This is default featured slide 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

रविवार, 22 मई 2011

हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) से बचाव.


          आप यह जानकर आश्चर्य कर सकते हैं कि आयुर्वेद के पुराने ग्रंथों में ब्लड-प्रेशर से सम्बन्धित उच्च रक्तचाप या निम्न रक्तचाप जैसी बीमारियों का उल्लेख प्रायः देखने को नहीं मिलता, याने प्राचीन काल में ये रोग या तो अस्तित्व में ही नहीं होता था या फिर इतने न्यून पैमाने पर होता होगा कि इसके बारे में अलग से जानकारियां खोजने की आवश्यकता ही नहीं पडती थी । जबकि वर्तमान समय में अधिकांश लोगों का जीवन चिन्ता और तनाव के ऐसे अनवरत चक्र की गिरफ्त में चल रहा है जिसका परिणाम हैं निरन्तर बढ रहे ब्लड-प्रेशर के रोगी, जिन्हें चिकित्सक की सलाह के मुताबिक बचाव की गोलियां प्रतिदिन खाना पड रही हैं और सामान्य धारणा के मुताबिक एक बार ये गोली खाना चालू करने के बाद इन्हें जीते जी बन्द कर पाना लगभग मुमकिन नहीं माना जाता, और इनके भी साईड इफेक्ट शरीर को निरन्तर झेलना ही पडते हैं । आखिर ये ब्लड-प्रेशर की समस्या क्या है और इससे कैसे दूर रहा जा सकता है । इसे समझने की कोशिश करें-

उच्च रक्तचाप क्या है
          हमारे शरीर की धमनियों में जो रक्त दौडता रहता है उसे गति मिलती है हमारे ह्रदय से जो दिन रात कार्य करते हुए इस रक्त को पम्प कर शुद्ध करता व रक्त पर दबाव डालकर धमनियों तक भेजता है । यहाँ तक की शारीरिक कार्यप्रणाली सामान्य अवस्था है लेकिन जब हमारे गलत आहार-विहार से इस प्रणाली में बाधा पहुँचती है तो या तो रक्तचाप कम हो जाता है जिसे हम लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) के नाम से जानते हैं या फिर बढ जाता है जिसे हम हाई ब्लडप्रेशर (उच्च रक्तचाप) के नाम से जानते हैं । सामान्य अवस्था में शिशु का रक्तचाप 80/50, युवकों का 120/70 और प्रौढों का 140/90 होता है । यह ब्लडप्रेशर पत्येक व्यक्ति के शरीर में श्रमकार्य करने पर, भागदौड करने पर या सोते समय अपने सीमित दायरे में घटता बढता रहता है लेकिन असामान्य घटबढ में यही उतार चढाव एक घातक रोग के रुप में हमारे शरीर में स्थान बना लेता है ।

          इस रक्तचाप के असामान्य रुप से कम-ज्यादा होकर रोग की अवस्था में पहुँचने के कुछ कारण तो शारीरिक होते हैं और कुछ मानसिक-
           शारीरिक कारण- रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढना, धमनियों का सख्त और संकुचित होना, मोटापा बढना, पैतृक प्रभाव होना, आयु बढने पर प्रौढ या वृद्धावस्था के प्रभाव से शरीर में विकार और निर्बलता आना, गुर्दे, जिगर और अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों में खराबी होना आदि कारण मुख्य रुप से कहे जा सकते हैं । इसके अतिरिक्त अपने आहार में ऐसे पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करना जो रक्त में कोलेस्ट्राल, शरीर में चर्बी (मोटापा), और मनोवृत्ति में उत्तेजना व तामसिक और राजसिक प्रवृत्ति उत्पन्न करते हों ब्लड-प्रेशर बढने के कारण बनते हैं । ऐसे आहार में माँस, अण्डे, शराब, नशीले पदार्थ, तम्बाकू, धूम्रपान, तेज मिर्च मसालेदार व तले हुए पदार्थों के अलावा अधिक प्रोटीन व फेट (वसा) वाले पदार्थों का सेवन शामिल है और वर्तमान जीवनशैली में ऐसे ही खान-पान का प्रयोग अधिकांशतः चल रहा है । 

          मानसिक कारण- मानव मन स्वभावतः संवेदनशील होता है और जो लोग भावुक प्रवृत्ति के होते हैं उनकी संवेदनशीलता और अधिक बढे हुए परिमाण में रहने के कारण किसी भी प्रकार की चिन्ता, दुःख, क्रोध, ईर्ष्या अथवा भय का आघात लगने पर दिल की धडकन अनायास ही तीव्र गति से बढ जाती है और स्नायविक संस्थान तनाव से भर जाता है जो मुख्य रुप से उच्च रक्तचाप में परिवर्तित होता रहता है । इसीलिये इन दुष्प्रवृत्तियों से बचने की सलाह अक्सर हमारे दैनंदिनी के जीवन में सामने आती रहती है । किन्तु वर्तमान जीवनस्तर में भौतिकतावादी ऐश्वर्यपूर्ण रहन-सहन की आवश्यकता से उपजी दिन भर की भागदौड से शरीर की थकान के साथ ही नाना प्रकार के सोच विचार, तिकडमबाजी, और दूसरे के अधिकारों को येन केन कब्जे में लेने जैसी जोड-तोड में लगे रहने से उपजे तनाव में हमारा दिमाग भी कमजोर होता चला जाता है जिसका परिणाम अन्ततः इस रोग के रुप में हमारे शरीर के सामने आता है ।

          महिलाओं के मामले में कुछ कारण और भी जुड जाते हैं जैसे परिवार नियोजन अथवा मासिक ऋतुस्त्राव को  नियंत्रित, नियमित और सन्तुलित करने के लिये खाई जाने वाली ऐलोपेथिक गोलियां का लम्बे समय तक सेवन करना जिनमें से कुछ ब्लड प्रेशर को बढावा देती हैं । खान-पान की आदतों से स्थूल शरीर का हो जाना और कई महिलाओं का पारिवारिक जीवन जिसमें वे मानसिक चिन्ता, पीडा और घुटन भरी जिन्दगी जीने पर स्वयं को विवश महसूस करती हों ये सभी कारण अंततः इस रोग में वृद्धि करते हैं ।

          उच्च रक्तचाप की स्थिति अचानक नहीं बनती बल्कि धीरे-धीरे और लम्बे समय में बनती है जिसका हमें वर्षों तक पता भी नहीं चल पाता । कुछ शारीरिक और मानसिक लक्षण शरीर की ओर से हमें मिलते भी हैं तो हम प्रायः उसका कारण कुछ और ही समझा करते हैं जैसे कब्जियत, सिरदर्द, सिर में भारीपन व तनाव, चक्कर आना, जल्दी थक जाना, ह्रदय की धडकन बढना, कभी-कभी सांस लेने में कष्ट होना, स्वभाव में चिडचिडापन, अनिद्रा और तबियत में बैचेनी आदि लक्षण हमें उच्च रक्तचाप का संकेत ही देते हैं किन्तु प्रायः हम इनके दूसरे ही कारण समझा करते हैं । 

          बचाव- सबसे पहले तो शारीरिक कारणों में गरिष्ठ व तामसी भोजन की बजाय सादा सुपाच्य आहार लें, पाचन शक्ति ठीक रखें, ऐसे खाद्य पदार्थों का अति सेवन न करें जो शरीर में मोटापा और रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढाते हों । श्रमकार्य करें या व्यायाम व योगासनों का नियमित अभ्यास करें । मानसिक कारण जो इस रोग की ओर ले जाते हैं उनसे जितना संभव हो बचे रहने का प्रयास करें । चिन्ता करने की बजाय किसी भी समस्या से बाहर निकलने के लिये चिन्तन करें । क्रोध, ईर्ष्या, शोक व अन्य अनावश्यक मानसिक वेगों से स्वयं को दूर रखने का प्रयास करें ।

          उच्च रक्तचाप की स्थिति में शरीर में उदरस्थ वायु दूषित हो जाती है जिसे हम प्रायः गैस ट्रबल का नाम देते हैं । यही दूषित वायु प्रचंड रुप में कुपित होकर पित्त को विकृत कर देती है और पित्त विकृति ही अम्लपित्त याने हाइपरएसिडिटी के रुप में परिणीत होकर अपान वायु के साथ मिलकर पूरे शरीर में फैलती हुई पाचन तंत्र को बिगाड देती है । इससे शरीर का समग्र रक्त गाढा होकर शरीर की बाह्यान्तरिक सभी शिराओं (नसों) में कठोरता आ जाती है फलतः नियमित रक्त संचार में बाधा आती है जिसे हम उच्च रक्तचाप के रुप में जानते हैं । यही रक्तचाप जब बहुत अधिक बढ जावे तो शरीर पर पक्षाघात, लकवा या फालिज रोग का आक्रमण होता है । उच्च रक्तचाप में नींद नहीं आती, कभी-कभी दिल में (सीने में बांयी ओर) दर्द होता है । इस रोग का प्रारम्भिक लक्षण गैस ट्रबल ही है जिससे बवासीर, गठिया, श्वास-दमा जैसे जटिल रोगों के साथ ही शरीरांगों पर सूजन आना भी सम्भव है । 

          उच्च रक्तचाप (हाईपरटेंशन) का मरीज थोडी सी लापरवाही से ही घातक ह्रदय रोग, पक्षाघात या मस्तिष्क की रगें एकाएक फटने से मृत्यु का ग्रास बन सकता है अतः उच्च रक्तचाप होते ही मरीजों को अत्यन्त सावधान होकर सपथ्य चिकित्सा कारगर तरीके से करवानी चाहिये । 
  
          चिकित्सा- सर्वप्रथम गैस ट्रबल को नष्ट करने के लिये अदरक का लगभग 6 माह पुराना मुरब्बा दोनों समय के भोजन के बाद 5 ग्राम की मात्रा में खाकर 10 ग्राम बडी सौंफ को दो कप पानी में उबालकर एक कप पानी बच रहने पर ठंडा करके सौंफ को मसलकर उस पानी को छानकर पी लें । कब्ज यदि हो तो उसके उपचार हेतु दाडीमाष्टक चूर्ण रात्रि को सोने से पहले एक चम्मच फांककर थोडा सा पानी पी लें । ये क्रम 15 दिन से एक माह तक नियमपूर्वक  बनाएँ रखें जिससे आप गैस ट्रबल से पूरी तरह से छुटकारा पा सकते हैं । 
  
          इसके साथ उच्च रक्तचाप की चिकित्सा हेतु रौप्य भस्म, त्रिवंग भस्म, मणिष्य पिष्टी, सर्पगंधा का कपडछन चूर्ण (सभी 15-15 ग्राम), स्वर्णमाक्षिक भस्म, चन्द्रकलारस, सत्वगिलोय, अकीक पिष्टी, मुक्ता शुक्ति पिष्टी, प्रवाल चन्द्रपुष्टी, जटामांसी या बालछड का चूर्ण (सभी 30-30 ग्राम) मात्रा में लेकर इन सबको पक्के खरल में तीन घण्टे घोटकर किसी साफ शीशी में रख दें । दवा तैयार है । प्रातः शौचादि से निपटकर निराहार मुंह, और शाम 5 बजे के आसपास यह दवा आधा-आधा ग्राम की मात्रा में लेकर एक-एक चम्मच उत्तम दाडिमावलेह में मिलाकर चाट लें । इस दवा के नियमबद्ध तरीके से विश्वासपूर्वक सेवन करने व उपयुक्त परहेज का पालन करके सैकडों मरीज स्थायी लाभ प्राप्त कर सुखी जीवन जी रहे हैं । कोई भी जरुरतमंद रोगी आयुर्वेदिक दवा की दुकानों से इन दवाईयों को प्राप्त कर स्वयं को रोगमुक्त कर सकते हैं ।

           पक्षाघात (लकवा) के रोगी उच्च रक्तचाप से पीडित होते ही हैं, अतः ऐसे रोगी पहले हाई ब्लड प्रेशर नाशक उक्त दवा का नियमित सेवन करें तो धीरे-धीरे पक्षाघात भी नष्ट हो जाएगा । उच्च रक्तचाप के रोगियों को प्रायः गैस ट्रबल, कब्ज व अम्लपित्त (एसीडिटी) रहता ही है जिसके उपचार का तरीका अदरक के पुराने मुरब्बे और बडी सौंफ के अर्क के प्रयोग के रुप में उपर दिया जा चुका है इसके प्रयोग से पुराने से पुराना गैस्टिक (वायु विकार व अफारा) अवश्य ही नष्ट हो जाता है । रक्तचाप का जन्म कब्ज से और पक्षाघात रक्तचाप से ही होता है । उपरोक्त वर्णित अदरक का मुरब्बा, सौंफ अर्क और दाडिमाष्टक चूर्ण तीनों के नियमित सेवन से शरीर के भीतर के घटकों का शुद्धिकरण हो जाता है जिससे अन्य दवाएँ भी शीघ्रतापूर्वक गुणकारी असर करती हैं । कब्ज, अम्लपित्त और गैस्टिक के रहते हाई ब्लड प्रेशर और पक्षाघात (लकवा) का नष्ट हो पाना असम्भव है । अतः हमने इन सब व्याधियों की चिकित्सा एक साथ ही करने का निर्देश किया है । ब्लडप्रेशर में कोई भी तीव्र रेचन (जुलाब) हर्गिज न लें । उपरोक्त दाडिमाष्टक चूर्ण ही इसके लिये पर्याप्त है ।


व्यापक जनहित में प्रसारित-
सौजन्य  - वैद्य  ठा. बनवीर सिंह 'चातक' (आयुर्वेद रत्न)
    
     हमारे खाद्यान्न में तले हुए व्यंजन, मिठाईयां, निरन्तर चलन में बढते फास्ट-फूड, शराब-सिगरेट, तम्बाकू के सेवन के साथ ही वायुमंडल में व्याप्त घातक जहरीले रसायनों के कारण हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में ठोस चिकनाई व कोलेस्ट्रॉल की मात्रा सामान्यतः बढती जाती है, जो रक्त परिभ्रमण की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया के द्वारा ह्दय तक जाकर फिल्टर नहीं हो पाती और धीरे-धीरे वहाँ जमा होते रहकर उन्हें संकरा करते हुए दिल की सामान्य धडकनों को अनियमित करना प्रारम्भ कर देती है जिसके कारण हम सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी, चक्कर आना, तेज पसीना, बैचेनी व पेट से उपर के भाग में कहीं भी और प्रायः सीने या छाती में बांयी ओर दर्द का अहसास करते हैं और यही स्थिति निरन्तर बढते क्रम में होते रहने के बाद आगे जीवित रहने के लिये डॉक्टर बेहद खर्चीली एंजियोप्लास्टी और कभी-कभी जीवन के लिये खतरनाक बाय-पास सर्जरी का अंतिम विकल्प हमारे अथवा हमारे परिजनों के समक्ष रखते हैं जिसका दुष्परिणाम पूरे परिवार के लिये कभी-कभी जिंदगी भर की संचित बचत को उपचार में खर्च कर देने, बडा कर्ज लेने और किस्मत यदि खराब हो तो इसके बाद भी हमारे प्रिय परिजन को सदा-सर्वदा के लिये खो देने के रुप में हमारे सामने आता है ।
    इस स्थिति से बचाव के लिये समय रहते क्या कुछ किया जा सकता है ?  निःसंदेह हाँ... 
    अलसी के गुणों से हम अपरिचित नहीं हैं । मानव शरीर के लिये इसका तेल और भी अधिक गुणों का भंडार स्वयं में संजोकर रखता है किंतु उसमें भी घानी की अशुद्धियां, वसा की मौजूदगी और वातावरण के अच्छे-बुरे कारकों का प्रभाव मौजूद रहता ही है । इन अशुद्धियों को दूर करते हुए शरीर के लिये उच्चतम परिष्कृत पद्दतियों से निर्मित 'फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल' जिसमें ओमेगा 6, ओमेगा 9, अनिवार्य फेटी एसिड, फाईबर, प्रोटीन, जिंक, मेग्निशीयन, विटामिन व 60% तक शुद्ध ओमेगा 3 मौजूद रहता है । ये सभी मित्र घटक हमारे शरीर की रक्त नलिकाओं में मौजूद सभी प्रकार की अशुद्धियों की सफाई करने का कार्य अत्यंत सुचारु रुप से करने में सक्षम होते हैं ।
    यदि हम स्वयं इसका परीक्षण करके देखें तो थर्मोकोल (जो कभी में नष्ट नहीं होता व यदि इसे जलाया भी जावे तो और भी घातक रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा वायुमंडल में व्याप्त होकर हमारे शरीर के लिये अधिक नुकसानदायक साबित होता है) इसकी किसी भी शीट का एक चने के बराबर छोटा टुकडा लेकर व इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल के एक केप्सूल को सुई की नोक से पंचर करके इसमें मौजूद उच्चतम गुणवत्ता के तेल को अपनी हथेली अथवा किसी प्लेट में निकालकर उसमें फाईबर के इस छोटे से टुकडे को डाल दें तो हम देखेंगे कि बमुश्किल 4-5 मिनिट में उस केप्सूल में मौजूद शुद्ध परिष्कृत जेल तेल में वह फाईबर का टुकडा गायब हो जाता है । 


      जब इसी फ्लेक्स ऑईल केप्सूल को हम नियमित रुप से अपने आहार में शामिल कर लेते हैं तो इसी प्रकार इसके शक्तिशाली घटक हमारे शरीर की रक्त-नलिकाओं में जमा सारा बे़ड कोलेस्ट्राल व अन्य अशुद्धियों को साफ करते हुए उन अवशिष्ट पदार्थों को मल-मूत्र के माध्यम से आसानी से शरीर से बाहर निकाल देते है और हम इन्हीं खान-पान व वातावरण में निरोगावस्था में अपना सामान्य जीवन जीते रह सकते हैं ।
        यदि उपरोक्त समस्याओं से ग्रस्त कोई व्यक्ति इस फ्लेक्स ऑईल जेल केप्सूल को 2 या 3 केप्सूल आवश्यकतानुसार प्रतिदिन चार माह (120 दिन) तक नियमित रुप से ले तो जहाँ वह अपनी शारीरिक समस्याओं से मुक्त हो सकता है वहीं यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति 2 केप्सूल प्रतिदिन 2 से 3 माह (60 से 90 दिन) लगातार ले तो वह अगले एक वर्ष तक रक्त नलिकाओं की किसी भी समस्या से स्वयं को मुक्त रख सकता है ।
            90 केप्सूल का 515/- रु. मूल्य का यह केप्सूल पैक यदि आपके क्षेत्र में उपलब्ध हो तो आप इन्हें अपने आसपास से खरीदकर अपने दैनिक आहार में शामिल कर आपके अमूल्य ह्दय की न सिर्फ आज बल्कि आने वाले लम्बे समय तक सुरक्षा बनाये रख सकते हैं और यदि यह आपके क्षेत्र में उपलब्ध न हो पावे तो मात्र 65/- रु. पेकिंग व कोरियर खर्च अतिरिक्त रुप से वहन करते हुए 580/- रु. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की 'इन्दौर साधना नगर ब्रांच' का उल्लेख करते हुए सेविंग A/c No. 53014770506 में सुशील कुमार बाकलीवाल के नाम से जमा करवाकर व मोबाईल नंबर +91 91799 10646 पर हमें Call अथवा WhatsApp मेसेज द्वारा अपना नाम व पूरा पता भेजते हुए घर बैठे प्राप्त कर अपने व अपने परिजनों के लिये इसका लाभ आवश्यक रुप से ले सकते हैं ।
    अनुरोध- यदि आपके क्षेत्र में ये केप्सूल उपलब्ध हों तब भी आप इन्हें खरीदने से पूर्व यदि इसके उपलब्धि स्थल की प्रमाणित जानकारी हमें भेजेंगे तो हम आपको यह भी बता पावेंगे कि उस स्थिति में आप इस पर 5%  से 10% तक अतिरिक्त बचत कैसे कर सकते हैं ।

शनिवार, 14 मई 2011

एक गम्भीर मानसिक समस्या - डिप्रेशन (अवसाद)

          इसी ब्लाग की पिछली पोस्ट एक चमत्कारिक पुष्प औषधि - रेस्क्यू रेमेडी की टिप्पणियों में सुश्री Roshi ji का एक प्रश्न डिप्रेशन के संदर्भ में-
 
     mujko bhi thora dipression rehta hai med ki poori jankari de

          हममें से अधिकांश व्यक्तियों का वास्ता अपने घर-परिवार से लगाकर अपने नाते रिश्तेदारों व अपने परिचितों के दायरे में किसी न किसी डिप्रेशन के रोगी को देखने या उसके बारे में सुनने-जानने का अवश्य रहा होगा । इसे हम ऐसी मानसिक बीमारी भी कह सकते हैं जिसके लिये कहा जा सके कि- देखन में छोटी लगे, घाव करे गंभीर. 
 
        मेरी भतीजी जो अपनी स्वभावगत जिन्दादिली से उपजी हँसी-खुशी से अपने सम्पर्क में आने वाले हर शख्स को चिन्तामुक्त व प्रसन्न कर देती थी उसे भी इस डिप्रेशन (अवसाद) के रोग की चपेट में आकर दुनिया से रुखसत होते मैंने देखा है । वैसे तो किसी भी समस्या को शरीर में जन्म ले सकने के अनेकों कारण हो सकते हैं किन्तु प्रायः इस रोग की शुरुआत हम रोगी की उस मानसिक स्थिति से जोडकर देख सकते हैं जहाँ दुनियावी व्यवहार में व्यक्ति को लगातार ये लगता रहे कि मेरे साथ न्याय नहीं हो रहा है और यह भावना जैसे-जैसे गहरी होती जाती है वैसे-वैसे रोग का मानसिक व शारीरिक वेग भी बढता जाता है । कुछ महिलाओं में प्रसव के बाद भी अवसाद की यह समस्या देखने में आती है ।

          इसके रोगियों को सबसे पहले तो मानसिक रुप से हँसमुख व चिन्तामुक्त रहने की अनिवार्य कोशिश करना चाहिये जिसमें योग व प्राणायाम इनके सिये सर्वाधिक मददगार साबित होते है । जब भी फुरसत में या एकान्त में रहें तब अपने मन-मस्तिष्क को निरर्थक व अनावश्यक विचारों से बचाने के लिये अपने मनपसन्द संगीत को सुनना प्रारम्भ कर देने की आदत अनिवार्य रुप से बनालें यह आपके लिये पूरी तरह से मददगार साबित होगी और इनके अलावा- 
 
          अपने किसी भी प्रियजन से अपने मन की उहापोह के बारे में खुलकर चर्चा
अवश्य करें । अपने आप में अन्दर ही अन्दर घुटते न रहें ।
 
      
*   15-20 ग्राम गुलाब की पत्तियों को 250 मि. ली. उबलते पानी में डालकर गुलाब आसव के रुप में शक्कर व इलायची मिलाकर चाय-काफी की जगह इस पेय का उपयोग करें । सामान्य चाय बनाते वक्त भी इलायची को पीसकर चाय में मिलाकर अवश्य पीयें । अवसाद की स्थिति में इलायची का प्रयोग दवाई का काम करता है ।

   *   अवसाद और नाडी तंत्रिका की कमजोरी को दूर करने में काजू भी अत्यन्त उपयोगी होते हैं । यह विटामिन बी काम्प्लेक्स विशेषकर थायमिन से भरपूर होते हैं । काजू से राइबोफ्लेविन भी मिलता है जिससे उर्जा बनी रहती है और हम सक्रिय व प्रसन्न बने रह सकते हैं ।

     *     इसके अतिरिक्त अवसाद से उबरने के लिये सेवफल का सेवन अत्यन्त उपयोगी साबित होता है । इसमें विटामिन-बी, पोटेशियम और फास्फोरस जैसे कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो 'ग्लुटामिक एसिड' के बनने में सहायक होते हैं । ग्लुटामिक एसिड तंत्रिका कोशिकाओं में होने वाली क्षति को नियंत्रित करता है । सेवफल का प्रयोग एक गिलास कुनकुने दूध में 2 चम्मच शहद मिलाकर उसके साथ करने पर अधिक शीघ्रता से सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं ।
 
          यदि आपके परिवार में कोई भी सदस्य कभी इस रोग की गिरफ्त में आता दिखे तो अविलम्ब उस पर विशेष ध्यान दें । हरसंभव प्रयास के द्वारा उसका मन बहलाए और रोग को उस सीमा तक बने जहाँ तक न बढने दें जहाँ आधुनिक एलोपेथिक उपचार आवश्यक हो जावे, क्योंकि इस रोग में डाक्टरी उपचार में प्रयुक्त होने वाली एलोपैथिक दवाइयां बहुत अधिक साईड इफेक्ट भी पैदा करती हैं जो इससे प्रभावित रोगी के हित में नहीं होती ।

सोमवार, 9 मई 2011

एक चमत्कारिक पुष्प औषधि - रेस्क्यू रेमेडी.


          चिकित्सा  के  क्षेत्र  में  जो  विभिन्न  पद्धतियां प्रचलित  हैं  उनमें  एक  नाम  'बेच प्लावर रेमेडीज' का  भी मौजूद है । इस चिकित्सा पद्धति के आविष्कारक रहे हैं  डा. एडवर्ड बेच जो लन्दन में प्रमुख एलोपैथिक डाक्टर थे । इस चिकित्सा पद्धति से असन्तुष्ट होने से उन्होंने होम्योपैथिक डिग्री प्राप्त की और हो्म्योपैथिक पद्धति से चिकित्सा कार्य करना शुरु किया । लेकिन शीघ्र ही वे होम्योपैथिक पद्धति से भी असन्तोष का अनुभव करने लगे और किसी और भी सरल लेकिन सफल चिकित्सा पद्धति की खोज में लग गये । प्रकृति का अध्ययन करते हुए उनका ध्यान फूलों की तरफ गया । उन्होंने विचार किया कि स्वभावतः मनुष्य का मन फूलों की तरह कोमल होता है और मूलतः मनुष्य का अन्तर्मन सौम्य, सरल और भावुक होता है । इसका यह प्राकृतिक रुप मन के जिन छः शत्रुओं से बनता या बिगडता है उनके नाम हैं काम, क्रोध, मद्, लोभ, मोह और मत्सर इन्हीं विकारों के प्रभाव से मनुष्य अपना प्राकृतिक स्वरुप याने स्वाभाविक अवस्था खो देता है । स्वाभाविक अवस्था का होना स्वास्थ्य है और इसे खो देना अस्वास्थ्य है, रोग है । मनुष्य की स्वाभाविक अवस्था फूलों के समान है और यदि यह अवस्था बिगड जावे तो इसे सुधारने के लिये फूलों का प्रयोग किया जा सकता है ।

          सन 1930 से 1936 तक के 6 वर्ष डा. एडवर्ड बेच ने इसी खोज में गुजार दिये और हजारों फूलों पर रिसर्च करने के बाद 38 प्रकार के फूलों को मनुष्य के विकारों को दूर करने में सक्षम पाया और इन 38 प्रकार के फूलों से उन्होंने 38 दवाइयां बनाई जो इन्हीं डा. के नाम से बेच फ्लावर रेमेडीज के नाम से जानी जाने लगी । इन 38 दवाओं में से 5 दवाईयां मिलाकर जो 39वीं दवा बनाई गई उसका नाम "रेस्क्यू रेमेडी" रखा गया क्योंकि यह दवा किसी भी  खतरनाक और गम्भीर स्थिति से छुटकारा (रेस्क्यू) दिलाने वाली है । इन पांचों दवाइयों की संक्षिप्त जानकारी निम्नानुसार है-

          (1) राकरोज (Rockrose) - यह दवा किसी भी दुर्घटना के कारण मन में जो डर या दहशत बैठ जाती है उसके असर को दूर करती है । जब किसी भी दुर्घटना के कारण मन में इतना डर बैठ जाए कि हर समय वही घटना आंखों के सामने घूमती रहे तो यह दवा बहुत अच्छा काम करती है और मनुष्य शीघ्र ही सामान्य मानसिक अवस्था में आ जाता है ।

          (2) स्टार आफ बेथलहम (Star of Bathlehem) - यह दवा मानसिक आघात के असर को दूर करती है । कभी-कभी किसी दुर्घटना में शरीर के भीतर अन्दरुनी चोट लगती है जिसका तत्काल पता नहीं चलता पर बाद में शरीर में कष्ट पैदा हो जाता है । कई बार ऐसी किसी घटना का मन पर ऐसा गहरा असर होता है कि कई वर्ष गुजर जाने पर भी उसका असर नहीं जा पाता । उस स्थिति में यह दवा पूर्ण सकारात्मक प्रभाव मनुष्य के मन मस्तिष्क पर करती है ।

          (3) क्लेमेटिस (Clemeties) - यह दवा तब उपयोगी सिद्ध होती है जब किसी दुर्घटना के कारण कोई बेहोश हो जाए या अस्वाभाविक रुप से सो जाए, बेसुध हो जाए या कोई कल्पनालोक में खोया रहकर ख्याली पुलाव पकाता रहता हो तो यह दवा उसे सामान्य मानसिक अवस्था में ले आती है ।

          (4) इम्पेशेंस (Impatience) - किसी दुर्घटना के बाद की उत्तेजित अवस्था और चिडचिडेपन की स्थिति इस दवा के सेवन से दूर हो जाती है । जो स्वभाव से उतावले, जल्दबाद और किसी भी काम को फटाफट कर डालने की मनोदशा वाले होते हैं उनके लिये यह दवा पूर्ण उपयुक्त है । ऐसे लोग जल्दबाजी और उतावलेपन के कारण परिणाम की चिन्ता किये बिना ही काम कर डालते हैं और हमेशा बेसब्र, परेशान और तनावग्रस्त बने रहते हैं फलतः दुर्घटना के शिकार हो जाया करते हैं । वैसे भी मानसिक तनाव से पीडित होने पर होने वाली किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त बने ही रहते हैं । यह दवा इनके लिये उपयोगी साबित होती है ।

        (5) चेरीप्लम (Cherryplum) - किसी दुर्घटना का दिमाग पर ऐसा भयानक असर हो कि मानसिक संतुलन ही बिगड जावे या व्यक्ति असह्य पीडा से पागलों जैसी हरकत करने लगे, ओछी हरकतें करने लगे तो ऐसे निराश मनोरोगी को यह दवा धीरे-धीरे ठीक कर देती है । कई लोग निराशा के अतिरेक में आत्महत्या कर लेते हैं या फिर सामने वाले की हत्या पर उतारु हो जाते हैं । ऐसे रोगियों के लिये यह दवा संजीवनी समान असर कर उन्हें धीरे-धीरे ठीक कर देती है ।

          उपर इन पांचों दवाओं के जो-जो लक्षण बताये गये हैं वे हमारे या हमारे परिवारजन के जीवन में कभी न कभी घटित होते ही रहते हैं । इन लक्षणों के अनुसार इन पांचों दवाओं को आनुपातिक रुप में मिलाकर एक मिश्रण तैयार किया गया और इस 39वीं दवा का नाम "रेस्क्यू रेमेडी" रखा गया । यह दवा प्राथमिक उपचार का काम किस खूबी से दिखलाती है उसके कुछ वास्तविक उदाहरण निम्नानुसार हैं-

          एक दिन सडक पर एक व्यक्ति दूर्घटनाग्रस्त होकर बेहोश हो गया कुछ लोग उसे उठाकर मेरे क्लिनिक में ले आए मैंने एक कप में थोडा पानी लेकर 5-6 बूंद दवा रेस्क्यू रेमेडी की उसमें टपकाकर चम्मच से उसके मुंह में डलवाई थोडी सी दवा उसके होठों पर, कपाल पर और कान के पीछे भी लगा दी, कुछ ही क्षणों में उसे होश आ गया और हँसी-खुशी सबको धन्यवाद देकर वह व्यक्ति स्वयं चलकर वहाँ से चला गया ।

          एक तेरह वर्ष की लडकी को पहली बार मासिक धर्म हुआ तो खून बहता देखकर वह घबराहट के कारण बेहोश हो गई । उसकी माँ मेरे पास दवाई लेने आई । मैंने वृतांत समझकर उसे रेस्क्यू रेमेडी दे दी । बाद में माँ ने फोन करके बताया कि दवा देते ही वह लडकी सामान्य हो गई ।

          इस दवा से सम्बन्धित ऐसे अनेक अनुभव मुझे हो चुके हैं । सुप्रसिद्ध फिल्म स्टार स्व. अशोक कुमार (दादामुनि) जो होम्योपैथी के प्रकाण्ड विद्वान और शौकिया चिकित्सक रहे हैं उन्होंने निरोगधाम के लिये दिये एक साक्षात्कार में इस दवा की ऐसे ही अनेक उदाहरणों द्वारा बहुत प्रशंसा की थी जो निरोगधाम के वसन्त ऋतु अंक 1991 में प्रकाशित हुई थी । तभी से मैं इस चमत्कारी दवा का प्रयोग रोगियों पर करता आ रहा हूँ । यह दवा प्रत्येक घर में रखी जानी चाहिये जिससे कि जरुरत के वक्त फौरन इस्तेमाल की जा सके ।

सुप्रसिद्ध होम्योपैथ डा. विनयकांत चावला द्वारा निरोगधाम पत्रिका से साभार...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...