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बुधवार, 15 मई 2013

केन्सर की बीमारी में शरीर सुधार के लिये...


           केन्सर एक ऐसा जानलेवा रोग है जिसका नाम भी सुन लेने मात्र से परिवार में सभी सदस्यों के चेहरों पर हवाईयां उडने लगती हैं । डाक्टर जिसे भी यह बीमारी बता दे उसके अनेकों मित्र-परिचित तो ऐसे भी होते हैं जो प्रायः उसी दिन से दुनिया में इसके शिकार मरीज की गिनती कम मानकर चलना प्रारम्भ कर देते हैं । हमारे पांच फीट के आसपास के इन्सानी शरीर में इस बीमारी के पचासों प्रकार देखने-सुनने में आते हैं और इस बीमारी के बारे में सर्वज्ञात तथ्य यह माना जाता है कि एक बार यदि इसकी सर्जरी (आपरेशन) हो जावे तो शरीर में केन्सर कोशिकाओं की वृद्धिदर लगभग चार गुना तक तेज हो जाती है, ऐसे में इसका सम्पूर्ण उपचार जिसमें कीमोथरेपी और रेडियोथरेपी को मुख्य रुप से गिना जा सकता है उनकी सायकिल को अधबीच में छोड देना खतरे से खाली नहीं होता अतः इसके उपचार को जब भी चिकित्सकीय निर्देश में प्रारम्भ किया जावे तो फिर तमाम जाँचें, सर्जरी, कीमोथैरेपी, रेडियोथैरेपी और सभी प्रकार की आवश्यक दवाईयों के पूरे क्रम को फिर चाहे उसमें दस महिने लगें या फिर पन्द्रह या बीस माह भी क्यों न लग जावें पूरा करने तक बीच में छोडने की गल्ति न करें ।

          निरन्तर बढती मँहगाई के चक्र में यह बीमारी कई बार मरीज के परिवार को दर-दर का मोहताज बनाकर सडक पर भी ला देती है । ऐसे में क्या करें जब हमारे पास इसका उपचार करवाने लायक लाखों रुपयों का इन्तजाम न हो...
   
          तब ध्यान रखें कि हल्दी का सेवन केंसर के रोगियों के जीवन को बचाने में रामबाण साबित हुआ है । ब्रिटिश वैज्ञानिकों का कहना है क़ि कीमोथरेपी से अप्रभावित कोशिकाओं पर हल्दी का अभूतपूर्व प्रभाव देखा गया है । लेचेस्टर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हल्दी में पाई जानेवाले रसायन "कर्कुमिन" के प्रभाव का अध्ययन कोलोरेक्टल केंसर के रोगी में किया था । डॉ करेन ब्रौंउन ने डेली मेल को जानकारी देते हुए कहा क़ि- कर्कुमिन केंसर क़ी उन कोशिकाओं के विरूद्ध काम करता है जो कोशिकाएं कीमोथरेपी के वावजूद बची रह जाती हैं  तथा बाद में बढ़ते हुए विकराल रूप धारण कर लेती हैं । इससे पूर्व के शोध में यह बात भी सामने आयी थी क़ी हल्दी न केवल केंसर क़ी कोशिकाओं क़ी वृद्धि को रोकती है, अपितु कीमोथेरेपी के प्रभाव को भी बढ़ा देती है । अतः-

          सब्जी बाजार में कच्ची हल्दी यदि  उपलब्ध हो तो उसकी गठान को पीसकर कपडे से निचोडकर उसका रस निकालें और दो-दो चम्मच यह रस सुबह-शाम केंसर रोगी को एक माह तक नियमित पिलाकर फिर से उनके रोग की जाँच करवा लें और लाभ दिखते रहने पर उपाय को आगे भी जारी रखें । किन्तु-

         यदि कच्ची हल्दी उस समय बाजार में उपलब्ध न हो तब ? मसाले की पीसी हल्दी को आधा-आधा चम्मच की मात्रा में दिन में तीन बार शहद में मिलाकर चटवा दें या फिर सादे पानी से उसकी फांकी निगलवाते हुए एक सप्ताह बाद यह मात्रा एक-एक चम्मच तक पहुँचाकर एक माह बाद नए सिरे से जाँच करवाकर परिणामों के प्रति आश्वस्त हो लें ।

          इसके अतिरिक्त- प्रतिदिन देशी गाय का गोमूत्र लाकर सूती कपडे (गल्ने) की आठवर्ता घडी कर उससे छान लें और आधा-आधा गिलास मात्रा में सुबह व शाम मरीज को दो माह तक नियमित रुप से पिलावें और दो माह बाद रोगी की जांच करवाकर सुधार के प्रति आश्वस्त हो लें ।

          भुक्तभोगियों की बात यदि मानी जावे तो हल्दी व गौमूत्र के नियमित सेवन से केन्सर के किसी भी प्रकार के तीसरी स्टेज तक के रोगियों का जीवन बहुत समय तक सुरक्षित रुप से बचाया जा सकता है । इसके अतिरिक्त इन्दौर शहर में देशी दवाईयों के एक जानकार चिकित्सक इस रोग को पूरी तरह से समाप्त करने के प्रयास हेतु जडी-बूटीयों से निर्मित दवाईयाँ एक नियमित कोर्स के रुप में सशुल्क उपलब्ध भी करवाते हैं । वैसी कोई आवश्यकता यदि आप महसूस करें तो मेरे ई-मेल आई डी sushil28bakliwal@gmail.com पर सम्पर्क कर प्रयास कर सकते हैं ।
 

शुक्रवार, 10 मई 2013

शराब कितनी खराब - फिर भी लोग पीते हैं क्यों ?


          हुई शाम उसका ख्याल आ गया ! जी हाँ यह ख्याल प्रतिदिन शाम होते ही प्रायः शराब के शौकीनों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है और अपने इस शौक की पूर्ति हेतु ऐसे लोग शराब की इच्छापुर्ति की जुगाड बिठाने में लग जाते हैं । यह एक ऐसा शौक है जो कुछ मुंहलगे दोस्तों की महफिल से शुरु होता है, शायरों और गीतकारों के इसकी शान में गढे-पढे गये कसीदों को सुन-सुनकर परवान चढता है और इसके नशे की किक के आनन्द को महसूस कर बढते-बढते पहले परिवार में रिश्तों की समरसता को फिर आर्थिक स्थिति को और अंत में पीने वाले की भूख-नींद व पौरुषशक्ति कम होते-होते इनके लीवर, किडनी और सम्पूर्ण स्वास्थ्य को तहस-नहस कर डाक्टरों व अस्पतालों के चक्कर लगवाना प्रारम्भ करवाकर शीघ्र ही दुनिया से पियक्कड व्यक्ति का टिकिट भी कटवा देता है ।

          यदि आप अपने ईर्द-गिर्द ध्यान दें तो फिल्म संसार सहित आप पाएंगे कि आपके कई जान-पहचान वाले चेहरे इस आदत से प्रेम रखने के कारण अपनी उम्र के 45-50 वर्ष भी पूर किये बगैर इस दुनिया से रुखसत हो लिये, बाद में उनके पत्नी व बच्चों को किन संघर्षपूर्ण स्थितियों से गुजरते हुए अपना शेष जीवन व्यतीत करना पडता है उसकी कल्पना भी ये लोग शराब से प्रेम रखने के अपने शौकिया दौर में कभी ख्याल में भी नहीं ला पाते जबकि अन्य लोगों के वे ही नजदीकी सम्बन्ध जिनके लिये दुनिया क प्रत्येक व्यक्ति अपना आर्थिक आधार बनाने व बढाने के भगीरथी प्रयास कर स्वयं को परिवार, समाज व दुनिया के सामने श्रेष्ठ सिद्ध कर जातो, ऐसे पियक्कड लोगों को इनकी शराब की नियमित लत दर-दर का भिखारी भी बना देती है । अतः यदि आपने नया-नया इसका सेवन प्रारम्भ किया ह तो कृपया इसके दूरगामी परिणामों को देखकर सतर्क हो जावें, यदि आप नियमित पीने के आदी हैं तो अपनी नियमितता को कभी-कभी के दायरे में लाते हुए इससे पूरी तरह से दूरी बनाना प्रारम्भ कर दें  और यदि आप इस नशे की गिरफ्त में इतना आगे आ चुके हैं कि इसे छोडने के बारे में सोच भी नहीं सकते तो इनके परिजन इनके खाने-पीने की वस्तुओं में कुछ ऐसे हेर-फेर करना प्रारम्भ कर दें जिससे कि ये जब भी शराब पीना चाहें इन्हें उल्टियां होने लगे और उसके स्वाद व आदत से इन्हें अरुचि भी हो जावे ।

          नियमित शराब पीने वाले और पियक्कडों की श्रेणी में गिने जाने वाले व्यक्तियों के परिजनों को यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि इसे सिर्फ शारीरिक लत ही नहीं बल्कि एक किस्म की मानसिक बाध्यता समझते हुए वे जब-तब उनकी इस आदत को व्यंग का निशाना न बनाएँ बल्कि पूरे स्नेह व धैर्य से रोगी व्यक्ति का शराब छोडने के प्रति मनोबल बनाने का प्रयास भी करें ।



उपचार - उन व्यक्तियों के लिये जो शराब छोडना चाहते हों-
 
         1.   सेवफल के रस को बार-बार पीने से व भोजन के साथ सेवफल का अधिक सेवन करने से शराब की आदत छूट सकती है । उबले हुए सेवफल को यदि दिन भर में 3-4 बार सेवन किया जावे तो कुछ ही दिनों में शराबियों की शराब पीने की आदत छूटने के साथ ही प्रत्येक नशीली वस्तु से घृणा उत्पन्न हो जाती है ।


          2.   नई देशी अजवायन 500 ग्राम लेकर उसे अधकूट करलें व किसी मिट्टी, शीशे या कलई के बर्तन में उसे 8 किलो पानी में डालकर दिन भर गलने दें । रात को अजवायन मिश्रित उस पानी को आग पर चढाकर धीमी आंच पर काढा बनने तक (एक चौथाई मात्रा में जल बचने तक) पकाएँ व रख दें दूसरे दिन उस काढे को मसलकर व छानकर किसी बोतल में भर लें । फिर जब भी शराब पीने की इच्छा हो तो पहले इस अजवायन के काढे को चाय की चार चम्मच के बराबर मात्रा में शराब की ही तरह पी लें बाद में शराब पीने का प्रयास करें । इस प्रयोग से तीन-चार सप्ताह में शराब पीने की आदत छूट सकती है ।


होमियोपैथी उपचार-
 
          पहले दिन- रात को सोते समय साफ ठन्डे पानी से कुल्ले करके नक्सवामिका 200 शक्ति की 12 गोलियां हाथ लगाये बगैर कागज पर डालकर सीधे मुँह में डालकर चूस लें । एकाध गोली कम-ज्यादा होने से कोई फर्क नहीं पडेगा । गोली लेने के आधे घंटे पहले और आधे घंटे बाद तक अन्य कुछ भी खाना-पीना न करें । होमियोपैथी की सभी दवाईयों के प्रयोग में यह नियम अनिवार्य रुप से पालन करने योग्य है इसका ध्यान रखें ।


          दूसरे दिन- सुबह उठकर खाली पेट सिर्फ पानी से कुल्ले करके मुंह साफ करलें और सल्फर 200 शक्ति की 12 गोलियां  पूर्वोक्त विधि द्वारा मुंह में रखकर चूस लें, पेस्ट व मंजन भी आधा घन्टे बाद ही करें । फिर दिन भर कोई दवा नहीं लेनी है ।


          तीसरे दिन- एसिड सल्फ मदर टिंचर की 5-7 बूंद एक गिलास ठंडे पानी में अच्छे से घोलकर सुबह-सुबह पी लें फिर इसी तरह दूसरी खुराक दोपहर में 2-3 बजे के आसपास और तीसरी खुराक रात्रि में 8-9 बजे तक पी लें । इसी दिन रात को सोते समय नक्सवामिका 200 शक्ति की 12 गोली  कागज पर डालकर सीधे मुंह में रखकर चूस लें, फिर दिन में तीन बार एसिड सल्फ की 5-6 बूंदें और रात को सोते समय नक्सवामिका 200 शक्ति की 12 गोलियों का यह प्रयोग चौथे, पांचवें, छठे और सातवें दिन भी जारी रखें ।


          आठवें दिन- सुबह उठकर सल्फर 200 शक्ति की 12 गोली चूस लें फिर उस दिन दिन भर दूसरी कोई दवा न लें और इस समूचे दवा के क्रम को (पहले दिन रात को सोते समय साफ ठन्डे पानी से कुल्ले करके नक्सवामिका 200 शक्ति की 12 गोलियां,  दूसरे दिन- सुबह उठकर खाली पेट सिर्फ पानी से कुल्ले करके मुंह साफ करलें और सल्फर 200 शक्ति की 12 गोलियां पूर्वोक्त विधि द्वारा मुंह में रखकर चूसना, तीसरे दिन से सातवें दिन तक दिन में तीन बार एसिड सल्फ की 5-6 बूंदें और रात को सोते समय नक्सवामिका 200 शक्ति की 12 गोलियों का नियमित प्रयोग और आठवें दिन- सुबह उठकर सल्फर 200 शक्ति की 12 गोली चूस लें फिर उस दिन दिन भर दूसरी कोई दवा न लें, 29 दिन तक उपचारक्रम की इसी सायकिल को नियमित रखें तो किसी भी शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति की शराब हमेशा के लिये छूट जावेगी ।
 
          यदि शराब के सेवन के प्रभाव से शराबी व्यक्ति के पेट में पीडा या बैचेनी हो तो सल्फर 200 शक्ति वाले दिन को छोडकर शेष दिनों में अन्य दवाएं लेते हुए एक घंटे का अंतर रखते हुए फास्फोरस 30 शक्ति की 12 गोली सुबह और 12 गोली शाम को मुंह में डालकर चूस लें व समस्या खत्म होने पर सेवन करना बन्द करदें । यदि शराबी व्यक्ति को कमजोरी का अनुभव होता हो तो एसिडफास मदरटिंचर की 5-6 बूंद आधा कप पानी में डालकर सुबह-शाम भोजन करने के आधा घंटे बाद पी लें, इससे हाथ-पैरों का दर्द, शारीरिक व मानसिक दुर्बलता, चिडचिडापन दूर हो सकेंगे । यदि शराबी को नींद न आती हो तो अवेना सटाईना मदर टिंचर की 15 बूंद आधा कप पानी में घोलकर सुबह-शाम लें लाभ होने पर दवा बन्द कर दें । 


          इन उपायों को करने के बाद भी यदि व्यक्ति शराब पीना न छोडे तो उसे शराब पीते ही उल्टियां होने लगेंगी । अन्य कोई साईड इफेक्ट या नुकसान इससे नहीं होंगे । किसी-किसीको पतले दस्त लग सकते हैं और किसी के मुंह में छाले भी हो सकते हैं, यदि ऐसा हो भी तो इन दोनों समस्याओं का अलग से कोई उपचार करने की आवश्यकता नहीं है ये समस्या खुद-ब-खुद ठीक हो जाएंगी ।


                                          (समस्त होमियोपैथी उपचार डा. श्रीमती साधना चौधरी - भोपाल द्वारा साभार.)

  
उन व्यक्तियों के लिये जो शराब छोडने को तैयार न हों-
 
          ऐसे व्यक्तियों के परिजन कृपया ई-मेल आई डी sushil28bakliwal@gmail.com पर सम्पर्क कर इस समस्या के समाधान का प्रयास कर सकते हैं ।

   

रविवार, 5 मई 2013

गाय के घी (गौघृत) के गुणकारी प्रयोग...


          गाय के घी को अमृत कहा गया है जो जवानी को कायम रखते हुए बुढ़ापे को दूर रखता है । ऐसी मान्यता है कि काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है । देशी गाय के घी को रसायन कहा गया है जो तरुणाई को कायम रखते हुए, वृद्धावस्था को दूर रखता है। गाय के घी में पाए जाने वाले स्वर्ण-छार में अदभुत औषधिय गुण होते हैं जो गाय के घी के लावा अन्य किसी घी में नहीं मिलते । गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रींस मौजूद होते हैं जिनमें कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की अद्भुत क्षमता होती है।

          धार्मिक नजरिये से देखने पर भी यदि गाय के 100 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ) किया जावे तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजे ऑक्सीजन का उत्पादन होता है । यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने तथा धार्मिक समारोहों में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है । इसमें वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की पर्याप्त क्षमता होती है।

गाय के घी के औषधीय प्रयोग :–


          दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ठीक होता है । गाय क घी को इसी प्रकार नाक में डालने से एलर्जी  खत्म  होती है, लकवे के रोग का उपचार होता है, कान  का पर्दा ठीक हो जाता है,  नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है, कोमा के  रोगी की चेतना वापस लटने लगती है, बाल झडना समाप्त होकर नए बाल आने लगते है, मानसिक शांति मिलती है और याददाश्त तेज होती है ।

          हाथ पांव मे जलन होने पर गाय के घी की पैरों के तलवो में मालिश करने से जलन दूर होती है । ऐसे ही सिर दर्द के साथ यदि शरीर में गर्मी लगती हो तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करने से सर दर्द ठीक होकर शरीर में शीतलता महसूस होती है ।

          फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।

        गाय के घी की छाती पर मालिश करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे मदद मिलती है ।

          सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलाकर उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।

         अधिक कमजोरी की शिकायत लगने पर एक गिलास गाय के दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पीने से शारीरिक कमजोरी दूर होती है ।

          हार्ट अटैक की तकलीफ वालों को चिकना खाने की मनाही हो तो भी गाय का घी खाएं इससे ह्रदय मज़बूत होता है । यहाँ यह भी स्मरण रखें कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता, वजन संतुलित होता है यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है और मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।

          20-25 ग्राम घी मिश्री के साथ खिलाने से शराब, भांग व गांजे का नशा कम हो जाता है।

          गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है ।

          हिचकी के न रुकने पर गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी रुक जाएगी ।

          गाय के घी के नियमित सेवन से बल-वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में इजाफा होता है ।

          देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है । यह इस बीमारी के फैलने को आश्चर्यजनक गति से रोकता है और इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है ।

          संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पीने से थकान खत्म व शरीर तरोताजा हो जाता है ।

          रात को सोते समय एक गिलास मीठे दूध में एक चम्मच घी डालकर पीने से शरीर की खुश्की और दुर्बलता दूर होती है, नींद गहरी आती है, हड्डी बलवान होती है और सुबह शौच साफ आता है । शीतकाल के दिनों में यह प्रयोग करने से शरीर में बलवीर्य बढ़ता है और दुबलापन दूर होता है।

          एक चम्मच गाय के शुद्ध घी में एक चम्मच  बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती  है ।

           उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए । यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार नाक में प्रयोग करने पर यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।

          गाय के घी को ठन्डे जल में फेंटकर घी को पानी से अलग कर लें, यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करें और फिर इस घी में थोड़ा सा कपूर मिला दें । इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असरकारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं । यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है ।

          गाय के घी में छिलके सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें । प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों को प्रदर रोग में आराम होता है । पुरुषों को इसका प्रयोग सुडौल और बलवान बनता है।

          विशेष -  यदि स्वस्थ व्यक्ति भी हर रोज नियमित रूप से सोने से पहले दोनों नाशिकाओं में हल्का गर्म (गुनगुना) देसी गाय का घी डालकर सोने की आदत बनाले तो इससे नींद गहरी आएगी, खराटे बंद होंगे, यादास्त तेज होगी और अन्य अनेकों  बीमारियों से शरीर का बचाव होता रह सकेगा । इसके लिए बिस्तर पर लेट कर दो दो बूंद घी दोनों नाकों में डाल कर पांच मिनट तक सीधे लेटे रहिये घी को जोर लगा कर न खीचें यह क्रिया अधिक प्रभावशाली होती है । सामान्य व्यक्ति रात को सोते वक्त तथा रोगी दिन में तीन बार देसी गाय का घी नाक में डाल सकते है ।

     

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