालता है  वो spring बिलकुल pen के spring की तरह होता है और कुछ दिनों बाद उस spring की दोनों side आगे और पीछे फिर blockage जमा होनी शुरू हो जाती है तब फिर दूसरा attack आता है और डाक्टर आपको फिर कहता है angioplasty आपरेशन करवाओ या फिर एंजियोग्राफी आपरेशन करवालो । इस तरह आपके लाखो रूपये लुट जाते है और आपकी ज़िंदगी इसी मे निकल जाती है।

अब समझिये इसका आयुर्वेदिक इलाज-
          हमारे देश भारत मे लगभग 3000 साल पहले एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे उनका नाम महर्षि वागवटजी था । उन्होने अष्टांग-हृदयम नामक पुस्तक लिखी थी और इस पुस्तक मे उन्होने बीमारियो को ठीक करने के हजारों सूत्र लिखे थे । ये भी उनमे से ही एक सूत्र है, इसमें वागवटजी लिखते है कि कभी भी ह्रदय को घात हो रहा हो, मतलब दिल की नलियो मे ब्लाकेज (blockage)  होना शुरू हो रहा हो तो इसका मतलब है कि रक्त (blood) मे acidity (अम्लता) बढ़ी हुई है ।

          अम्लता आप समझते है जिसको अँग्रेजी मे हम एसीडिटी acidity कहते हैं । यह अम्लता दो तरह की होती है जिनमें एक होती है पेट कि अम्लता और दूसरी होती है रक्त (blood) की अम्लता ।

            आपके पेट मे अम्लता जब बढ़ती है तो आप कहेंगे पेट मे जलन सी हो रही है, खट्टी डकार आ रही है, मुंह तक चरपरा पानी आ रहा है जब यही अम्लता (acidity) और बढ़ जाती है तो ये हायपरएसीडिटी hyperacidity कहलाती है  और पेट की यही अम्लता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त मे आ जाती है तो यह स्थिति रक्त-अम्लता (blood acidity)  होती है ।

          जब blood मे acidity बढ़ती है तो ये अम्लीय रक्त (blood) दिल की नलियो मे से निकल नहीं पाता और नलियों मे blockage कर देता है, तभी heart attack होता है । इसके बगैर heart attack हो ही नहीं सकता जिसे प्रायः कोई डाक्टर तफतीस से आपको नहीं बताते, क्यूंकि इसका इलाज अत्यन्त सरल है ।
  
इलाज क्या है ?
          वागबटजी लिखते है कि जब रक्त (blood) मे अम्लता (acidty) बढ़ जावे तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करें जो क्षारीय हैं आप जानते होंगे की हमारी खाद्य सामग्री में दो तरह की चीजे होती है 1. अम्लीय और 2. क्षारीय. (acid and alkaline)

            जब अम्ल और क्षार को मिला दें तो क्या होता है ? neutral होता है ये सब जानते है । तो वागबट जी लिखते है कि रक्त में अम्लता यदि बढ़ी हुई है तो क्षारीय (alkaline) चीजे खाने-पीने से रक्त की अम्लता (acidity) समाप्त हो जाएगी और फिर heart attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं बचेगी । अब आप जानना चाहेंगे कि ऐसी कौन सी चीजे है जो क्षारीय हैं और इस स्थिति में हमें खाना चाहिये ? 

            आपके रसोई घर मे सुबह से शाम तक ऐसी बहुत सी चीजे है जो क्षारीय होती हैं और जिन्हें यदि आप खाने-पीने के नियमित क्रम में शामिल कर लेंगे तो heart attack की कोई संभावना ही बाकि नहीं बचेगी ।

          सबसे ज्यादा आपके घर मे जो क्षारीय चीज है वह है लकी जिसे हम english मे bottle gourd कहते हैं और इसे आप सब्जी के रूप मे खाते है इससे ज्यादा कोई क्षारीय चीज नहीं है । तो आप रोज लकी का रस निकाल कर पिएँ या कच्ची लोकी खाएँ ।

          आपने स्वामी रामदेवजी को कई बार कहते सुना होगा कि लौकी का जूस पिओ । इस बाबद खबर यहाँ तक है कि लगभग तीन लाख से ज्यादा लोगों को उन्होने लोकी का जूस पिला-पिला कर ठीक कर दिया है और उसमे हजारों ऐसे  डाक्टर भी हैं जिन्हें खुद heart attack होने वाला था । ये डाक्टर भी वहाँ जाते हैं और उनका यही लौकी का रस 3-4 महीने पी-पी कर स्वस्थ होकर आते हैं और फिर उनके clinic पर बैठ जाते हैं । वे किसी को बताते नहीं कि हम कहाँ गए थे ! बल्कि किसी के पूछने पर कहते हैं कि हम न्यूयार्क-जर्मनी गए थे आपरेशन करवाने जबकि वो रामदेवजी के वहाँ गए थे और 3 महीने लौकी का रस पीकर आए हैं ! वो आपको नहीं बताते कि आप भी लोकी का रस पिओ । जबकि रामदेवजी भी लौकी के इस रस को वागवटजी के अध्ययन के आधार पर ही बताते हैं । वागवटजी कहते है कि रक्त की अम्लता कम करने की सबसे ज्यादा ताकत लौकी में ही है, तो आप लोकी के रस का सेवन करें । 

          अब प्रश्न यह हो सकता है कि कितना करें ? उत्तर है 200 से 300 मिलीग्राम प्रतिदिन पिएँ । कब पिये ? उत्तर है सुबह खाली पेट (toilet जाने के बाद ) पी सकते है या नाश्ते के आधे घंटे के बाद भी पी सकते है ।

          इस लौकी के रस को आप और ज्यादा क्षारीय बना सकते है । इसमे 7 से 10 पत्ते तुलसी के डाल लें । तुलसी बहुत क्षारीय है,  इसके साथ आप पुदीने के भी 7 से 10 पत्ते मिला सकते हैं । पुदीना भी बहुत क्षारीय है ! इसके साथ आप काला नमक या सेंधा नमक इसमें जरूर डालें, ये भी बहुत क्षारीय हैं ।

          लेकिन याद रखे नमक काला या सेंधा ही डाले, वो दूसरा आयोडीन युक्त सफेद नमक कभी न डालें क्योंकि ये आयोडीन युक्त सफेद नमक अम्लीय है । तो मित्रों आप इस लौकी के जूस का सेवन जरूर करें ।  2 से 3 महीने में ये आपकी सारी heart की blockage ठीक कर देगा ।  21वें दिन से ही आपको इसका सकारात्मक असर दिखना शुरू हो जाएगा । आपको किसी आपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी । घर में ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा और आपका अनमोल शरीर और लाखों रुपए आपरेशन के बच जाएँगे । आप सकुशल ये पैसे बचाने के बाद भले ही किसी गौशाला मे दान कर दें ।

स्व. राजीव दीक्षितजी के संकलन से साभार...

एक और सरल व संक्षिप्त उपचार...
        हमारे खाद्यान्न में तले हुए व्यंजन, मिठाईयां, निरन्तर चलन में बढते फास्ट-फूड, शराब-सिगरेट, तम्बाकू के सेवन के साथ ही वायुमंडल में व्याप्त घातक जहरीले रसायनों के कारण हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में ठोस चिकनाई व कोलेस्ट्रॉल की मात्रा सामान्यतः बढती जाती है, जो रक्त परिभ्रमण की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया के द्वारा ह्दय तक जाकर फिल्टर नहीं हो पाती और धीरे-धीरे वहाँ जमा होते रहकर उन्हें संकरा करते हुए दिल की सामान्य धडकनों को अनियमित करना प्रारम्भ कर देती है जिसके कारण हम सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी, चक्कर आना, तेज पसीना, बैचेनी व पेट से उपर के भाग में कहीं भी और प्रायः सीने या छाती में बांयी ओर दर्द का अहसास करते हैं और यही स्थिति निरन्तर बढते क्रम में होते रहने के बाद आगे जीवित रहने के लिये डॉक्टर बेहद खर्चीली एंजियोप्लास्टी और कभी-कभी जीवन के लिये खतरनाक बाय-पास सर्जरी का अंतिम विकल्प हमारे अथवा हमारे परिजनों के समक्ष रखते हैं जिसका दुष्परिणाम पूरे परिवार के लिये कभी-कभी जिंदगी भर की संचित बचत को उपचार में खर्च कर देने, बडा कर्ज लेने और किस्मत यदि खराब हो तो इसके बाद भी हमारे प्रिय परिजन को सदा-सर्वदा के लिये खो देने के रुप में हमारे सामने आता है ।
    इस स्थिति से बचाव के लिये समय रहते क्या कुछ किया जा सकता है ?  निःसंदेह हाँ...
    अलसी के गुणों से हम अपरिचित नहीं हैं । मानव शरीर के लिये इसका तेल और भी अधिक गुणों का भंडार स्वयं में संजोकर रखता है किंतु उसमें भी घानी की अशुद्धियां, वसा की मौजूदगी और वातावरण के अच्छे-बुरे कारकों का प्रभाव मौजूद रहता ही है । इन अशुद्धियों को दूर करते हुए शरीर के लिये उच्चतम परिष्कृत पद्दतियों से निर्मित 'फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल' जिसमें ओमेगा 6, ओमेगा 9, अनिवार्य फेटी एसिड, फाईबर, प्रोटीन, जिंक, मेग्निशीयन, विटामिन व 60% तक शुद्ध ओमेगा 3 मौजूद रहता है । ये सभी मित्र घटक हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में मौजूद सभी प्रकार की अशुद्धियों की सफाई करने का कार्य अत्यंत सुचारु रुप से करने में सक्षम होते हैं ।
    यदि हम स्वयं इसका परीक्षण करके देखें तो थर्मोकोल (जो कभी में नष्ट नहीं होता व यदि इसे जलाया भी जावे तो और भी घातक रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल में व्याप्त होकर हमारे शरीर के लिये अधिक नुकसानदायक साबित होता है) इसकी किसी भी शीट का एक चने के बराबर छोटा टुकडा लेकर व इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल के एक केप्सूल को सुई की नोक से पंचर करके इसमें मौजूद उच्चतम गुणवत्ता के तेल को अपनी हथेली अथवा किसी प्लेट में निकालकर उसमें फाईबर के इस छोटे से टुकडे को डाल दें तो हम देखेंगे कि बमुश्किल 4-5 मिनिट में उस केप्सूल में मौजूद शुद्ध परिष्कृत जेल तेल में वह फाईबर का टुकडा गायब हो जाता है ।
    जब इसी फ्लेक्स ऑईल केप्सूल को हम नियमित रुप से अपने आहार में शामिल कर लेते हैं तो इसी प्रकार इसके शक्तिशाली घटक हमारे शरीर की रक्त-नलिकाओं में जमा सारा बे़ड कोलेस्ट्राल व अन्य अशुद्धियों को साफ करते हुए उन अवशिष्ट पदार्थों को मल-मूत्र के माध्यम से आसानी से शरीर से बाहर निकाल देते है और हम इन्हीं खान-पान व वातावरण में निरोगावस्था में अपना सामान्य जीवन जीते रह सकते हैं ।
             यदि उपरोक्त समस्याओं से ग्रस्त कोई व्यक्ति इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल को 2 या 3 केप्सूल आवश्यकतानुसार प्रतिदिन चार माह (120 दिन) तक नियमित रुप से ले तो जहाँ वह अपनी सभी संबंधित शारीरिक समस्याओं से मुक्त हो सकता है वहीं यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति 2 केप्सूल प्रतिदिन 2 से 3 माह (60 से 90 दिन) लगातार ले तो वह अगले एक वर्ष तक रक्त नलिकाओं की किसी भी समस्या से स्वयं को मुक्त रख सकता है ।
        90 केप्सूल का 515/- रु. मूल्य का यह केप्सूल पैक यदि आपके क्षेत्र में उपलब्ध हो तो आप इन्हें अपने आसपास से खरीदकर अपने दैनिक आहार में शामिल कर आपके अमूल्य ह्दय की न सिर्फ आज बल्कि आने वाले लम्बे समय तक सुरक्षा बनाये रख सकते हैं और यदि यह आपके क्षेत्र में उपलब्ध न हो पावे तो मात्र 65/- रु. पेकिंग व कोरियर खर्च अतिरिक्त रुप से वहन करते हुए 580/- रु. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 'इन्दौर साधना नगर ब्रांच' का उल्लेख करते हुए सेविंग A/c No. 53014770506 में सुशील कुमार बाकलीवाल के नाम से जमा करवाकर व मोबाईल नंबर +91 91799 10646 पर हमें Call अथवा WhatsApp मेसेज द्वारा अपना नाम व पूरा पता भेजते हुए घर बैठे प्राप्त कर अपने व अपने परिजनों के लिये इसका लाभ आवश्यक रुप से ले सकते हैं । 

    अनुरोध- यदि आपके क्षेत्र में ये केप्सूल उपलब्ध हों तब भी आप इन्हें खरीदने से पूर्व यदि इसके उपलब्धि स्थल की प्रमाणित जानकारी हमें भेजेंगे तो हम आपको यह भी बता पावेंगे कि उस स्थिति में आप इस पर 5%  से 10% तक अतिरिक्त बचत कैसे कर सकते हैं ।

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

पथरी का उपचार...


          
            मित्रों, जिसको भी शरीर मे पथरी है वो चुना कभी ना खाएं ! (काफी लोग इसे पान मे डाल कर खाते हैं ) क्योंकि पथरी होने का मुख्य कारण आपके शरीर मे अधिक मात्रा मे कैलशियम का होना है | इसका मतलब जिनके शरीर मे पथरी हुई है उनके शरीर मे जरुरत से अधिक मात्रा मे कैलशियम है लेकिन वो शरीर मे पच नहीं रहा है , इसलिए आप चुना खाना बंद कर दीजिए

आयुर्वेदिक उपचार...
            सबसे पहले आप सोनोग्राफी करवा के पता करें की पथरी कि साइज़ की है | इसके बाद पखानबेद नाम का एक पौधा होता है जिसे कुछ लोग पथरचट भी बोलते है उसके पत्तों को पानी मे उबालकर काढ़ा बना ले और आधा-आधे या एक कप काढ़ा रोज पीएं और फिर 15 दिन बाद सोनोग्राफी करवाइए ।  मात्र 7 से 15 दिन मे पथरी खत्म हो जायेगी या फिर टूट कर आधी हो जायेगी । कई बार ये जल्दी भी खत्म हो सकती है ।

होमियोपेथी उपचार...
            अब होमियोपेथी मे एक दवा है जो आपको किसी भी होमियोपेथी के दुकान पर मिल सकेगी उसका नाम हे- BERBERIS VULGARIS  ये दवा के आगे लिखना है MOTHER TINCHER. ये उसकी पोटेंसी हे जिससे वो दुकानदार आपकी आवश्यकता समझ जायेगा, इस दवाई को होमियोपेथी की दुकान से ले आइये|

            (ये BERBERIS VULGARIS दवा भी पथरचट नाम के पोधे से बनी है बस फर्क इतना है कि ये dilutions form मे हैं पथरचट पोधे का botanical name BERBERIS VULGARIS ही है )

             अब इस दवा की 10-15 बूंदों को एक चौथाई (1/ 4) कप गुनगुने पानी मे मिलाकर दिन मे चार बार (सुबह,दोपहर,शाम और रात) लेना है । चार बार अधिक से अधिक और कम से कम तीन बार तो इसको लगातार एक से डेढ़ महीने तक लेना ही है, कभी कभी उपचार में दो महीने भी लग सकते हैं |

            इससे मरीज के शरीर में जितने भी stone है चाहे वो गोलब्लेडर (gall bladder ) मे हों या फिर किडनी मे या फिर युनिद्रा के आसपास हो अन्यथा मुत्रपिंड मे हो ये सभी स्टोन को पिघलाकर मूत्र मार्ग से शरीर से बाहर निकाल देता हे । इस अवधि में पानी अधिक से अधिक पिएं ।

            99% केस मे डेढ़ से दो महीने मे ही सब पथरी टूट कर निकल जाती ह, कभी कभी हो सकता हे तीन महीने भी लग जावे इसलिये आप दो महिने बाद सोनोग्राफी
अवश्य करवा लें जिससे कि आपको पता चलता रहे कि स्टोन कितना टूट चुका है और कितना बाकि रह गया है । अगर रह गया हो तो थोड़े दिन और यह होम्योपैथी दवा ले लीजिए । इस दवा का कोई साइड इफेक्ट नहीं है ।

            ये तो हुआ जब stone टूट के निकल जावे उसका इलाज, अब दोबारा भविष्य मे यह ना बने उसके लिए क्या ? क्योंकि कई लोगो को बार बार पथरी होती है, इसके लिए एक और होमियोपेथी मे दवा है CHINA 1000 प्रवाही स्वरुप की इस दवा क एक ही दिन सुबह-दोपहरशाम मे दो-दो बूंद सीधे जीभ पर डाल दीजिए ।  सिर्फ एक ही दिन मे तीन बार ले लीजिए फिर भविष्य मे स्टोन कभी भी नहीं बनेगा|

अमर शहीद राजीवजी दीक्षित जी के संकलन से...


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

आरोग्यवर्द्धक तुलसी


    भारतीय घरों में यह एकमात्र ऐसा सुपरिचित दिव्य पौधा है जिसे इसकी धार्मिक महिमा और सर्वसुलभता के कारण बचपन से ही हम इसे अपने इर्दगिर्द देखना प्रारम्भ कर देते हैं । हिन्दू धर्म में मंदिर में पूजा व प्रशाद में तो इसका प्रयोग हम निरन्तर देखते ही हैं किन्तु इसके अलावा भी यह औषधिय व प्राकृतिक गुणों का भण्डार है । फेंगशुई मत के मुताबिक तुलसी की घर-आंगन में मौजूदगी से वह घर सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रहता है । तुलसी का पौधा आंगन में लगाने से वातावरण शुद्ध रहता है, मच्छर नहीं आते हैं, व्यायाम करते समय श्वसन क्रिया बढ जाने पर इसकी वहाँ मौजूदगी में हमें अतिरिक्त प्राणवायु की प्राप्ति होती है इसीलिये बाबा रामदेव जैसे विख्यात लोग भी नित्य सुबह मंच पर इसकी मौजूदगी में ही अपना यौगिक अभ्यास करते हैं ।


      औषधिय गुणों के हिसाब से तुलसी-  रस में तिक्त, अंशतः कटु, पचने में हल्की गर्म, रुक्ष, कफ-वात नाशक, रुचि व पाचन क्रिया को बढाने वाली, सुगंधित, सात्विक और कृमि दुर्गंध का नाश करने वाली होती है । तुलसी के सेवन से अरुचि, बुखार, कूकर खांसी, और दमे के उपचार में विशेष लाभ होता है और खांसी, शूल और उल्टी की समस्या भी इसकी सेवन से प्रभावशाली तरीके से दूर की जा सकती है । इसके अतिरिक्त आधासीसी सिरदर्द, कानों से पीप निकलना, मुँह की दुर्गंध, कृमि, और सीने के दर्द के उपचार में भी तुलसी का प्रयोग किया जाता है । 
   
     
      सर्दी के मौसम में अदरक और तुलसी के रस में शहद मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से शरीर को अच्छे परिणाम मिलते हैं । खांसी में काली तुलसी के रस में बराबर का शहद मिलाकर सेवन करने से खाँसी की समस्या दूर होती है । कान से दुर्गंधकारी पीब निकलने की समस्या में सिर्फ तुलसी पत्ते के रस डालने से उपचार हो जाता है । किन्तु समस्या यदि ज्यादा गम्भीर होती है तो तुलसी पत्तों के रस में सरसों का तेल मिलाकर व पकाकर उसकी कुछ बूंदें कान में डालने की सलाह इसके जानकार देते हैं । बुखार की किसी भी समस्या का उपचार करने के लिये आधा ग्राम त्रिभुवन कीर्ति रस के साथ दो चम्मच तुलसी और अदरक का रस सममात्रा में मिलाकर रोगी को पिलाया जा सकता है । दमे के आक्रमण का उपचार करने के लिये तुलसी की पांच ग्राम के करीब मंजरियां (फूल) लेकर उससे दुगनी मात्रा में उसमें सोंठ मिलावें और उसका काढा बनाकर (100 ग्राम जल 25 ग्राम रह जावे इतना उबालकर) ठण्डा होने पर उसमें शहद मिलाकर दो-तीन बार पीएँ । यदि मुंह से दुर्गंध आती हो तो प्रतिदिन तुलसी की 25 पत्तियां चबाकर खा लेने की आदत से मुख की दुर्गंध समाप्त हो जाती है । 

तुलसी के पुंस्त्व में बढोतरी हेतु गुणकारी उपचार...
 
पुरुष वर्ग में...
      नपुंसकता, शीघ्र पतन एवं वीर्य की कमी - तुलसी के 5 ग्राम बीज रोजाना रात को गर्म दूध (अनुकूल न लगे तो पानी) के साथ लेने से नपुंसकता दूर होती है और यौन-शक्ति में बढोतरी होती है। पहले किंतु सिर्फ एक ग्राम तुलसी फूल (मंजरी) लेने से शुरुआत करें और प्रतिदिन एक-एक ग्राम बढाते हुए पांचवें दिन से पांच ग्राम की मात्रा को नियमित करें ।

महिला वर्ग में...
      मासिक धर्म में अनियमियता - जिस दिन मासिक आए उस दिन से जब तक मासिक रहे उस दिन तक तुलसी के बीज 5-5 ग्राम सुबह और शाम पानी या दूध के साथ लेने से मासिक की समस्या ठीक होती है और जिन महिलाओ को गर्भधारण में समस्या है वो भी ठीक होती है ।

     
      तुलसी के पत्ते गर्म तासीर के होते है पर इसके बीज शीतल प्रवृत्ति के होते हैं इनका उपयोग फालूदा बनाने में भी किया जाता है । इसे भिगाने से यह जेली की तरह फुल जाता है । इसे दूध या लस्सी के साथ थोड़ी देशी गुलाब की पंखुड़ियां डाल कर पिया जावे तो यह गर्मी में बहुत ठंडक भी देता है । .इसके अलावा यह पाचन सम्बन्धी गड़बड़ी को भी दूर करता है । .यह पित्त घटाता है और त्रीदोषनाशक, क्षुधावर्धक होता है ।

    तुलसी की क्यारी या गमले में जब भी बहुत सारे (फूल) मंजरियां लग जावें तो उन्हें पकने पर तोड़ ही लेना चाहिए वरना तुलसी के पौधे में चीटियाँ और कीड़ें लग जाते है और उसे समाप्त कर देते है । इन पकी हुई मंजरियों से काले रंग के बीज निकलते हैं उसे एकत्र कर ले ।  स्त्री-पुरुषों के पुंसत्व से संबंधित समस्याओं के समाधान हेतु यह पूर्ण असरकारक माना जाता है और ये बाजार में पंसारी या आयुर्वैदिक दवाईयो की दुकान पर भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है ।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

अमृतसम उपयोगी - दही, मट्ठा, छाछ.


            दही-बडे, चाट, कचोरी, समोसे में इमली-अमचूर की खट्टी चटनी के मेल के साथ स्वाद प्रदायक नाश्ते के रुप में हम दही का अक्सर उपयोग करते हैं, दही का सर्वाधिक उपयोग भोजन के साथ और लस्सी के रुप में पीने में होता आया है । पंजाब सहित उत्तरी भारत में प्रायः दही-पराठे के नाश्ते से ही दिन की शुरुआत होती है और सौभाग्यसूचकता के मान से भी हम देखें तो परीक्षा देने, कोर्ट के विवादास्पद मुकदमेबाजी में तारीख पर उपस्थित होते समय या ऐसे ही किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिये घर से प्रसाद रुप में दही खाकर निकलते समय हमारी ये मान्यता साथ चलती है कि इससे हमारा कार्य सफल होगा ।

            दही, दूध से बनता है किन्तु दूध का जहाँ 32% हिस्सा हमारे शरीर के लिये उपयोगी होता है वहीं दही का 80% हिस्सा शरीर के उपयोग में आसानी से आ जाता है । दही बनता तो दूध से है किन्तु मानव शरीर के लिये सबसे जरुरी चूना तत्व केल्शियम दूध की तुलना में अठारह गुना अधिक दही में पाया जाता है और निर्विवाद मान्यता यह है कि दही उन्हें भी आसानी से पच जाता है जिन्हें दूध नहीं पचता । दही और मट्ठा अलग पदार्थ नहीं है मथा हुआ दही ही मट्ठा कहलाता है । रुप-रंग, स्वाद या सुगंध सब प्रकार से दही जीवन का अनिवार्य अंग होता है ।  


            उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड-प्रेशर) के रोगियों के लिये दही मट्ठा अमृत समान गुणकारी माना गया है । दही की लस्सी तपते शरीर को जिस ठंडक की तृप्ति दिलवाती है उसे इसके सभी जानने वाले बखूबी समझते हैं । छाछ पीने वालों को दिल के सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है । दही, मट्ठा और छाछ रक्त को साफ करके उसके शारीरिक संचार में सहायता करते हैं । लस्सी या मट्ठा पीने वालों का दिल मजबूत रहता है और बढती आयु का भी उन पर अन्य लोगों की तुलना में नगण्य सा ही असर पडता है ।

दही के बारे में प्रचलित कुछ अन्य धारणाएँ- 

केन्सर से बचना हो तो दही खाईये ।

बाल रेशम से मुलायम और मजबूत रखना हो तो सप्ताह में दो बार उनमें दही की मालिश कीजिये ।

मूत्राशय में पथरी की तकलीफ यदि हो तो छाछ के नियमित सेवन से वह गलकर बाहर निकल जाती है ।

चेहरे का सौन्दर्य और प्राकृतिक लालिमा दही-मट्ठे के नियमित सेवन से बढती है ।

बल-वीर्य में वृद्धि के साथ ही गाल, स्तन, जांघ और कूल्हों को संतुलित भराव दही-मट्ठे के नियमित सेवन से प्राप्त होता है ।

भांग का नशा ही नहीं किसी भी प्रकार की विषाक्तता का दही-मट्ठा शरीर पर विपरीत प्रभाव समाप्त कर देता है । 

पुरुषों को दही-मट्ठा बल-वीर्य देता है तो नारियों को मृदुलता, सुन्दरता, सुडौलता और सर्वांग सौष्ठव से भर देता है । 

नियमित सेवन करने वाले नर-नारियों को दही-मट्ठा दीर्घायु बनाता है ।

इसकी प्रशंसा पुराने लोग इस रुप में भी कर गये हैं-

जहाँ रहेगा दही व मट्ठा,
वेद्य वहाँ उल्लू का पट्ठा.

            सारतत्व ये है कि दही-मट्ठे का सेवन करने वाले रोगों से दूर रहते हैं इसलिये उन्हें डाक्टर या वैद्य के यहाँ जाने की आवश्यकता ही नहीं पडती । दही में दूध की तुलना में अठारह गुना अधिक केल्शियम होता है जिसे हम अधिक मात्रा में भी ले लें तो शरीर पर कोई बुरा असर नहीं पडता जबकि उपर से ली जाने वाली केल्शियम की गोली की मात्रा शरीर में यदि ज्यादा हो जावे तो अन्य नये रोग उत्पन्न करवा सकती है । दही-मट्ठे में ए, बी, सी, डी और ई ग्रुप के पांचों प्रकार के विटामिन पर्याप्त मात्रा में होते हैं । दही का पूरा लाभ लेने के लिये इसे मथ लेना (अर्थात् मट्ठा बना लेना) चाहिये, जितना अधिक दही को मथा जावेगा वह उतना ही हल्का, सुपाच्य, रोगनाशक और स्वास्थ्यवर्द्धक हो जावेगा ।

अमृत विष न बन जावे...
 
             दही यदि ताजा होगा तो तन्दरुस्ती देगा, एकाध दिन का बासी होगा तो उसमें अम्लता बढ जावेगी, अधिक बासी होगा तो खून में खराबी पैदा करेगा । इसलिये चाहे दही खाएँ या मट्ठा बनाकर पिएँ किन्तु दही हमेशा ताजा ही प्रयोग में लाएं जो सुहानी गंध छोड रहा हो और स्वाद में मधुर हो अतः कुछ बाते ध्यान में रखें-

पीतल, एल्यूमिनीयम या तांबे के बर्तन में दही न जमाएं ।

कांसे के बर्तन में दही डालकर न खाएँ ।

दही जमाने के लिये सदा मिट्टी का बर्तन और खाने के लिये हमेशा कलईदार, स्टील या कांच के बर्तन का प्रयोग करें.

दही जमाने वाले वर्तन में बुसांध न पैदा होने दें, उसे गर्म पानी से धोकर धूप में या आग में सुखाकर ही दूसरी बार काम में लाएं और दही जमाने के दौरान उस पर जालीदार कपडा ढांक कर रखें ।

दही हमेशा मलाई सहित खाएं और मट्ठा हमेशा मलाई वाले दूध का बनाकर पिएं ।

सर्दी के मौसम में मट्ठा ज्यों का त्यों पिएं उसमें पानी न मिलाएं ।

बरसात के मौसम में दही-मट्ठा त्याग दें सिर्फ दवा के रुप में आवश्यक लगे तो ही इसका सेवन करें ।

गर्मियों के मौसम में दही-मट्ठे से अधिक इसकी लस्सी या छाछ पिएं ।

रात्रि के समय व खाना खा चुकने के बाद दही न खाएं, लस्सी या छाछ पी सकते हैं । लस्सी या छाछ में कभी शहद न मिलाएं ये दोनों परस्पर विरोधी स्वभाव के होने के कारण विषाक्तता उत्पन्न करते हैं ।

            दही स्निग्ध, अग्निदीपक, श्वास, पित्त, रक्तविकार, सूजन, चर्बी तथा कफ बढाने वाला होता है । यह मूत्र-कृच्छ, जुकाम, शीत, विषम ज्वर, अतिसार, अरुचि और दुर्बलता जैसे रोगों में हितकारी और बलवीर्यवर्द्धक होता है । दही में अलग-अलग स्थितियों में मन्द, स्वादु, स्वाद्वम्ल, अम्ल और अत्यम्ल प्रकार की स्थितियां बन जाती हैं जो हमारे शरीर में उसी रुप में परिणाम देती है-

            1. मन्द दही - दूध के समान हल्का गाढा और कम पानी वाला होता है और यह मल-मूत्र, त्रिदोष और दाह को बढाता है अतः ऐसे दही का सेवन नहीं करना चाहिये ।

            2. स्वादु दही - यह दही बिल्कुल गाढा, स्वादिष्ट और खटाई रहित होता है इसीलिये इसे स्वादु कहा जाता है । यह शक्तिवर्द्धक, पाक में मधुर तथा वात और रक्त-पित्त को नष्ट करने वाला होता है और इसी दही का सेवन सर्वोत्तम हितकारी होता है ।

           3. स्वाद्वम्ल दही - यह खट्टा-मीठा, गाढा, थोडा कसैला और कम पानी वाला होता है और बाजार में प्रायः यही दही उपलब्ध होता है ।

          4. अम्ल दही - यह मिठास रहित खट्टा, पित्त और कफ बढाने वाला होता है । इसका सेवन नहीं करना चाहिये ।

           5. अत्यम्ल दही - जिसको मुंह में रखते ही तेज खट्टे स्वाद के कारण रोएं खडे हो जाएं, दांत खट्टे हो जाएं और गले में जलन प्रारम्भ हो जाए ऐसा दही अत्यम्ल दही कहलाता है । यह अग्निवर्द्धक, रक्तविकार और वात्-पित्त-कफ को तीव्र गति से बढाने वाला होता है अतः ऐसे दही का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिये ।
             
               स्वादु दही जिसे मिट्टी के बर्तन में जमाया गया हो वह सर्वश्रेष्ठ होता है । दही को रात में नहीं खाना चाहिये, यदि रात में दही खाना ही हो तो घी-शक्कर, शहद, आंवला या मूंग की दाल के साथ ही खाने का प्रयास करना चाहिये । घी या शक्कर मिलाकर दही खाने से रक्तपित्त और कफविकार नहीं होते । यदि रक्तपित्त या कफविकार की समस्या आपके साथ चल रही हो तो दही खाने से बचना चाहिये । दही में थोडा पानी मिलाकर मथ लेने से इसमें छाछ के गुण पैदा हो जाते हैं अतः अम्ल दही को थोडी मात्रा में छाछ के रुप में सेवन करना हितकारी हो सकता है ।
  

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