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गुरुवार, 31 मार्च 2011

निर्बलता, सुन्नता और कम्पन से बचाव हेतु...

        शीर्षक देखकर आप ये न समझें कि ये सिर्फ वृद्धावस्था की ही समस्याएँ हैं बल्कि ये बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी को परेशान करने वाली ऐसी समस्या है जिसमें पैरों में विशेषकर पिंडलियों में दर्द रहना, चलने में थकान महसूस करना, हाथ-पैर में सुन्नता महसूस करना, हाथ कांपना व शरीर का अत्यधिक दुबला-पतला व कमजोर होना जैसी समस्याएँ शामिल होती हैं, इसके उपचार हेतु असगंध आमलकी रसायन के मिश्रण से बने चूर्ण का सेवन न सिर्फ बहुत सरल व सस्ता बल्कि अत्यधिक गुणकारी नुस्खा साबित होता है-

       असगन्ध- इसका स्वाद कसैला/कडवा होता है । इसकी जड ही काम में ली जाती है और इसमें घोडे के शरीर के समान गन्ध पाई जाती है । शायद इसीलिये इसे (अश्र्व) असगन्ध कहा जाता है । यह आपको किसी भी जडी-बूटी विक्रेता के यहाँ मिल सकता है । उपरोक्त उपचार हेतु इसके चूर्ण की आवश्यकता होती है । अतः यदि बाजार से चूर्ण तैयार मिल जावे तो अति उत्तम, अन्यथा आप इसे जड रुप में खरीदकर घर पर इसका कूट-पीसकर 100 ग्राम के लगभग बारीक (महीन) चूर्ण बना लें 


       आमलकी रसायन- आंवले के चूर्ण में आंवले का ही इतना ताजा रस मिलाया जाता है कि चूर्ण करीब-करीब रोटी के लिये उसने हुए आटे से भी कुछ अधिक नरम हो जाता है इसे आयुर्वेद की भाषा में भावना देना कहते हैं । फिर इस रस मिश्रीत चूर्ण को सुखाया जाता है । सूख चुकने पर पुनः इसी प्रकार से इसमें आंवले के ताजे रस की भावना दी जाती है और फिर इसे सुखाया जाता है । इस प्रकार इस चूर्ण में 11 बार आंवले के रस की भावना दी जाती है और हर बार इसे सुखाया जाता है । 11 भावना के पूर्ण हो चुकने पर इसी चूर्ण को आमलकी रसायन कहा जाता है । ये परिचय यहाँ सिर्फ आपकी जानकारी के लिये प्रस्तुत किया गया है बाकि तो आप इसे किसी भी प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक औषधि निर्माता कम्पनी का बना हुआ तैयार आमलकी रसायन बाजार से 100 ग्राम मात्रा की पेकिंग में खरीदकर काम में ले सकते हैं ।

            अब असगन्धआमलकी रसायन के इन दोनों चूर्ण को आपस में मिलाकर किसी भी एअर टाईट शीशी या डिब्बे में भरकर रख लें और समान मात्रा में मिश्रीत इस चूर्ण को पहले सप्ताह सिर्फ चाय के आधा चम्मच के बराबर मात्रा में लें व इसमें शहद मिलाकर प्रातःकाल इसका सेवन कर लें । एक सप्ताह बाद आप इस आधा चम्मच मात्रा को एक चम्मच प्रतिदिन के रुप में लेना प्रारम्भ कर दें ।

            यदि आप शहद न लेना चाहें तो मिश्री की चाशनी इतनी मात्रा में बनाकर रखलें जितनी 8-10 दिन में समाप्त की जा सके । इस चाशनी में 4-5 इलायची के दाने भी पीसकर डाल दें और इस चाशनी के साथ असगन्ध व आमलकी रसायन का यह चूर्ण उपरोक्तानुसार सेवन करें । लेकिन शुगर (मधुमेह) के रोगियों को इसे चाशनी की बजाय शहद मिलाकर ही लेना उपयुक्त होता है ।

             इसके नियमित सेवन से उपरोक्त वर्णित शिकायतें दूर होने के साथ ही शरीर सबल, शक्तिशाली व सुडौल होता जाता है । पिचके गाल भर जाते हैं और शरीर का दुबलापन दूर हो जाता है । इसे युवा लडके-लडकियां तथा प्रौढ व वृद्ध स्त्री-पुरुष सभी सेवन कर सकते हैं ।

             प्रतिदिन सुबह खाली पेट कम से कम 40 दिनों तक इसका सेवन करें । इस अवधि में तले पदार्थ, तेज मिर्च मसाले, खटाई (इमली, अमचूर व कबीट की), मांसाहार व शराब का सेवन (यदि करते हों तो) बिलकुल बन्द रखें । भोजन भूख से थोडी कम मात्रा में और अच्छी तरह से चबा-चबा कर करें । चाहें तो 40 दिनों से ज्यादा समय तक भी आप इसका सेवन कर सकते हैं । उपरोक्त सभी शारीरिक समस्याओं में पूर्ण लाभकारी व निरापद प्रयोग माना जाता है ।
 
            विशेष- कुछ लोगों को शहद या चाशनी में मिलाकर इसे लेने में किसी भी कारण से कोई असुविधा महसूस होने पर दूध के साथ फांककर भी इसका प्रयोग करने का सुझाव प्रशिक्षित वैद्यों के द्वारा देते देखा गया है । अतः आप इसे शहद (प्रथम), मिश्री की चाशनी (द्वितीय) व दूध (तृतीय) गुणवत्ता के आधार पर समझते हुए अपनी सुविधानुसार इसका प्रयोग कर सकते हैं । 

रविवार, 27 मार्च 2011

त्वचा रोगों से बचाव के लिये- नीम


          
           बसन्त ऋतु के समापन के इस दौर में विकसित हो रही नीम की पत्तियों को लगभग 50 ग्राम मात्रा में पीसकर इनकी मटर के दाने के बराबर गोलियां बनालें व उन्हें सुखाकर अगले 21 दिनों तक एक गोली प्रतिदिन प्रातः पानी से निगल लें ।  इस आसान तरीके से आप अपने शरीर की त्वचा को अगले पूरे वर्ष तक किसी भी प्रकार के चर्मरोग या अन्य किसी भी दाद-खाज, कील-मुंहासे जैसी समस्या से सुरक्षित रखने के साथ ही अपने शरीर की रक्तशुद्धि भी इस माध्यम से कर सकते हैं । सीमित दायरे में यह प्रयोग आपको मधुमेह/डाइबिटिज से बचाव में भी कारगर साबित होगा ।
 
           वैसे तो बसन्त ऋतु के प्रारम्भ से ही जानकार लोग इसकी ताजी कौंपलों का अगले 42 दिनों तक के लिये सेवन करना प्रारम्भ कर देते हैं किन्तु इसके अत्यन्त कडवे स्वाद के कारण सामान्य तौर पर अधिकांश लोग इसका चबाकर सेवन नहीं कर पाते हैं जबकि मटर के दाने के बराबर की एक गोली आसानी से पानी द्वारा निगलकर भी हम इन्हीं लाभों को प्राप्त कर सकते हैं । 
 
          
पुरुष वर्ग में नीम का अधिक सेवन पुरुषत्व में कमी भी करता है अतः 21 दिनों से अधिक नीम की इन गोलियों का सेवन न करें ।


बुधवार, 23 मार्च 2011

बचाव : छुपे हुए महारोग- मधुमेह (शुगर / डायबिटिज) से.

          हमारे आस-पास शुगर की बीमारी से पीडित लोगों की कमी नहीं दिखती । ऐसे लोग भी इसकी गिरफ्त में दिखते हैं जिन्होंने मीठा खाने का कभी मोह नहीं पाला किन्तु फिर भी वे शुगर पेशेन्ट हैं, और मैं इसे उजागर होने के बाद भी छुपा हुआ महारोग इसलिये मानता हूँ कि एक बार शरीर में घर कर लेने के बाद न तो ये आसानी से रोगी का पीछा छोडता है और यदि इसका रोगी अपने खान-पान व जीवन शैली में इसके अनुकूल परिवर्तन न कर पाए तो इसकी विकटता शीघ्र ही विकराल स्थिति में पहुंचकर पहले रोगी के पैर का पंजा और फिर प्राण अकाल उम्र में ही आसानी से हर लेती है । मेरी जानकारी में इसके अधिकतम रोगी वे देखने में आये हैं जो नाना प्रकार की चिंताएँ अपने जीवन में स्वयं पर ओढे रखते रहे । अतः सबसे पहले तो हम स्वयं को अनावश्यक चिंताओं से जितना बचाकर रख सकते हैं, अवश्य बचावें । इसके अलावा यदि आप या आपका कोई भी प्रियजन इस रोग की गिरफ्त में यदि आ ही गये हों तो निम्न उपचार के द्वारा स्वयं को रोगमुक्त रखने का प्रयास करें-
  
           1.  सदा सुहागन के फूल दो प्रकार के होते हैं- 1. सफेद रंग के, व 2. बैंगनी रंग के.  सुबह के वक्त बैंगनी रंग के चार-पांच फूल एक खाली कप में रखें व एक खाली कप साथ में और रखें । फिर उबलता हुआ गर्म पानी दोनों कप में डालकर पीने योग्य होने तक रखा रहने दें । जब यह पानी पीने योग्य कुनकुना गर्म रह जावे तो फूल उस कप में निचोडकर फेंक दें व पहले फूल वाले कप का और फिर सादा पानी पी लें । सात दिन यह प्रयोग चालू और फिर सात दिन बन्द रखें । इस प्रकार दो महिने तक इस प्रयोग को कर लेने के बाद ब्लड शुगर की जांच करवा लें । इस उपचार का कुछ भुक्तभोगियों का यह अनुभव भी रहा है कि शुगर का नामोनिशान भी बाद में देखने को नहीं मिला ।
           2.  रात को दो चम्मच मेथीदाना एक लोटा पानी में डालकर रखदें । सुबह शौच जाने के पूर्व इसका पानी छानकर पी लें और मेथीदाने अंकुरित होने के लिये रख दें । यह अंकुरित मेथीदाने अगली सुबह खाने में काम में लेते रहें । इसके साथ ही बिना छिली लौकी को हल्का सा उबालकर मिक्सर में इसका आधा गिलास रस निकालकर एक चुटकी पिसी काली मिर्च, एक चुटकी सौंठ व तुलसी और पोदीना की 5-5 पत्ती आधा गिलास पानी में मिलाकर भोजन के आधा घंटे बाद प्रतिदिन एक बार लेते रहें ।

          3.  भिंडी को खडी चार हिस्सों में चीरकर एक गिलास पानी में रात को गलादें व सुबह इसे उसी पानी में मसलकर व छानकर पी लें । पूर्णतः परीक्षित है ।

          4.  हल्दी 10 ग्राम, मेथीदाने 20 ग्राम और भुने चने 50 ग्राम पीसकर यह पावडर 4-5 दिन में सुबह खाली पेट लेकर खत्म कर लें ।

          5.  जामुन के 10 पत्ते,  नीम की 20 पत्तियां,  बेल के 30 पत्ते  और तुलसी की 40 पत्तियां सबको मिलाकर सुखा लें और पीसकर एक शीशी में भर लें । एक चम्मच चूर्ण सुबह खाली पेट लें व उससे भी पहले शुगर की जांच करवा लें, दस दिन तक यह प्रयोग करने के बाद फिर से शुगर की जांच करवा लें और यदि शुगर ना्र्मल दिखे तो यह प्रयोग बन्द करदें ।

          6.  छोटे आकार के मिट्टी के कुल्हड में 10 ग्राम गुडमार के पत्ते डाल कर पानी भर दें । इसे रात भर खुली जगह ओस में रखें । सुबह इसे छानकर इसमें 2 छोटे बताशे घोलकर खाली पेट यह पानी पी लें । 3-4 महिने लगातार इसके सेवन से मधुमेह रोग नष्ट हो जाता है ।
                       
          यहाँ शुगर / डायबिटिज के उपचार के लिये ये अलग-अलग प्रमाणित जानकारियां प्रस्तुत की गई हैं । आप इनमें से जो भी उपचार आपके लिये उपलब्ध हो सके उस मुताबिक इनका प्रयोग कर लाभ ले सकते हैं । इसके अलावा इस जटिल रोग से स्वयं को मुक्त रखने के लिये अनिवार्य रुप से स्वयं को अनावश्यक चिंताओं से बचाए रखने के साथ ही नियमपूर्वक प्रतिदिन कम से कम 3 किलोमीटर पैदल चलने की दिनचर्या अवश्य बनावें । इसके साथ ही अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, कद्दू, साबुत अंकुरित अनाज व मूंगफली, बादाम, काजू व अखरोट जैसे सूखे मेवों का यथासम्भव अधिकाधिक प्रयोग करें ।

                डायबिटीज पर प्रभावी रोकथाम हेतु कृपया नीचे की इस लिंक को भी क्लिक कर अवश्य देखें...
                 किडनी रोग से बचाव और डायबिटीज (मधुमेह) से मुक्ति के सफल प्रयास हेतु...

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

बेरंग न करदें होली के ये रंग.

  
      
          19 मार्च से प्रारम्भ होली का यह सतरंगी त्योंहार रंगपंचमी तक हमें चाहे-अनचाहे न सिर्फ रसायन व केमिकल मिश्रीत घातक रंगों के बल्कि उत्साह के चरमोत्कर्ष के समय धूल, मिट्टी व कीचड का भी रंगों की जगह प्रयोग करने वाले उत्पातियों के सम्पर्क में रखेगा । एक ओर इन केमिकल मिश्रीत रंगों के सम्पर्क में आने से जहाँ त्वचा में जलन व खुजली जैसी समस्याओं के साथ ही स्कीन एलर्जी व मुंहासों की समस्या का जनसामान्य को बहुतायद से सामना करना पडता है वहीं इनके आंखों में चले जाने से नजरों से जुडी समस्याएँ अंधत्व की सीमा तक प्रभावित व्यक्ति को हानि पहुँचा सकती हैं ।
 
         इनसे बचने के लिये प्राकृतिक रंगों के प्रयोग की यदि बात की जावे तो संभव है कि आप तो इन प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कर रहे हों किन्तु आपके सामने वाले इन घातक रंगों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हों इस बात की कोई ग्यारन्टी नहीं होगी । यदि आप होली के इन रंगों से पूरी तरह दूर रहना चाहें तो भी सर्वत्र छूत की बीमारी जैसे आवेग के चलते ऐसी कोई श्योरिटी नहीं हो सकती कि आप वाकई
इससे दूर रह पावें । इन स्थितियों में इसके घातक प्रभावों से स्वयं को यथासम्भव बचाते हुए ही इस त्यौंहार को मनाना सर्वश्रेष्ठ विकल्प हो सकता है । और इनके दुष्परिणामों से बचने के लिये ये प्रारम्भिक उपाय हम सभी के लिये श्रेयस्कर हो सकते हैं-
 
          1. धुलंडी व रंगपंचमी के दिन अपने शरीर पर पर्याप्त मात्रा में माश्चराइस क्रीम अथवा सरसों या खोपरे का तेल लगाकर रहें, और यदि होली के माहौल में चलाकर शामिल होने जा रहे हैं तो इस उपाय का पहले ही विशेष  इन्तजाम करके निकलें जिससे कि सामने वाला पक्ष यदि आपके न चाहते हुए भी रसायनों व केमिकल मिश्रीत रंगों का आप पर प्रयोग कर रहा हो तो वे घातक रंग आपकी त्वचा से कम मेहनत में अधिक आसानी से शीघ्र छुडाए जा सकें ।
 
          2. रंग भरे गुब्बारे के आक्रमण से अपने चेहरे विशेषतः आंख व कान को बचाने के प्रति पर्याप्त सचेत रहने का प्रयास करें । अनुभवों से देखने में आया है कि पानी की तेज धार के साथ ही कान के पास आकर वेग से पडने वाले गुब्बारे हमारे कान के पर्दे को क्षतिग्रस्त कर हमेशा के लिये हमारी श्रवण शक्ति को प्रभावित कर सकते हैं और आंखों पर पडी रंगों की मार या आंख के पास आकर फूटने वाले गुब्बारे इनमें भरे रंगों के आंखों की पुतलियों में चले जाने से लम्बे समय तक के लिये आपको आंखों की अनचाही समस्याओं में उलझा सकते हैं । यदि आप अपनी आंखों पर कान्टेक्ट लेंस का इस्तेमाल करते हैं तो ये लेंस भी हमेशा के लिये खराब हो सकते हैं । इनसे बचाव के लिये होली वाले माहौल में भी सनग्लासेस के इस्तेमाल के साथ ही आंखों के आसपास पहले से क्रीम लगाकर रखें और सडक पर चलते हुए दुपट्टे या गमछे जैसे साधन से चेहरे को सुरक्षित रखने का प्रयास करें उसके बाद भी यदि आंखों में रंग चला जावे तो पहले उसे स्वच्छ पानी से साफ करें व यदि आवश्यक लगे तो चिकित्सकीय सलाह भी शीघ्र लें ।
 
           3. यदि आपको साइनस या सर्दी-जुकाम जैसी कोई समस्या है तो किसी भी रुप में गीले रंगों से खेली जाने वाली होली आपकी समस्या को बहुत अधिक बढवा सकती है । सांस लेने में कोई भी समस्या आप कम या ज्यादा महसूस करते हैं तो सूखे रंगों के प्रयोग वाले स्थान से बिल्कुल दूरी बनाकर रखें ।
 
           4. पहले सिर्फ गुलाल से खेली जाने वाली होली को प्रायः सुरक्षित समझा जा सकता था किन्तु अब मिलावट के इस युग में 4-6 घंटे गुलाल का प्रयोग भी आपको लम्बे समय तक सिरदर्द के साथ ही मितली आने, त्वचा पर दाने निकलने, व दमे जैसी सांसों की स्थाई तकलीफ की समस्या में धकेल सकता है । इसलिये इसे भी देर तक अपने चेहरे पर न टिकने दें व जल्दी-जल्दी इसे अपने चेहरे व शरीर से यथासम्भव साफ करते रहें । अपनी नाक व मुंह में भी रंग न जाने पावे इसका पूरा ध्यान रखें ।
 
           5. घर में बेसन व हल्दी का उबटन तैयार रखें और रंग खेलकर आने के बाद शरीर से रंग छूडवाने के लिये इसी उबटन का प्रयोग करें जिससे कि आपको त्वचा में जलन जैसी कोई समस्या नहीं हो जबकि सिर्फ साबुन विशेषकर कपडे धोने का साबुन व घासलेट जैसे माध्यमों से रंग छूडाने के प्रयास में आपको घंटों त्वचा में जलन की समस्या का सामना करना पड सकता है ।
 
          होली के रंगों से जुडी ऐसी किसी भी समस्या का बाद में सामना करने से अधिक बेहतर है कि बचाव के इन तरीकों का इस्तेमाल करते हुए ही होली के इस त्यौंहार का  निर्विघ्न आनन्द लिया जावे ।
       
होली के इस रंगारंग पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ...

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