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मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली की रंगारंग शुभकामनाएँ...

ब्लाग-जगत के सभी साथियों और- 


स्वास्थ्य-सुख ब्लाग के सभी पाठकों, समर्थकों और अपने सभी मित्रों-परिचितों को होली के इस रंगारंग पर्व की
 
हार्दि शुकानाएँ...



क्षमायाचना-
              इस ब्लाग की अन्तिम पोस्ट "हार्ट अटैक से बचाव" संदेश टेम्प्लेट में जाकर करेक्शन करने के प्रयास में डिलीट हो गई है अतः इसे पढने की इच्छा रखने वाले अपने पाठकों से फिलहाल क्षमा चाहता हूँ । शीघ्र ही इसे नये सिरे से सेट करके वापस ये पोस्ट लगने तक आपको होने वाली असुविधा हेतु क्षमाभाव सहित...

बुधवार, 20 मार्च 2013

डायबिटीज (शुगर) के उपचार में - विजयसार (अमृतरस) के चमत्कारिक परिणाम

           
          शुगर की बीमारी जिसे हम सामान्य बोलचाल की भाषा में मधुमेह या डायबिटीज के रुप में भी जानते हैं यह राजरोग के रुप में इन्सानी शरीर में अपनी जडें जमाता है और एक बार शरीर में जम जाने के बाद यह रोगी के शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर ऐसा प्रभाव डालता है कि इससे रोगी को न सिर्फ शरीर में होने वाले छोटे-मोटे घावों का अहसास नहीं हो पाता बल्कि उसके शारीरिक घाव लम्बे समय तक ठीक भी नहीं हो पाते और बढते ही चले जाते हैं, यही कारण है कि इस रोग से पीडित ऐसे अनेकों व्यक्ति जिन्हें चलने-फिरने के दरम्यान पैरों में कंकड-कांटे चुभने मात्र से भी जो घाव बने उनमें अधिकांश रोगी शरीर से पैर का पंजा कटवा देने की विकराल स्थिति तक इस रोग की भयावहता को झेलते देखे जा सकते हैं और अपने पैर का पंजा गंवा चुके ऐसे रोगी तब भी अपना आगे का जीवन नहीं बचा पाते और इस कारण से इस जबर्दस्त शारीरिक व मंहगे चिकित्सकीय उपचार में लगने वाली आर्थिक क्षति को झेलने के बाद भी अगले साल-छः महिने से दो-तीन साल की अवधि में अक्सर उन्हें मृत्यु के मुख में जाते हुए भी देखा जाता रहा है । यद्यपि मधुमेह की गिरफ्त में आते ही यह स्थिति एकाएक नहीं बनती लेकिन बिगडी हुई स्थिति में इस रोग का चरम प्रायः यही देखने में आता रहा है ।

        इस भयावह रोग से बचाए रखने व यदि यह रोग हो चुका हो तो इसे नियंत्रित रखते हुए रोगमुक्त करवा सकने की दिशा में एक विशेष किस्म के दुर्लभ वृक्ष की लकडी वरदान साबित हो रही है जिसे हम विजयसार के नाम से पहचान रहे हैं । मधुमेह (डायबिटीज) रोग को नियंत्रित रखने में इस दुर्लभ वृक्ष की लकडी को विशेष उपयोगी पाया गया है । इस लकडी के टुकडों को किसी भी सामान्य कांच के गिलास में पीने के लगभग 100-150 ml. पानी में डालकर रख देने पर अगले 8-10 घंटों में वह पानी लगभग लाल रंग की रंगत में आकर व उस पर एक तैलीय सतह बनाकर हमारे शरीर के लिये इतना गुणकारी बन जाता है कि इस पानी को  नियमित रुप से रात में रखा गया पानी दूसरे दिन सुबह नाश्ते के पूर्व एवं सुबह फिर से भरकर रखा गया पानी उसी दिन शाम को भोजन के लगभग आधा घंटा पूर्व पीने के क्रम को कम से कम 6 माह तक पीने वाले डायबिटीज (मधुमेह) रोगी स्वयं के शरीर में रोग पर नियंत्रण व जीवन में स्फूर्ति के साथ ही रोग-मुक्ति के प्रमाण के रुप में स्वयं देख व जाँच सकते हैं । विजयसार वृक्ष की यह लकडी न सिर्फ मधुमेह के रोगी को रोगमुक्त करने में रामबाण के समान उपयोगी साबित हो रही है बल्कि मधुमेह की बीमारी के चलते शरीर में जो सहायक रोग जैसे अत्यधिक भूख लगना, शारीरिक कमजोरी, जोडों में दर्द, मोटापा, पैरों में सुन्नता इनमें भी बचाव हेतु उपयोगी साबित हो रही है ।

           इस लकडी के संसर्ग में रखे पानी की उपयोगिता को देखते हुए कुछ कम्पनियाँ इसी लकडी के छोटे ग्लास भी बनाकर उपलब्ध करवाती हैं और चाहे इसीकी लकडी के ग्लास में पानी रखें या पानी में इसकी लकडी का टुकडा डाल कर रखें अधिकतम 3 दिन में इसकी लकडी का टुकडा और 5-7 दिन में ग्लास का पानी अपनी रंगत बदलना बंद कर देता है याने अपना असर खो चुकता है ऐसी स्थिति में इसके ग्लास को अंदर से खुरचकर या लकडी के टुकडे को बदलकर इसके संसर्ग में बनने वाले लाल रंग की रंगत के इस पानी को जिसे हम अमृत-रस भी कहते हैं इसके सेवन से शरीर को रोगमुक्त बनाये रखने का प्रयास आप कर सकते हैं । इस अमृतरस के मानव शरीर में-         
          जोडों के दर्द से मुक्ति,
          हाथ-पैरों में कंपन व शारीरिक कमजोरी दूर करना,    और
          शरीर से अतिरिक्त वसा को निकालते चले जाने के कारण मोटापा कम करना.

जैसी अन्य समस्याओं के उपचार में भी चमत्कारिक परिणाम मिलते देखे जाते हैं ।

रविवार, 17 मार्च 2013

बुखार - छोटे बच्चों का...

        आज अचानक मेरे 3 वर्षीय पोते को दोपहर में उसके मम्मी-पापा के साथ किसी फंक्शन में तेज बुखार महसूस हुआ । मेरे बेटे-बहू ने घर आकर बच्चे को अपने विवेक से क्रोसीन सायरप का सामान्य डोज दे दिया जिससे बुखार कुछ समय के लिये कन्ट्रोल में आ गया, 3-4 घंटे बाद बच्चे को फिर तेज बुखार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया । रविवार होने के कारण प्रायः शाम को डाक्टर अवकाश के मूड में रहते हैं और अपने क्लिनिक में उपलब्ध नहीं हो पाते अतः बहू ने फिर उसे क्रोसीन सायरप देने के साथ ही उसके सिर पर ठन्डे पानी की पट्टी रखकर बुखार को नियंत्रित करने का प्रयास किया किन्तु कुछ ही समय बाद छोटा सा यह बच्चा झटके खाते हुए दांत भींचकर आँखें फेर लेने और होश में होते हुए भी मुट्ठियां भींचकर अचेतन स्थिति में पहुँच गया । सुबह तक हँसते-खेलते बच्चे को अचानक ऐसी विचित्र और अचेतन स्थिति में देख पूरे परिवार में कोहराम सा मच गया और जो जैसा था उसी स्थिति में सब बच्चे को लेकर अस्पताल भागे जहाँ तत्काल उसे ICU में भर्ती करके उसका उपचार करवाना पडा । राहत की बात यह थी कि शिशु रोग विशेषज्ञ हमारे पारिवारिक सदस्य के समान ही थे अतः वे भी 75 वर्ष के करीब की उम्र होने के बावजूद अपने घर से करीब 15 किलोमीटर से भी अधिक की ट्रेफिक जाम परिस्थितियों में भी स्वयं ड्राईविंग करके अस्पताल पहुँच गये और उनकी देखरेख में समय रहते बालक का व्यवस्थित उपचार प्रारम्भ हो गया ।

      सुबह तक हँसते खेलते बच्चे को अचानक ऐसा क्या हो गया के उत्तर में डा. भाई साहब ने जो बताया उसे सभी छोटे बच्चों के माता-पिता को जानना अत्यन्त उपयोगी होने के कारण इस अनुभव के साथ ही उनकी सलाह को मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । उनके कथनानुसार 6 माह से लगाकर 5 वर्ष तक के छोटे बच्चे यदि 101 डिग्री टेम्प्रेचर के उपर के बुखार की गिरफ्त में आ जाते हैं तो उनका शरीर बुखार की इस स्थिति को बर्दाश्त नहीं कर पाता और उनका बुखार बच्चे के मस्तिष्क तक पहुँच जाता है, जिससे बच्चा कभी-कभी मरणासन्न स्थिति में भी पहुँच सकता है अतः वे सभी पेरेन्ट्स जिनके घरों में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे हों वे कभी भी यदि बच्चे को 101 डिग्री टेम्प्रेचर से उपर क बुखार में खें तो अपने विवेक से बच्चे को दवाई देने की बजाय उसे तत्काल किसी योग्य शिशु रोग विशेषज्ञ के पास ही लेकर जावें क्योंकि सामान्य तौर पर हममें से अधिकांश लोग 103-104 डिग्री तक के बुखार के टेम्प्रेचर को भी डाक्टर द्वारा बताई गई दवा देकर ठीक कर लेने की कोशिश कर लेते हैं और यह स्थिति बडे बच्चों व वयस्क लोगों के लिये तो शायद ठीक हो सकती हो किन्तु 5 वर्ष से छोटे बच्चों के लिये कभी भी घातक हो सकती है ।

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