This is default featured slide 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

रविवार, 25 अगस्त 2013

क्या करें जब डायबिटीज (मधुमेह) की गिरफ्त में आ जावें ?


           जब यह प्रमाणित हो जावे कि आप या आपके कोई परिजन इस रोग की गिरफ्त में हैं तो आगे की जीवनशैली में रोग को न बढने देने व अपने सामान्य स्वास्थ्य को बरकरार रखने के लिये किन बातों का ध्यान रखा जावे जिससे कि (राजरोग कहा जाने वाला) यह रोग यदि पूर्णतः ठीक नहीं भी हो पा रहा हो तो कम से कम आगे बढने न पावे । क्योंकि हमारी जीवनशैली व खान-पान में बदलाव किये बगैर यह समस्या कम नहीं होगी बल्कि दिन-ब-दिन इसकी उग्रता में दो तरीकों से वृद्धि होगी जिनमें पहली तो यह कि खान-पान व जीवनशैली में बदलाव किये बगैर वह कारण अपना कार्य़ शरीर में उसी प्रकार करते रहेंगे जिसके चलते इस रोग की शरीर में उत्पत्ति हुई और दूसरा यह कि चिकित्सक द्वारा शरीर में इंसुलीन की कमी के पूर्ति के लिये जो भी एलोपैथिक दवाईयां अथवा उपरी इंसुलीन दिये जावेंगे वे तात्कालिक रुप से तो समस्या का समाधान करते दिखेंगे किन्तु आने वाले समय में उनके साईड इफेक्ट जो शरीर पर पडेंगे उसके कारण एक ओर तो उन दवाईयों का परिमाण (मात्रा) बढता जावेगा और दूसरी ओर जीवन को बचाये रखने की जद्दोजहद में उन बढते हुए परिमाण की उपरी दवाईयों के साईड इफेक्ट शरीर की अक्षमता को और भी अधिक बढाने के चक्रव्यूह में रोगी को धकेलते रहेंगे ।

       अपनी पिछली पोस्ट में मुद्रित मेरे विज्ञापन को देखकर मेरे पास मात्र 58-59 वर्ष की उम्र के एक सज्जन ऐसे भी आये जिन्हें दोनों समय जो कृत्रिम इंसुलीन लेना पड रहा था उसकी लागत हर माह 8,000/- रु. से अधिक और इसके अलावा दवाई गोलियों की लागत 2,500/- रु. प्रतिमाह लगने के बावजूद वे अपने दोनों पैरों से चल नहीं पा रहे थे और दिन भर उन्हें अपने वाकर के सहारे से ही चलना फिरना पड रहा था । जाहिर है कि यह स्थिति शुरु से तो नहीं थी । किंतु माह-दर-माह और साल-दर-साल दवाईयों की लागत और शरीर की अक्षमता उस अनुपात में बढती जा रही थी जो मर्ज बढता गया ज्यों-ज्यों दवा की कि उक्ति को चरितार्थ कर रही थी ।

       ऐसे में स्वयं को ऐसी अप्रिय स्थिति से बचाये रखने के लिये सबसे पहले तो आप इस बात को समझने का प्रयास करें कि अपने खान-पान में आपको किन चीजों से परहेज रखना चाहिये और किन चीजों को अपने भोज्य पदार्थों में हेल्दी सो टेस्टी के सिद्धांतानुसार न सिर्फ शामिल करना चाहिये बल्कि उन्हीं वस्तुओं की अधिकता पर अपने शेष जीवन के खान-पान का दारोमदार निर्धारित कर लेना चाहिये । क्योंकि आगे के जीवन में खान-पान से जुडी लापरवाहियां इसके किसी भी रोगी को सामान्य जीवन में सेक्स सुख से वंचित करवा देने के साथ ही, आंखों में धुंधलेपन से अंधेपन तक की समस्या, गुर्दे या किडनी नाकाम हो जाने की समस्या जिसके कारण मूत्र-मार्ग से निष्कासित हो सकने वाले विषाक्त पदार्थों को शरीर से बाहर निकलवाने के लिये रोगी को डायलिसिस माध्यम पर हर सप्ताह ही नहीं बल्कि सप्ताह में दो या अधिक बार तक निर्भर हो जाना पडता है, ह्रदय की रक्त नलिकाओं के सिकुडने व सख्त होते जाने के कारण एंजियोग्राफी अथवा बायपास सर्जरी की नौबत अथवा हार्ट-अटैक का खतरा, रक्त वाहिकाओं (नसों) की खराबी के कारण पेरालिसिस (लकवे) की गिरफ्त में आ जाना जैसी गंभीर, अत्यंत खर्चीली व असह्य कष्टसाध्य बीमारियों की गिरफ्त में फंसना पड सकता है ।
  

       इस स्थिति से बचने के लिये अपने आहार से – मिठाईयां, चाकलेट्स, कोल्ड ड्रिंक अथवा मीठी वस्तुओं से यथासम्भव परहेज करें क्योंकि इनमें मौजूद शक्कर को शरीर पचा सकने में समर्थ नहीं होता । ज्यादा चर्बीदार खाना जैसे बर्गर, पिज्जा, पनीर, मांस, मैदे से निर्मित व तले हुए खाद्य पदार्थ जैसे आलू की चिप्स, बडापाव, पानीपूरी या गोलगप्पे, कचोरी, समोसे, पूडी-परांठे घी, आदि के सेवन को यथासम्भव पूर्ण नियंत्रित करें अथवा सम्भव हो तो बंद करदें ।

        इनकी बनिस्बत अपने आहार में संपूर्ण दानेदार खाद्य पदार्थ जैसे – अंकुरित मूंग, मोठ, चने, चंवले, मांड निकाला हुआ चावल, दालें, 50%,गेहूँ के साथ जौ, ज्वार व   देशी चने 17%, 17%, के समान अनुपात में मिलवाकर इसके आटे की मिस्सी रोटी, पालक, मैथी, सरसों, पत्ता गोभी जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां,  खीरा ककडी, टमाटर, प्याज, लहसुन, नींबू, आंवले व अलसी अथवा अलसी के तेल  के साथ ही अमरुद, सेवफल, पपीता, तरबूज जैसे अल्प मिठास वाले फलों का अधिक सेवन करें । पौष्टिक वनस्पति या सरसों के तेल का अल्पतम मात्रा में प्रयोग करें । दूध में कम फेट्स वाले स्कीम्ड मिल्क, इसी से बने दही के साथ ही छाछ का अधिक प्रयोग करें । आमाशय पर अधिक भार न डालते हुए एक बार में डटकर खाने की बजाय भूखे रहें बगैर यथासम्भव 3-3 घंटे के अनुपात में अपने भोजन को बांट दें ।

        धूम्रपान यदि करते हों तो उसे बन्द कर दें । वर्ष में एक बार अनिवार्य रुप से अपनी आंखों व पेशाब (मूत्र) की जांच करवाते रहें । ब्लड-प्रेशर न बढने दें । हर रोज 2 से 3 लीटर पानी अनिवार्य रुप से पिएं । अपने पैरों के तलवों व उंगलियों के पोरों व जोडों की आईने की मदद से सूक्ष्म देखभाल रखें । यदि कहीं छाले, जख्म या सूजन जैसी न ठीक होने वाली समस्या दिखाई दे तो अपने डाक्टर को दिखाएं । पेट पर चर्बी का जमाव अथवा मोटापन न बढने दें । पैरों में आरामदायक जूते व मौजे पहनकर रहें । नंगे पैर न चलें । यदि न भरने जैसे घाव दिखें तो आसानी से उपलब्ध नीम व पीपल के पत्तों को उबालकर उसके पानी से घाव को धो लें फिर उसमें इन्हीं नीम व पीपल के पेड के तने की छाल को शुद्ध शहद में घिसकर बनने वाले लेप को घाव पर लगाकर उसे पट्टी बांधकर रखें तो उस घाव के शीघ्र ठीक हो जाने की स्थिति बन जावेगी । 

       ये सब उपाय जो आपने उपर देखे इनके द्वारा तो आप अपने रोग को बढने से रोककर नियंत्रित रखने का प्रयास कर सकते हैं । अब इस रोग को शरीर से दूर करने के प्रयास हेतु आप अधिक से अधिक सक्रिय रहें, कम से कम 3 किलोमीटर प्रतिदिन पैदल चलें, 40 से 60 मिनीट योग, प्राणायाम् अथवा कसरत अनिवार्य रुप से करें व किसी जानकार से सीखकर योग में मत्स्येन्द्रासन, मंडूकासन व त्रिबन्ध प्राणायाम की 3 से 10 तक आवृत्ति प्रतिदिन करें । इस प्रयोग से धीरे-धीरे ही सही किंतु शरीर का इंसुलीन स्वयं बनना व स्वस्थ अवस्था में बढना प्रारम्भ हो सकेगा और आप इसी अनुपात में रोगमुक्त होकर आगे के जीवन को निरोगावस्था में गुजारने का स्वप्न साकार कर सकेंगे । इसके अलावा साईड इफेक्ट बढाने वाली बाहरी चिकित्सकीय दवाईयां और इंसुलीन के घातक उपरी प्रयोग से शीघ्र मुक्ति पाने के प्रयास को और गति देने के लिये आप आयुर्वेद की ऐसी दवाईयों का प्रयोग प्रारम्भ कर सकते हैं जो शरीर को किसी भी किस्म का नुकसान पहुंचाये बगैर अनिवार्य रुप से रोगमुक्त करने का कार्य आपके शरीर के लिये करती रह सकें ।

शनिवार, 24 अगस्त 2013

शुगर की बीमारी में शुगर की भूमिका.



    शुगर (डायबिटीज) की बीमारी के साथ शुगर (शक्कर/चीनी) की मिठास का चोली-दामन का रिश्ता है । इसे हम यूं समझ सकते हैं कि अंग्रेजों के द्वारा हमारे देश में सन् 1868 में जब पहली शक्कर मील की स्थापना की गई थी उसके पूर्व न तो इस देश में कोई शक्कर के स्वाद को जानता समझता था और न ही डायबिटीज जैसे घातक रोग का देश में कोई प्रसार रहा था । आज जबकि महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, पश्चिम उत्तर-प्रदेश जैसे क्षेत्रों में चीनी मीलों की भरमार है वैसे ही देशभर में डायबिटीज के रोगियों की दुनिया भर में सबसे बडी संख्या भी भारत में ही देखी जा रही है और इसमें निरन्तर गुणात्मक गति से वृद्धि भी लगातार चल रही है ।

       बीमारियों के साथ इसके सम्बन्ध को समझने के लिये हमें इसकी निमार्ण प्रक्रिया को भी समझना आवश्यक होगा । खान-पान के स्वाद को विकसित करने के लिये जिस मिठास के हम आदी हैं वह हमें शक्कर से भी मिलती है और गुड से भी और इन दोनों की ही मिठास का मुख्य स्रोत गन्ने का रस ही होता है । किन्तु गुड के निर्माण में जहाँ उस गन्ने के रस को सिर्फ उबालकर व उसका मैल हटाने के लिये उसमें कुछ दूध जैसे अवयवों का मिश्रण कर उसे जमाकर गुड बना लिया जाता है वहीं इस दानेदार सफेद व चमकीली शक्कर की निर्माण विधि में करोडों रु. लागत की मशीनरी के साथ जिस काम्पलीकेटेड तकनीक का प्रयोग होता है उसके चलते इसमें अनेक प्रकार के घातक रसायनों (केमिकल्स) का प्रयोग किये बगैर शक्कर को इस रुप तक पहुंचा पाना सम्भव ही नहीं होता । सामान्य अवस्था में ये सभी केमिकल्स घातक बीमारियों के जन्मदाता होने के साथ ही मानव शरीर के उपयोग में आने योग्य कतई नहीं होते । रसायनों की जानकारी के इस क्रम की अधिक गहराई में जाये बगैर सिर्फ एक रसायन जिसे हम सभी जानते हैं कि इसके बगैर शक्कर नहीं बन सकती उसका जाना-पहचाना नाम है सल्फर, अब यदि इसी सल्फर के बारे में हम समझने का प्रयास करें तो इसका अर्थ होगा "गंधक", जबकि इसी गंधक के प्रयोग से बारुद बनाकर दीपावली पर फटाके बनाये जाते हैं । सल्फर के बगैर चीनी/शक्कर नहीं बनती और इसीके परिवर्तित स्वरुप में गंधक के बारुद के बगैर फटाके नहीं बन सकते ।

नतीजा यह कि गुड की मिठास फेक्ट्रोज के रुप में हमारे शरीर को प्राप्त होती है और प्रकृति द्वारा उत्पन्न सभी मीठे फलों में उपलब्ध मिठास भी फेक्ट्रोज के रुप में ही हमारा शरीर प्राप्त करता है जबकि इन घातक रसायनों से निर्मित होने वाली शक्कर की मिठास सुक्रोस रुप में परिवर्तित होकर हमारे शरीर को मिलती है और सुक्रोस का मुख्य अवगुण यह हो जाता है कि यह खुद तो हजम हो ही नहीं पाता बल्कि जिस भी खाद्य सामग्री में हम इसे मिलाकर प्रयोग में लाते हैं उसे भी आसानी से हजम नहीं होने देता । परिणामतः  जिस गुड के प्रयोग से हमारे शरीर को प्रचुर मात्रा में केल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, सोडियम, मेंगनीज जैसे अनेकों पोषक तत्व प्राप्त होते हैं वहीं इसी गन्ने के रस से निर्मित शक्कर से शरीर को सिर्फ न पच सकने वाले जहर की ही आपूर्ति निरन्तर होती रहती है ।

      हमारे देश में चीनी का चलन प्रारम्भ करवाने वाले विदेशी लोगों ने भी इनके अपने देशों में आबादी पर  इसके बढते दुष्परिणामस्वरुप जन्मने वाली अनेकों बीमारियां और निरन्तर बढ रहे मोटापे की स्थिति को देखने-समझने के बाद अपने यहाँ इसके प्रयोग को हतोत्साहित करते हुए वर्षों पूर्व से शुगरफ्री मिठाईयां, केक, पेस्ट्रीज व चाकलेट्स के प्रचलन को निरन्तर बढावा देना प्रारम्भ कर दिया है जबकि हमारे अपने देश में इस शक्कर का प्रयोग चाय-दूध, दही-लस्सी, मिठाईयां और तो और दाल व सब्जियों में भी डालकर खाने का चलन बढता ही जा रहा है और जिस अनुपात में देशवासियों में इसकी खपत बढ रही है उसी अनुपात में पहले डायबिटीज व पेट पर जमी चर्बी का मोटापा बढने के साथ-साथ हाई ब्लड-प्रेशर, ब्रेन स्ट्रोक और एक रिसर्च से प्राप्त परिणामों के अनुसार कुल जमा 103 प्रकार की छोटी-बडी बिमारियों के कारण रुप में शक्कर की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका सामने आई है और उसका एकमात्र कारण सिर्फ यह कि ये शक्कर शरीर में जाती तो है किन्तु हजम होकर अन्य खाद्य सामग्रियों के समान मल-मूत्र, पसीना, बलगम किसी भी रुप में शरीर से निष्कासित नहीं हो पाती, बल्कि शरीर में ही कोलेस्ट्राल रुपी कचरे में परिवर्तित होकर हमारे खून को खराब करके सभी बीमारियों को जन्म देने का कारण बनती चली जाती है ।

यदि हम अपने भोजन के अन्त में 10-20 ग्राम गुड खाकर देखें तो हम पाएँगे कि सामान्यतः 6 घंटे में पचने वाला वह भोजन जो शक्कर की मौजूदगी में 8 घंटे में भी पूरी तरह नहीं पच पाता, हमारा वही भोजन गुड के प्रयोग के साथ होने पर 4 घंटे में ही पूरी तरह से पचकर भोजन के सभी आवश्यक व उपयोगी पोषक तत्व शरीर को आसानी से उपलब्ध करवा देता है । यदि आप शक्कर का प्रयोग बंद करके देखें तो आप पाएंगे कि 15 दिनों में ही आपका वजन बगैर एक्सरसाईज के कम होना प्रारम्भ हो जावेगा । घुटने, कमर, कंधे के दर्द में बगैर उपचार के आराम मिलने लगेगा । आसान व अच्छी नींद यदि नहीं आती तो शक्कर का प्रयोग बंद होने के बाद स्वमेव अच्छी नींद बगैर स्लिपिंग पिल्स के आने लगेगी । सर्दी-जुकाम जैसी समस्या से यदि आप पीडित रहते हों तो इसके बाद वे भी आसानी से दूर होते दिखने लगेंगे । सिरदर्द-माईग्रेन जैसी समस्या से यदि आप ग्रसित हैं तो उसका भी उपचार हो जावेगा और आपको अपना शरीर हल्का व स्फूर्तवान लगने लगेगा ।


 शक्कर के शरीर पर घातक परिणामों को समझने के लिये आप स्वयं एक छोटा सा प्रयोग करके इसके दुष्परिणामों का परिक्षण कर सकते हैं । कैसे – एक कटोरी में थोडी शक्कर डालें फिर उसमें उतना ही पानी डालकर दोनों को गलने जितनी देर के लिये छोड दें । पश्चात् उसके उस गाढे लेप को अपने पैरों के किसी भी हिस्से में लगाकर 20-25 मिनीट या आधे घंटे के लिये ऐसा ही छोड दें और आधे घन्टे बाद उस स्थान की त्वचा को देखिये आपको वहाँ की त्वचा में ऐसा रुखापन व कडापन स्वयं महसूस होगा जो रगड-रगडकर धोने के बाद भी आसानी से अपनी सामान्य अवस्था में नहीं आ पाएगा । अतः यदि आप डायबिटीक हैं तब तो अपने शेष जीवन के लिये यह अनिवार्य मानें कि आपको अपने खान-पान से शक्कर को पूर्णतः अलविदा कर ही देना चाहिये किंतु यदि आप पूर्ण स्वस्थ हैं और अपने स्वास्थ्य को लम्बे समय तक स्वस्थ भी देखना चाहते हैं तब भी आपको यह कोशिश अनिवार्य रुप से करना चाहिये कि आप इस शक्कर का प्रयोग करना कैसे बन्द कर सकते हैं ।


शक्कर के वैकल्पिक समाधान के रुप में आप गुड, खांड अथवा मिश्री का प्रयोग प्रारम्भ कर सकते हैं । सम्भव है इस बदलाव से शुरु में आपको कुछ पैसे ज्यादा खर्च होते लगें या इनका प्रयोग बनाना या बढाना शक्कर जितना आसान ना लगे किन्तु इसके बदले में मिलने वाला स्वास्थ्य और भविष्य की बीमारियों पर लग सकने वाले अच्छे-खासे चिकित्सा खर्च से मुक्ति का सुखद अहसास लम्बे समय के सुख-शान्ति व निरोगी जीवन के रुप में अनिवार्यतः प्राप्त होता रहेगा । 


आभार सहित.... स्व. राजीव दीक्षित के उद्गारों से संकलित.

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

जानिये क्या व कैसे होता है डायबिटीज (मधुमेह) रोग.

        
        अनियमित जीवनशैली व अधिक स्वाद की चाहत के बढते चलन से जो घातक रोग इस समय समूचे विश्व में तेजी से पैर पसार रहा है और जिसमें एशिया विश्व से आगे व भारत एशिया से भी आगे चल रहा है वह डायबिटीज रोग मानव शरीर में कैसे घर करता है यह जानकारी सिलसिलेवार तरीके से हमें दे रहे हैं जाने-माने चिकित्सक डा. पंकज अग्रवाल-

       डायबिटीज को समझने के लिये हमें शुगर को समझना होगा । यहाँ शुगर का मतलब है ग्लुकोज या शर्करा । यह हमारे शरीर के लिये कोई अवांछित पदार्थ नहीं है बल्कि यह हमारे शरीर का श्रेष्ठ ईंधन है । शरीर को अपने प्रत्येक कार्यकलाप के लिये आवश्यक उर्जा इसी शुगर जो ग्लुकोज रुप में परिवर्तित होती रहती है से प्राप्त होती है, यदि शरीर में इस ग्लुकोज का स्तर कम होने लगे तो हमारा शरीर कमजोरी अनुभव करने लगेगा और हमारे सभी क्रियाकलाप मंद होते चले जावेंगे ।

       हम जब भोजन करते हैं तो उस भोजन से हमें ग्लुकोज या शुगर की काफी अधिक मात्रा प्राप्त होती है । इस बढी हुई मात्रा को उस वक्त जब हम भोजन नहीं कर रहे होते हैं तबके लिये सम्हाल कर रखना शरीर की एक बडी जिम्मेदारी होती है । इसके लिये शरीर संचालन में इस शुगर को बढने या कम होने से रोकने के लिये शरीर विभिन्न हारमोन्स का इस्तेमाल करता है ।

       यही हारमोन्स रक्त में शुगर के स्तर को 80 से 120 मि. ग्रा. प्रतिशत के स्तर पर भूखे पेट व भोजन के दो घंटे बाद 120 से 150 मि. ग्रा. प्रतिशत तक बनाये रखने का कार्य अपनी सामान्य अवस्था में करते हैं ।

बुधवार, 14 अगस्त 2013

जल के औषधिय प्रयोग.




      हमारे शरीर की अनेक समस्याओं जैसे क्रोध, तनाव, चिडचिडापन, नपुंसकता, आलस, थकावट, अत्यिधक नींद, अनिद्रा, सिरदर्द, नाक से खून बहना, चक्कर आना, लकवा, गठिया, पीठ, गर्दन व जोडों के दर्द दूर करने के साथ ही पौरुष बल में वृद्धि, आत्म विश्वास, तेज, मनोबल व स्मरणशिक्त  में बढोतरी जैसी आवश्यकताओं के उपचार हेतु आयुर्वेद में सिर्फ सामान्य जल के प्रयोग द्वारा भी इन स्थितियों के उपचार का वर्णन देखने में आता है । वे सभी जरुरतमंद लोग जो एलोपैथी के मंहगे उपचार से दूर रहते हुए अपनी ऐसी समस्याओं का निराकरण करना चाहें उनकी जानकारी हेतु जल के द्वारा किये जाने वाले रोगों के उपचार की विधि निम्नानुसार है-


      किसी भी नीले रंग के कांच की बोतल में जल भरकर व ढक्कन बंद करके उस बोतल को लकडी के किसी पटिये पर रखकर सात दिनों तक सूर्य के प्रकाश (धूप) में रखा जावे और सात दिन के बाद उस सूर्य तापित जल को सुबह के वक्त खाली पेट आधा गिलास मात्रा में लेकर व शेष आधा गिलास उसमें सादा पानी मिलाकर इसका कुछ दिन नियमित सेवन किया जावे तो ऐसे व्यक्ति के शरीर से आलस्य, स्थायी थकावट, मुंह में बार-बार छाले आना और अत्याधिक नींद आने की समस्या दूर हो जाती है ।
       

       इसी विधि से जब हरे रंग के कांच की बोतल में जल भरकर उसे सूर्य के प्रकाश में सात दिन रखा जावे और सुबह के वक्त आधा सादा पानी मिलाकर खाली पेट इसका सेवन कया जावे तो ऐसे व्यक्तियों के शरीर से अत्यधिक चिंता करने की मनोवृत्ति, अनिद्रा, आधेसीसी का सिरदर्द, नाक से खून बहना (नकलोई), आदि समस्याएँ दूर होने के साथ ही इनके नेत्र ज्योति में बढोतरी होती है ।


      वहीं जिन लोगों को लकवा, गठिया, पीठ, गर्दन व जोडों के दर्द की शिकायत रहती हो तो ऐसे लोगों की इन समस्याओं का उपचार लाल रंग के कांच की शीशी में भरकर सूर्य के प्रकाश में सात दिन रखे गये पानी को सुबह खाली पेट पीने से हो सकता है ।

      यद्यपि वर्तमान प्लास्टिक के बढते प्रचलन ने कांच की शीशियों की उपलब्धता अत्यंत कम कर दी है और रंगीन कांच की बोतलें मिल पाना तो और भी कठिन हो गया है ऐसे में बाजार में मिलने वाले इन्हीं रंगों के जिलेटीन पेपर को रबरबैंड की मदद से सादी सफेद कांच की बोतल पर लगाकर भी यदि धूप में रखा जावे तो जल जनित इस कलरथैरेपी के पूरे लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं ।

      इसके अलावा भी सामान्य सादे जल से इन अतिरिक्त समस्याओं का भी उपचार किया जा सकता है-

      चक्कर आने पर – शीतल जल से स्नान करने के पूर्व सिर को आगे की ओर झुकाकर उस पर एक मिनिट तक धार बनाकर पानी डालते रहने से इस समस्या से मुक्ति मिलती है ।

      कब्ज निदान हेतु – सादे जल में मिश्री मिलाकर पीने से कब्ज की समस्या दूर होती है ।
    
थकावट दूर करने के लिये – दो से तीन मिनीट अपने पैरों को शीतल जल में दुबोकर बैठने से मस्तिष्क तीव्र होता है, आँखों को राहत मिसती है, शरीर का नाडीतंत्र शुद्ध होता है और थकावट तो दूर हो ही जाती है ।


अनेक रोगों से बचाव के लिये – यदि दोपहर के समय शरीर के मलमूत्र द्वार को शीतल जल से धोया जावे और यदि सम्भव हो तो कुछ समय ऐसे जल से भरे टब में कमर के हिस्से तक को डुबोकर बैठा जावे तो ऐसे व्यक्तियों को कभी नपुंसकता नहीं आती, पौरुषबल में वृद्धि होती है और हमारे शरीर का वह समस्त नाडीतंत्र जिसका आधार मूलाधार चक्र से जुडा होता है उसके शीतल होने से शरीर से क्रोध, तनाव व चिडचिडेपन की भावना दूर होती है ।

       विद्यार्थियों व मानसिक कार्य करने वालों की स्मरण शक्ति में वृद्धि करने हेतु – पढते वक्त जल का पात्र अपनी मेज पर रखें व उसे ढंके नहीं तो यह स्थिति स्मरण-शक्ति बढाने में मददगार साबित होती है । इस दरम्यान बीच-बीच में जल का आवश्यकतानुसार सेवन भी करते रहना चाहिये और सेवन करने वाले जल को ढंककर ही रखना चाहिये ।



      हीनभावना से मुक्ति पाने के लिये – प्रातःकाल के समय चुल्लू में गंगाजल लेकर ऊँ नमः शिवाय अथवा गायत्री मंत्र का सात बार उच्चारण करने के बाद उसका आचमन (सेवन) करते रहने से किसी भी व्यक्ति की थकावट, नकारात्मकता व उर्जा की कमी की समस्या दूर होकर उसके तेज, मनोबल व आत्मविश्वास में चमत्कारिक रुप से पर्याप्त वृद्धि होती है ।


      गंगाजल की अनुपलब्धता की स्थिति में सादे जल को निम्न विधि के अनुसार ऊँ गंगा देव्यो नमः का मंत्रोच्चार कर अपने सीधे हाथ की रिंगफिंगर के अग्रभाग को आव्हानि मुद्रा के रुप में स्पर्श कर उस जल को गंगाजल के स्थानापन्न के रुप में प्रयुक्त किया जा सकता है ।


      विशेष जानकारी -पिछले करीब डेढ महिने से ज्योतिष ज्ञान में अपनी रुचि जाग्रत होने और इन्दौर शहर के वयोवृद्ध ज्योतिष आचार्य पं. आर्यभट्ट कलशधर शास्त्री (80 वर्षीय) का सानिंध्य मिल जाने के कारण वर्तमान में मेरा अधिकांश समय ज्योतिष विद्या के गूढ ज्ञान की प्राप्ति में व्यतीत हो रहा है और ब्लाग-जगत के साथ ही फेसबुक से भी मैं इसीलिये फिलहाल करीब-करीब अनुपस्थित दिख रहा हूँ । 
      निश्चय ही कुछ और समय स्थिति ऐसे ही चलती दिखेगी पश्चात् आपके समक्ष अपनी पूर्व सक्रियता को जीवंत बनाते हुए यथासंभव एक और नये ज्योतिष ब्लाग के साथ आपको फिर से दिखाई दूंगा और तब तक भी गाहे-बगाहे आपके समक्ष आता दिखता तो रहूंगा ही ।

      अतः क्षमापना के साथ ही आप सबके प्रति धन्यवाद सहित...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...