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सोमवार, 31 जनवरी 2011

इससे पहले कि सांस थम जावे...

       
         
           किसी दमे के रोगी को क्या कभी आपने गौर से देखा है ? सांस का मामूली कतरा शरीर में ले पाने की कोशिश की उसकी छटपटाहट या तो स्वयं भुक्तभोगी समझ पाता है या फिर कुछ प्रतिशत में उसके वे परिजन जो उसके बहुत निकट रहने वाले होते हैं । स्थिति बिगडने पर बार-बार कृत्रिम उपकरणों की मदद से भी जब सांस लेना दूभर हो जाता है तो परिजनों के पास हजारों रु. प्रतिदिन के कमरतोड खर्च को झेलते हुए फिर पीडित को वेन्टीलेटर पर रखवाकर ठीक होने का प्रयास करना ही उपचार का अन्तिम विकल्प बचता है और अधिकांश मामलों में पीडित को तब भी स्वयं सांस लेने में सक्षम बन पाने की बनिस्बत सांस खोकर सीधा अन्तिम यात्रा पर ही प्रस्थान करना पडता है .।

          ऐसा प्रायः इसलिये होता है कि सामान्य जीवन में हम सभी छोटे-छोटे सांस लेकर ही जीवित रहने के अभ्यस्त होते हैं । जिससे फेफडों की कुल क्षमता के मात्र 25% हिस्से तक तो आक्सीजन की आपूर्ति बनी रहती है लेकिन शेष 75% हिस्सा लगभग निष्क्रिय रहने के कारण धीरे-धीरे रोग की चपेट में आने लगता है जिससे शरीर में खांसी, ब्रोंकाईटिस और टी. बी. जैसे रोगों के साथ ही फेफडों में ब्लाकेज जैसी लाइलाज बीमारियां खतरनाक सीमा तक पैर पसारती चली जाती हैं । 

           इस स्थिति से बचने का एकमात्र सरल, सुलभ और बिल्कुल सस्ता तरीका होता है सांसों को पूरी गहराई तक लेने व धीरे-धीरे वापस छोडने की प्रक्रिया याने प्राणायाम । यदि हम प्रतिदिन 15-20 मिनीट का समय निकालकर जहाँ हैं वहीं ध्यानस्थ मुद्रा में बैठकर मात्र अपनी पूरी क्षमता से अधिक से अधिक गहरी सांस शरीर में अन्दर तक खींचकर, यथासम्भव कुछ पल उसे शरीर में रोककर और फिर थोडा धीमी गति से जैसे रुकते हुए से उस सांस को बाहर छोडते हुए फिर-फिर इसी क्रम को दोहराते चले जावें तो फेफडों की अन्दरुनी क्षमता सुदृढ व मजबूत बनी रहेगी और तब आप इस किस्म की किसी भी बीमारी से लम्बे समय तक सुरक्षित रह सकेंगे ।

          सांस लेने व छोडने के विभिन्न क्रम से शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के इस प्रयास को ही प्राणायाम के नाम से जाना जाता है । शरीर के विभिन्न अवयवों को इस माध्यम से पूर्ण स्वस्थ रखने के लिये योग विधा के जानकार मनीषियों ने इसमें मुख्य सात प्रकार के क्रम निर्धारित किये हैं जिन्हे सरल शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है-

          1.  भस्त्रिका प्राणायाम - दोनों नासिका छिद्रों से वेगपूर्वक गहरी सांस अन्दर तक खींचकर वेगपूर्वक ही बाहर की ओर वापस फेंक देना, यह भस्त्रिका प्राणायाम कहलाता है । पेट तक नहीं सिर्फ सीने में पूरी क्षमता से श्वास भरकर, वापस छोडते हुए इसे आप प्रतिदिन 3 से 5 मिनिट तक या लगभग 25 बार लगातार कर सकते हैं और यदि आप ह्रदय रोग से पीडित हैं तो आप इन्हें धीमी गति से करके भी ये लाभ प्राप्त कर सकते हैं-
          लाभ- सर्दी-जुकाम, एलर्जी, श्वासरोग, नजला, साईनस, दमा व समस्त कफ रोगों से बचाव होता है, फेफडे मजबूत बनते हैं, थायराईड व टांसिल्स जैसे गले के रोग दूर होते हैं, शरीर से विषाक्त व विजातीय पदार्थ दूर होते हैं, रक्त शुद्ध व रक्त परिभ्रमण सुव्यवस्थित होता है और ह्रदय व मस्तिष्क को शुद्ध प्राणवायु मिलने से शरीर को आरोग्य लाभ होता है ।

           2.  कपालभाति प्राणायाम - श्वास को अन्दर भरें बगैर ही तेज गति से लगातार बाहर की ओर फेंकते चले जाने की प्रक्रिया कपालभाति प्राणायाम कहलाती है, इसमें जो श्वास स्वमेव शरीर में आती व रहती है उसे ही हम लगातार बाहर की ओर फेंकते चले जाते हैं और ये प्रक्रिया इतनी तेजी से भी संभव है कि आप इसे 1 मिनिट में 60 से भी अधिक बार तक आसानी से कर सकते हैं । इसके लिये भी निर्धारित समय सीमा 3 से 5 मिनिट तक मानी जा सकती है । इस अवधि में भी प्रारम्भ में आपको थकान महसूस होने पर बीच-बीच में रुक-रुक कर इस अभ्यास की नियमितता बनाये रखी जा सकती है । कुछ लोगों को इसके अभ्यास के प्रारम्भिक दौर में कमर या पेट में हल्का दर्द महसूस हो सकता है जो इसके अभ्यास की नियमितता से बन्द हो जाता है । इसके अभ्यास से हमारे शरीर को ये लाभ मिलते हैं-
           लाभ- मुखमण्डल पर ओज, तेज, आभा और सौन्दर्य के विकास के साथ ही दमा, श्वास, एलर्जी व साइनस जैसे रोग, ह्रदय, मस्तिष्क व फेफडों से सम्बन्धित सभी रोग और
मोटापा, शुगर, कब्ज, किडनी व प्रोस्ट्रेट से सम्बन्धित सभी रोग दूर होते हैं । मन शांत व प्रसन्न रहने के कारण डिप्रेशन जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है । आंतों को सबल बनाने हेतु ये सर्वोत्तम प्राणायाम माना जाता है ।

           3.  बाह्य प्राणायाम - ध्यानस्थ मुद्रा में स्थिर बैठकर श्वास अन्दर खींचकर पूरी सांस बाहर निकाल दें और गुदाद्वार को संकुचित रखते हुए, पेट को अन्दर की ओर खींचकर (सिकोडकर) व गर्दन को कंठकूप से चिपकाकर जितने देर श्वास रोककर इस स्थिति में रुकना संभव हो सके रुकें,  और जब श्वास लेना आवश्यक लगने लगे तब श्वास ले लें व सामान्य अवस्था में आने के बाद पुनः इसी क्रम को दोहराएं । सामान्य स्थिति में इस बाह्य प्राणायाम की 3 आवृत्ति प्रतिदिन के लिये पर्याप्त मानी जाती है । कुछ लोगों को प्रारम्भ में इससे पेट या शरीर के रोगग्रस्त भाग में हल्का दर्द महसूस हो सकता है जो अभ्यास की नियमितता से जाता रहता है । इस बाह्य प्राणायाम से शरीर को निम्न लाभ विशेष रुप से मिलते हैं-
           लाभ- सभी पेट रोग, स्वप्नदोष व शीघ्रपतन की समस्या इससे दूर होती है । जठराग्नि प्रदीप्त होती है । मन की चंचलता दूर होकर बुद्धि व विचार शक्ति इससे सूक्ष्म व तीव्र होती है । 

           4.  अनुलोम-विलोम प्राणायाम - ध्यानस्थ मुद्रा में सीधे बैठकर हाथों को चेहरे के करीब लाकर सहज मुद्रा में दांये हाथ से अंगूठे के द्वारा दांयी ओर के नासिका छिद्र को बन्द करके नाक के बांये छिद्र से धीरे-धीरे श्वास अन्दर भरें । श्वास पूरा अन्दर भर चुकने पर बीच की व अनामिका (रिंग फिंगर) उंगली से नाक के बांये स्वर को बन्द करके दांई ओर के नासिका छिद्र से आप इस श्वास को बाहर निकाल दें उसके बाद यही प्रक्रिया दांई ओर के नासिका छिद्र से श्वास अन्दर भरकर बांई ओर के नासिका छिद्र से बाहर निकालकर इसे दोहराते चलें । इसे भी आप अपनी सुविधा अनुसार 3 से 5 मिनिट तक प्रतिदिन करते रह सकते हैं और एक मिनिट में यह प्रक्रिया 25 बार तक दोहराई जा सकती है । इस प्राणायाम के माध्यम से हमारे शरीर को निम्न लाभ प्राप्त होते हैं-
           लाभ- इस प्राणायाम से शरीर को होने वाले लाभों का उल्लेख कम शब्दों में नहीं किया जा सकता । यह माना जाता है कि सर्वाधिक लाभ प्राणायाम में शरीर को कपालभाति के साथ ही अनुलोम-विलोम प्राणायाम से ही मिलते हैं । संक्षिप्त में हम यूं समझ सकते हैं कि उपर दर्शित सभी लाभों का रिपिटेशन इसके माध्यम से होने के साथ ही ह्रदय व फेफडों की शिराओं में आये ब्लाकेज इसके 3-4 माह के अभ्यास से 50% से भी अधिक धीरे-धीरे खुल जाते हैं । कोलेस्ट्राल व ट्राइग्लिस्राइड्स की अनियमितताएं दूर हो जाती हैं । इसके माध्यम से शरीर की समस्त नस-नाडियां शुद्ध हो जाने से नकारातमक चिंतन समाप्त होकर सकारात्मक विचार बढने लगते हैं और शरीर पूर्ण स्वस्थ, कांतिमय व बलिष्ठ बनता है ।

          5.  भ्रामरी प्राणायाम - फेफडों में गहराई तक सांस अन्दर भरकर मध्यमा (बडी) उंगली से आंखें, व अंगूठों से दोनों कानों को बन्द करके सिर्फ गले से 'ओsम्'  नाद का उच्चारण भंवरे के गुंजन सी शैली में करते हुए इस श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड दें । पुनः इस प्रक्रिया को दोहराते हुए कम से कम तीन बार इस भ्रामरी प्राणायाम को नियमित करें ।
        लाभ- भ्रामरी प्राणायाम करते रहने से मानसिक तनाव, उत्तेजना, हाई ब्लड-प्रेशर, ह्रदयरोग व मन की चंचलता दूर होती है । 'ओsम्' रुप में इस अवधि में ईश्वर-ध्यान भी इस तरीके से हो जाता है ।

           6.  ओंकार जप प्राणायाम - इस प्राणायाम के द्वारा हम शरीर की स्थिर क्षमता बढाने के साथ ही अध्यात्म से जुडने का आनन्द ले पाते हैं । एक मिनिट के 60% हिस्से में हम अत्यन्त शांति से धीमी गति में 'ओ' शब्द का मन ही मन उच्चारण करते हुए सांस को शरीर में अन्दर की ओर बिना अतिरिक्त प्रयास के उसकी सामान्य गति से जाने दें और शेष 40% हिस्से में 'म्' का उच्चारण मन ही मन करते हुए इस श्वास को बाहर की ओर आने दें । एक मिनिट में सिर्फ एक सांस, गति ऐसी कि यदि नाक के आगे रुई का टुकडा भी रखा हो तो वह न हिल पावे । तीन बार इसकी भी नियमितता बनाये रखने का अभ्यास बनाने का प्रयास करें ।

          7.  नाडी शोधन प्राणायाम - नाडी शोधन प्राणायाम के लिये अनुलोम - विलोम प्राणायाम के समान ही दांई ओर के नासिका छिद्र को बन्द रखकर बांई ओर के नासिका छिद्र से धीमे-धीमे श्वास अन्दर भरें । पूरा श्वास अन्दर भर चुकने पर मूलबंध (गुदाद्वार का संकुचन करते हुए) व जालंधर बंध (गर्दन नीची करके ठोडी से कण्ठकूप को दबाते हुए) श्वास को यथाशक्ति अन्दर रोककर रखें । जब श्वास अन्दर रोके रखना मुश्किल लगने लगे तो मूलबंध व जालंधर बंध को छोडते हुए अब दांई ओर के नासिका छिद्र से इस श्वास को धीरे-धीरे बाहर की ओर छोडदें । इस फार्मूले को यूं समझें- यदि 10 सेकन्ड में श्वास अन्दर आ रही है तो 10 से 20 सेकन्ड तक उसे अन्दर रोकने में और 20 ही सेकन्ड उस श्वास को बाहर छोडने मे लगाने का प्रयास करते हुए तीन बार इसे करें और इस अवधि में अपने ईष्टदेव का स्मरण, गायत्री मंत्र जाप या फिर 'ओsम्' उच्चारण मन ही मन में करते रहें ।

          निश्चित रुप से ये अभ्यास हमारे शरीर से अधिकांश रोगों को दूर रखने में पूर्ण उपयोगी साबित होते हैं और प्रातःकाल 20 मिनिट के नियमित क्रम में इन्हे पूरा भी किया जा सकता है । यह अलग बात है कि सामान्य मानव-प्रवृत्ति के अनुसार हम इसके लाभों को समझते हुए और इस समय को लगा सकने की स्थिति में होते हुए भी प्रायः आलस्यवश इसे करने से बचते रहना चाहते हैं । अतः उस आलस के विकल्प की स्थिति में भी किसी भी तरीके से और कभी भी श्वास को पूरी क्षमता और गहराई के साथ फेफडों में अन्दर तक भरें और कुछ पल अन्दर रोकते हुए धीमी गति से उसे बाहर छोड दें । इस क्रम को दिन भर में
कम से कम 30-40 बार हम बगीचे में घूमते हुए, सडक पर चलते हुए या फिर वाहन में बैठे हुए भी नियमित रुप से बनाये रख सकते हैं जिससे हमें या हमारे परिजनों को उपरोक्त स्थिति में वर्णित वेंटीलेटर जैसी खौफनाक त्रासदी का यथासंभव सामना न करना पडे । इस प्रयास को चाहे तो ये सोचकर ही सही कि-

दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय,
जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होय.
अवश्य करते रहें ।

   

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

प्रौढावस्था में सामान्य स्वास्थ्य-




      जीवन के 55 वर्ष पूर्ण हो चुकने पर प्रौढावस्था का प्रारम्भ मानते हुए अपनी दिनचर्या में सरलता व नियमितता लाने का प्रयास हमारे हर आते कल के लिये उपयोगी हो सकता है । इसके लिये कुछ सामान्य प्रयास श्रेयस्कर हैं-

        प्रौढावस्था में प्रातः सूर्योदय से पहले यथासम्भव फ्रेश होकर टहलने के लिये निकल जाने का प्रयास करें । इस आयु में दिनचर्या का पालन अनिवार्य रुप से करने की कोशिश करें । सुबह और शाम 2-3 किलोमीटर या सरलता से जितना टहल सकें उतना टहलने का अथवा हल्का-फुल्का योग व प्राणायाम करने का प्रयास करें । सुबह खाली पेट एक चम्मच साबुत मैथीदाना पानी के साथ बिना चबाए निगल लिया करें और भोजन के बाद द्राक्षासव, अमृतारिष्ट और अश्वगंधारिष्ट तीनों को चाय के 3-3 चम्मच मात्रा में आधा कप पानी में डालकर दोनों वक्त सेवन कर लिया करें । गरिष्ठ व अधिक तेल मसालेदार भोजन से बचने का प्रयास करते हुए सामान्य भोजन ठीक वक्त पर खूब चबा-चबाकर करें । कम से कम 10 गिलास पानी प्रतिदिन अनिवार्य रुप से पीने की आदत बनावें ।

         इस अवस्था में आने तक जो भी काम हम कर रहे हों उसे बिना किसी तनाव के आराम से और अपने समय का रचनात्मक उपयोग करने के निमित्त की मनोवृत्ति रखकर करना अच्छा होता है । इसके साथ ही शेष रहे जीवन के सुख के लिये लिये अपनी बचत को मितव्ययिता के साथ अपने पास सुरक्षित रखते हुए यथासम्भव क्रोध चिन्ता, मानसिक तनाव, लोभ और ईष्र्या के मनोभावों से बचने का प्रयास करें और यह सोचकर मानसिक रुप से अनावश्यक मोह-माया व लालसा को त्याग देने की कोशिश करें कि एक दिन तो सब छोडकर चल ही देना है ।

         रात को सोते समय एक गिलास दूध में आधा चम्मच पिसी सौंठ और एक अंजीर काटकर चार टुकडे करके डालकर उबालें । आधा घंटे बाद उतार लें और कुनकुना गर्म रहे तब अंजीर चबा-चबाकर खाते हुए घूंट-घूंट करके यह दूध पिएं । पेट पूरी तरह साफ न होता हो तो इस दूध के साथ दो चम्मच इसबगोल की भूसी ले लिया करें । भारी और चिकनाईयुक्त खाध्य पदार्थों के सेवन से यथासम्भव बचने का प्रयास करें ।

          वर्तमान समय में 65-70 वर्ष की गुजरती उम्र को विभिन्न पडावों पर ईश्वर प्रदत्त बढता हुआ बोनस मानकर आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करें ।

       पढने योग्य लिखा जावे, इससे लाख गुना बेहतर है कि लिखने योग्य किया जावे ।

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

राज सौंदर्य, सेहत व लम्बी उम्र.के.

        प्रायः सभी स्त्री व पुरुष अलग-अलग उम्र व परिवेष में स्वस्थ व सुंदर रहने-दिखने के लिये अनेकों प्रयत्न करते हैं, कई प्रकार के विटामिनों के साथ ही कृत्रिम सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करते हैं किन्तु इस दिशा में कुछ मूलभूत आवश्यकताओं को प्रायः नजरअन्दाज कर जाते हैं । जबकि स्वास्थ्य व सौंदर्य के साथ ही निरोगी जीवन के लिये इन बातों को यथासम्भव अपनी जीवनशैली में अपनाकर इन महत्वपूर्ण लक्ष्यों को आसानी से हासिल किया जा सकता है-

            समय पर संतुलित भोजन करें- अक्सर अपने काम की व्यस्तताओं में या तो हम भोजन को नजरअन्दाज कर भूख लगने पर कुछ तो भी तले-गले रेडिमेड या फास्टफूड टाईप के खाने से काम चला लेने का प्रयास करते हैं या फिर स्वादिष्ट भोजन की लालसा में पर्याप्त गरिष्ठ भोजन आवश्यकता से अधिक मात्रा में खाते रहते हैं जबकि ये दोनों ही स्थितियां हमारे शरीर का स्वास्थ्य और सौन्दर्य दोनों को धीरे-धीरे नष्ट कर देती हैं । पौष्टिक भोजन जहाँ हमारे सौंदर्य व स्वास्थ्य को बरकरार रखता है वहीं पेटू प्रवृत्ति से किया गया गरिष्ठ भोजन अच्छे खासे शरीर पर चर्बी की परतें चढाते हुए बीमारियों को निमंत्रित करता चलता है । इसलिये भोजन हमेशा समय पर अनिवार्य रुप से करने की आदत बनावें । चिकनाईयुक्त गरिष्ठ भोजन से यथासम्भव बचते हुए ताजे फल, हरी सब्जी, सलाद, दूध व अनाज पर आधारित कम घी-तेल व मसालेदार भोजन का सेवन बिना किसी अतिरिक्त बाहरी सौंदर्य प्रसाधन व टानिक के शरीर को पुष्ट-निरोगी व त्वचा को कांतिवान बनाये रखता है ।

            क्रोध व ईर्ष्या से बचें- उसकी कमीज मेरी कमीज से अधिक सफेद कैसे ? इस प्रकार की सोच हममें ईर्ष्या व क्रोध की प्रवृत्ति पनपाती है जिससे हमारे स्वास्थ्य व सौंदर्य दोनों पर विपरीत प्रभाव पडता है । इसके दुष्परिणामों के रुप में पहले तनाव फिर चिंता और फिर नींद गायब हो जाती है जो हमारे शरीर को कब रुग्णावस्था में पहुंचा देती है हमें मालूम भी नहीं पडता । इसलिये अपने स्वास्थ्य व सौंदर्य को बनाये रखने के लिये यथासंभव क्रोध और ईर्ष्या के मनोभावों से स्वयं को बचाकर रखना अत्यन्त आवश्यक समझें । अपनी किसी भी शारीरिक या दुनीयावी कमी पर कुंठित होने की बनिस्बत अपने प्रयासों से आप उसे दूर करने की कोशिश करें और यह चिन्तन हमेशा अपने ख्याल में रखें-
        पराई अमानत को देखकर हैरान न हो, खुदा तुझे भी देगा परेशान न हो.

           अनावश्यक चिंता से बचें- चिता तो जीवन में सिर्फ एक बार हमें जलाकर दुनियादारी से हमारे मोह माया के रिश्ते को पूरी तरह से मुक्त कर देती है किन्तु चिंता जीते जी धीरे-धीरे हमें जलाती रहती है अतः गीता सार को जीवन में अपनाते हुए चलें कि जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो होगा अच्छा ही होगा ।  हमेशा चिंताओं में घिरे रहकर हम न सिर्फ अपना आज बल्कि आने वाला कल भी बिगाडते चले जाते हैं और हमें मालूम भी नहीं पडता कि कब हमारा शरीर अपना स्वाभाविक सौंदर्य खोते हुए कैसे बीमारियों की गिरफ्त में फंसता चला जा रहा है इसलिये आज में रहकर जो भी संसाधन हमारे पास उपलब्ध हों उसमें पूर्ण संतुष्टि के साथ जीवन जीने की आदत डालें और कवि हरिवंशराय बच्चन के इस जीवन-दर्शन को सामने रखते हुए चलें कि "मन का हो जावे तो बहुत अच्छा, और मन का न हो पावे तो उससे भी अच्छा" ये विपरीत बात समझ में आने वाली लगती नहीं है किन्तु मन का न हो पाने का मतलब यह कि ईश्वर को ये मंजूर नहीं था, और ईश्वर तो आपका बुरा चाहेंगे नहीं, इसलिये मन का न हो पावे तो उससे भी अच्छा का जीवन दर्शन हमेशा आपको अनावश्यक निराशा से बचाने में मददगार साबित होता है ।

            खुश रहने की आदत बनावें- मानव जीवन उतार-चढाव और सुख-दुःख के चक्र से कभी मुक्त नहीं रह पाता है, अतः किसी भी अप्रिय स्थिति को हमेशा दिमाग में रखकर उसकी सोच में घुलते रहना, हर किसी के सामने अपनी दयनीय स्थिति का दुःखडा रोते रहना हमें जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण की ओर ले जाता है जिसके विपरीत परिणाम हमारे शरीर को पहले अपने सौन्दर्य और फिर स्वास्थ्य को खोकर चुकाना पडते हैं अतः यदि विपरीत परिस्थितियां भी हमारे सामने हों तो पूरे धैर्य के साथ उनका समाधान खोजने का प्रयास करें और यह विश्वास रखकर चलें कि यदि दिन के बाद रात का आना अनिवार्य है तो रात के बाद दिन भी जल्द ही आवेगा । अपनी सकारात्मक सोच न सिर्फ आपको विपरीत परिस्थितियों से पार पाने में मददगार होगी बल्कि मन शांत रहने से इसका सकारात्मक लाभ आपके शरीर के स्वास्थ्य और सौन्दर्य को लगातार मिलता रहेगा ।

            स्नेह और मुस्कान- हंसता मुस्कराता चेहरा न सिर्फ देखने वालों को आपकी ओर प्रसन्नतापूर्वक आकर्षित करता है बल्कि इस टानिक से हमारा चेहरा अपनी रंगत से, आंखें अपनी चमक से, गाल अपनी लालिमा से और दिल अपने बढे हुए रक्तसंचार से धडकनों के द्वारा चेहरे पर स्वाभाविक रौनक बिखेर देता है जिसका पूरा लाभ हमारे सौंदर्य के साथ ही सेहत के रुप में हमें मिलता है जो अंततः निरोगी जीवन जीने में हमारे लिये मददगार साबित होता है । स्नेह और मुस्कान बनाये रखने के लिये अपने साथी के साथ विवाद से बचना सदैव लाभदायक होता है इसलिये यहाँ ये जीवन दर्शन अपनाया जा सकता है- जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे ।  याद रखें ये तरीका सिर्फ विवादों से दूर रहने के लिये है ना कि सामने वालों के मुताबिक अपना जीवन जीने के लिये । यथासंभव प्रसन्न रहने से शरीर का स्वास्थ्य और सौंदर्य दोनों लम्बे समय तक सलामत रहते हैं ।

          अतः अपने स्वास्थ्य व सौंदर्य को सुरक्षित रखते हुए निरोगी जीवन जीने के लिये समय पर पौष्टिक भोजन करें, क्रोध, ईर्ष्या व चिंताओं के अनावश्यक प्रहार से यथासंभव बचें और हर समय प्रसन्न रहने की आदत बनाये रखने के साथ ही हंसने मुस्कराने के किसी भी अवसर को हाथ से न जाने दें ।

सोमवार, 17 जनवरी 2011

अपनी नेत्र - ज्योति बढावें !

           
            टी. वी., कम्प्यूटर और मोबाईल के बढते इस्तेमाल के कारण आजकल आंखों की रोशनी कमजोर होना आम बात हो गई है । बूढे ही क्या छोटे बच्चों को भी चश्मा लगाना पड रहा है । जन-सामान्य में धीरे-धीरे नेत्र ज्योति कमजोर होती जाती है और बिना चश्मे के ठीक से दिखाई नहीं देता । इस समस्या से छुटकारा दिलवा सकने वाला एक सरल, सस्ता और सुलभ नुस्खा जो कमाल का काम करता है यहाँ प्रस्तुत है-

          सोते समय रात को आंखों में सरसों का तेल काजल की तरह लगा लें । सुबह उठकर एक मग्गे में अपना ताजा स्वमूत्र ले लें और कुछ देर तक रखकर इसे ठण्डा हो लेने दें । अब इस स्वमूत्र को आई वाशिंग ग्लास में भरकर एक आंख इसमें लगाकर आंख खोलकर स्वमूत्र में आर-पार देखते हुए आंख की पुतली उपर नीचे, दांए बांए घुमाएं ताकि आंख स्वमूत्र से धूल सके । उसके बाद दूसरी आंख से भी यही क्रिया दोहराएं । ऐसे 5-5 बार दोनों आंखों को स्वमूत्र से धो लेना चाहिये । इसके बाद उस मग्गे का स्वमूत्र फेंक दें और ऊसमें ताजा ठण्डा पानी भरकर इस पानी में आंखें डुबाकर उपर नीचे, दांए बांए घुमाकर धो लें और सैर पर चले जाएं या अपने काम से लग जाएं । आप स्वयं अनुभव कर सकेंगे की आपकी नेत्र-ज्योति बढ रही है । इस उपाय से 4-5 दिन में धुंधला दिखाई देना भी बंद हो जाता है । जब-जब भविष्य में ऐसा लगे कि नजर धुंधली हो रही है तब-तब इस प्रयोग को आप दोहरा सकते हैं,  वैसे तो इस प्रयोग को अपनी दिनचर्या में प्रतिदिन के लिये यदि शामिल किया जा सके तो भविष्य में नेत्र ज्योति के मन्द हो सकने की शिकायत कभी सामने आ ही नहीं पाएगी ।
 
          एक और प्रयोग-  200 ग्राम बादाम पानी में शाम को गलाकर रखदें । दूसरे दिन इसे पानी से निकालकर छिलका हटाकर इसके बारीक-बारीक टुकडे करके मोटा चूर्ण करलें, फिर 100 ग्राम अखरोट की गिरी खूब बारीक काटलें  और नारियल का ताजा पीसा बूरा 100 ग्राम लेकर सबको मिलाकर एकजान करके अच्छी तरह सुखाकर बर्नी में भरकर रखदें । शाम को भोजन 8 बजे से पहले करलें । इसके 2 घंटे बाद यह मिश्रण लगभग 40-50 ग्राम मात्रा में लेकर खूब चबा चबा कर खा लें । इसके बाद पानी या दूध न पीएं सिर्फ कुल्ले करके मुंह साफ करलें । यदि दूध पीना हो तो घण्टे भर बाद या सोते समय पीएं । यह प्रयोग दो माह तक उचित दिनचर्या का पालन करते हुए करने वाले प्रयोगकर्ता का चश्मा भी छूट सकता है । 

शनिवार, 1 जनवरी 2011

नूतन वर्षाभिनन्दन...

नूतन वर्ष के इस 
सुप्रभातकारी आगमन की सुमधुर वेला में
'स्वास्थ्य-सुख' 
परिवार की ओर से अपने सभी 
पाठकों, समर्थकों, व प्रचारकों सहित 
सभी परिचित-अपरिचित साथियों को 
इस नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ....

    परम-पिता परमेश्वर से कामना है कि
     आप सहित आपके 
 परिजनों व मित्रों के जीवन में 
 नई उमंगें, व खुशियों के
     आगमन सहित उनकी सभी कामनाएँ
     आगामी 365 दिनों के 
इस कालखंड में 
 सम्पूर्णता को प्राप्त हों.

     नववर्ष मुबारक !
     सुशील बाकलीवाल.

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